जुलाई 2026 ने एक बार फिर दुनिया को जलवायु संकट की गंभीरता का एहसास कराया। कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, जुलाई 2026 और जुलाई 2024 संयुक्त रूप से रिकॉर्ड का दूसरा सबसे गर्म जुलाई रहे।
इस दौरान वैश्विक औसत सतही तापमान 16.9 डिग्री सेल्सियस रहा, जो औद्योगिक काल से पहले के स्तर से 1.47 डिग्री अधिक है और 1.5 डिग्री सेल्सियस की अहम सीमा के बेहद करीब है।
चिंता सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रही। ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर महासागरों की सतह का औसत तापमान 20.96 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया, जिसने 2023 का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
यूरोप में लगातार गर्मी और सूखे ने जंगलों की आग, कम होते नदी जलस्तर और जल संकट को बढ़ाया, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ ने तबाही मचाई।
भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। साथ ही आर्कटिक और अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का विस्तार रिकॉर्ड के निचले स्तरों में रहा।
ये आंकड़े महज तापमान के रिकॉर्ड नहीं हैं। इनके पीछे किसानों की बर्बाद फसलें, मजदूरों की बढ़ती गर्मी, मछुआरों की बदलती आजीविका और बाढ़ से उजड़ते परिवार हैं। जुलाई का संदेश साफ है—जलवायु संकट अब भविष्य का खतरा नहीं, वर्तमान की हकीकत बन चुका है।
दुनिया में बढ़ते तापमान के साथ चरम मौसमी आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसी ही चिंताजनक तस्वीर जुलाई 2026 में भी सामने आई। यूरोपियन यूनियन की जलवायु निगरानी संस्था कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने अपने ताजा रिपोर्ट में पुष्टि की है कि जुलाई 2026 और जुलाई 2024 संयुक्त रूप से जलवायु इतिहास के दूसरे सबसे गर्म जुलाई रहे। हालांकि इस दौरान इनके तापमान में महज 0.01 डिग्री सेल्सियस का अंतर देखने को मिला।
ताजा रुझानों से पता चला है कि जुलाई 2026 में सतह का वैश्विक औसत तापमान 16.9 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जो औद्योगिक काल से पहले (1850-1900) दर्ज जुलाई के औसत तापमान से 1.47 डिग्री सेल्सियस अधिक है।
मतलब कि बढ़ता तापमान एक बार फिर डेढ़ डिग्री सेल्सियस की 'लक्ष्मण रेखा' के करीब पहुंच चुका है।
बता दें कि डेढ़ डिग्री सेल्सियस की यह वही सीमा है जिसके बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि तापमान इससे ऊपर जाता है तो दुनिया में विनाशकारी आपदाओं का खतरा बेहद बढ़ जाएगा। रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि जुलाई में बढ़ता तापमान 1991 से 2020 के औसत तापमान से 0.67 डिग्री सेल्सियस अधिक था।
हालांकि इससे पहले जलवायु इतिहास का सबसे गर्म जुलाई 2023 में दर्ज किया गया था।
तपने लगी धरती, जुलाई ने बनाया गर्मी का नया रिकॉर्ड
आंकड़ों को देखें तो ऐसा नहीं है कि केवल वातावरण में हवा का ही तापमान बढ़ रहा है, बल्कि इसके साथ ही समंदर के सीने में भी आग धधक रही है।
ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़ दें तो दुनिया भर के महासागरों में सतह का औसत तापमान (एसएसटी) जुलाई 2026 में 20.96 डिग्री तक पहुंच गया, जो जुलाई के महीने के लिए इतिहास का सबसे उच्चतम स्तर है। इसके साथ ही समुद्र के बढ़ते तापमान ने 2023 में दर्ज 20.89 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में दस्तक दे चुके अल नीनो ने इस वैश्विक तपन को और भड़का दिया है, जिसके आने वाले महीनों में स्थिति और खतरनाक हो सकती है। इस दौरान अटलांटिक तट और पश्चिमी भूमध्य सागर में रिकॉर्ड तोड़ तपन देखी गई। इसके चलते कई इलाकों में समुद्री लू की गंभीर स्थिति बन गई, जिसका सीधा असर तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों पर पड़ रहा है।
सच कहें तो यह संकेत है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब पृथ्वी के हर कोने में और अधिक स्पष्ट तथा गंभीर होता जा रहा है।
यूरोप में बढ़ती गर्मी ने मचाई तबाही
रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि पश्चिमी यूरोप के लिए जून और जुलाई 2026 अब तक के सबसे गर्म दो महीने साबित हुए हैं। इस दौरान क्षेत्र में मई के बाद तीसरी और चौथी लू दर्ज की गई। हालांकि जून के मुकाबले जुलाई में गर्मी कुछ कम रही, लेकिन लगातार कई महीनों तक लू का बने रहना अपने आप में असाधारण घटना है।
जून-जुलाई में पश्चिमी यूरोप का औसत तापमान 21.62 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य से 2.79 डिग्री सेल्सियस अधिक है। यह इस अवधि के लिए तापमान का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है और इसने 2022 के पिछले रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ गया है।
फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड और आयरलैंड समेत पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी ऊपर रहा। इसके उलट पूर्वी यूरोप और स्कैंडिनेविया के बड़े हिस्से में तापमान सामान्य से कम दर्ज किया गया। पूरे यूरोप में औसत जमीनी तापमान की बात करें तो जुलाई में यह 20.49 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से 0.66 डिग्री अधिक है और जुलाई के इतिहास में 11वां सबसे गर्म रहा।
कहीं सूखा, कहीं बाढ़-दुनिया में दिखा मौसम का रौद्र रूप
यूरोप में समस्या सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं रही। मई और जून से जारी सूखा जुलाई में और गंभीर हो गया। फ्रांस, स्पेन, जर्मनी के कुछ हिस्सों और ब्रिटेन में बारिश और मिट्टी में मौजूद नमी में असाधारण कमी दर्ज की गई।
बता दें कि जब मिट्टी सूखती है तो वह प्राकृतिक रूप से वातावरण को ठंडा करने की अपनी क्षमता खो देती है। ऐसे में गर्मी जमीन में ज्यादा देर तक बनी रहती है और तापमान तेजी से बढ़ सकता है। यही गर्मी और सूखे का खतरनाक चक्र जंगलों की आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करता है।
पश्चिमी यूरोप में जुलाई के दौरान जंगलों में लगी आग का असर जले क्षेत्र और उत्सर्जन, दोनों के लिहाज से असाधारण रहा। जलवायु विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्म और शुष्क मौसम अब दक्षिणी यूरोप में बड़ी और ज्यादा तीव्र जंगलों की आग के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार कर रहा है।
जंगलों में बड़े पैमाने पर लगी आग सिर्फ वन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। आग जितनी बड़ी होती है, उससे उतना ज्यादा धुआं पैदा होता है और धुआं वातावरण में ऊंचाई तक पहुंच सकता है। इसके बाद तेज हवाएं इसे सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर तक ले जा सकती हैं। इसका मतलब है कि जिन देशों में जंगल में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती है, वहां भी दूर-दराज के देशों से आया धुआं हवा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस के निदेशक लॉरेंस रुइल के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन अब ऐसे गर्म और शुष्क हालात को बढ़ा रहा है, जो जंगलों में बड़ी और भीषण आग के लिए जिम्मेदार हैं। आग का मौसम लंबा होने के साथ उसका असर भी व्यापक क्षेत्र में फैल रहा है।
रिपोर्ट से पता चला है कि यूरोप के सूखे इलाकों में सिर्फ जंगल ही प्रभावित नहीं हुए। सीन, राइन और डेन्यूब समेत कई प्रमुख नदियों का जलस्तर सामान्य से बहुत नीचे चला गया। इससे कई देशों में पीने के पानी की आपूर्ति, सिंचाई, नदी परिवहन, जलीय पारिस्थितिकी और बिजली उत्पादन पर भी दबाव बढ़ा है।
विशेषज्ञ की चेतावनी: एक-दूसरे को बढ़ा रहे गर्मी और सूखा
पश्चिमी और मध्य यूरोप के बड़े हिस्सों में जुलाई में मिट्टी की नमी 2022 की तुलना में भी काफी कम रही। बता दें कि 2022 में पश्चिमी यूरोप ने गंभीर सूखे का सामना किया था।
कॉपरनिकस में जलवायु रणनीति प्रमुख सामंथा बर्गेस के मुताबिक, पश्चिमी यूरोप में लगातार तीसरे महीने असाधारण गर्मी रही और जून-जुलाई में पड़ी गर्मी ने संयुक्त रूप से नया रिकॉर्ड बना दिया। लंबे समय तक बने उच्च वायुदाब ने गर्मी को क्षेत्र में फंसा दिया और सूखे ने हालात को कहीं ज्यादा गंभीर बना दिया। उनके अनुसार, जैसे-जैसे मिट्टी सूखती है, उसकी प्राकृतिक ठंडक देने की क्षमता घटती जाती है जिससे गर्मी और आसानी से जमा होती है।
यही इस बदलती जलवायु की सबसे चिंताजनक तस्वीर है, गर्मी सूखे को बढ़ा रही है और सूखी जमीन गर्मी को और तेज कर रही है। इसी चक्र के बीच जंगलों में आग का खतरा बढ़ रहा है और जल स्रोत स्रोत दबाव में आ रहे हैं।
इसके विपरीत बाल्टिक देशों, फिनलैंड, तुर्की के कुछ हिस्सों, ग्रीस, पूर्वी यूक्रेन और पश्चिमी रूस के बड़े इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश हुई। कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और उससे जुड़ी त्रासदी की खबरे सामने आई हैं।
भारत सहित कई देशों में बारिश-बाढ़ बने आफत
ऐसा नहीं है कि चरम मौसम सिर्फ यूरोप तक सीमित है, यूरोप के बाहर भी मौसम मौसमी घटनाओं ने अपना रौद्र रूप दिखाया है। उत्तरी कनाडा, मध्य अमेरिका, हॉर्न ऑफ अफ्रीका, साइबेरिया, दक्षिण-मध्य एशिया, चीन के कुछ हिस्सों और अर्जेंटीना, उरुग्वे व बोलीविया के कुछ क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हुई।
वहीं इसके उलट अमेरिका के पूर्वी हिस्से, उत्तरी मेक्सिको, अलास्का, कनाडा, पूर्वी रूस, अफगानिस्तान, उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप, पूर्वी चीन और जापान समेत कई इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश हुई। अमेरिका, चिली, ब्राजील, अफगानिस्तान, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन और ताइवान में बाढ़ की विनाशकारी घटनाएं सामने आईं हैं।
ध्रुवों की घटती बर्फ दे रही बड़े खतरे का संकेत
इस जलवायु संकट के संकेत समुद्र और जमीन के साथ ध्रुवों से भी मिले हैं। जुलाई के दौरान आर्कटिक समुद्री बर्फ का विस्तार इस महीने के रिकॉर्ड में छठा सबसे कम रहा। खासतौर पर स्वालबार्ड और फ्रांज जोसेफ लैंड के आसपास उत्तरी बारेंट्स सागर में बर्फ काफी कम रही।
वहीं, अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का विस्तार जुलाई के लिए पांचवां सबसे कम रहा। अमुंडसेन सागर को छोड़कर अधिकांश समुद्री क्षेत्रों में बर्फ सामान्य से कम रही।
देखा जाए तो जुलाई 2026 के ये आंकड़े महज तापमान के रिकॉर्ड नहीं हैं। इनके पीछे उन लोगों की जिंदगी है, जिनके लिए मौसम कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि रोजगार, भोजन, पानी और परिवार की सुरक्षा का सवाल है।
खेत में खड़ा किसान जब बारिश का इंतजार करता है, मजदूर जब तपती दोपहर में काम करने को मजबूर होता है, मछुआरा जब बदलते समुद्र के बीच अपनी रोजी तलाशता है और एक मां जब अपने बच्चे को लू और बाढ़ से बचाने की चिंता करती है, तब बदलती जलवायु का असली चेहरा सामने आता है।
क्या आने वाले कल के लिए तैयार हैं हम?
आज गर्मी सिर्फ थर्मामीटर में नहीं बढ़ रही, यह खेत की मिट्टी, नदियों के पानी, समुद्र की लहरों और इंसान की सांसों तक पहुंच रही है। कहीं सूखा फसल छीन रहा है तो कहीं अचानक आई बाढ़ महीनों की मेहनत बहा ले जा रही है। कहीं जंगल की आग घरों के करीब पहुंच रही है तो कहीं बढ़ती गर्मी रोज कमाने-खाने वाले लोगों के लिए काम करना भी मुश्किल बना रही है।
ऐसे में जुलाई 2026 का रिकॉर्ड हमें सिर्फ यह नहीं बताता कि धरती गर्म हो रही है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि अगर हमने अब भी कदम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस सवाल के साथ देखेंगी कि जब खतरा साफ दिखाई दे रहा था, तब हमने क्या किया?