

हवा में बढ़ता प्रदूषण अब महज सांसों को नहीं, दिमाग को भी निशाना बना रहा है। नए अध्ययन के मुताबिक, वायु प्रदूषण और बदलते मौसम का खतरनाक मेल माइग्रेन के हमलों को तेज कर सकता है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन दिनों हवा ज्यादा जहरीली थी, उन्हीं दिनों अस्पतालों में माइग्रेन के मरीजों की संख्या बढ़ी।
खास तौर पर पीएम10, पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) जैसे प्रदूषक तत्वों के स्तर बढ़ने पर सिरदर्द के मामले तेजी से उभरे। इतना ही नहीं, जिन लोगों को लंबे समय तक प्रदूषण का सामना करना पड़ा, उन्हें माइग्रेन की दवाओं की जरूरत भी अधिक पड़ी।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के साथ यह खतरा और गहराएगा, ऐसे में माइग्रेन से बचाव के लिए अब पर्यावरणीय जोखिमों को नजरअंदाज करना संभव नहीं है।
हवा में घुलता जहर अब सिर्फ फेफड़ों की समस्या नहीं रहा, यह हमारे दिमाग पर भी आघात कर रहा है। इस बारे में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि हवा में प्रदूषण का बढ़ता स्तर माइग्रेन के हमलों को और बढ़ा सकता है।
इस अध्ययन के नतीजे अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के प्रतिष्ठित जर्नल 'न्यूरोलॉजी' में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि न सिर्फ लंबे समय तक बल्कि थोड़े समय के लिए भी प्रदूषण के संपर्क में रहने से माइग्रेन का खतरा बढ़ सकता है। इसके साथ ही गर्मी और नमी जैसे मौसम संबंधी कारक भी इस समस्या को और गंभीर बना सकते हैं।
हालांकि यह शोध सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि प्रदूषण माइग्रेन का कारण है, लेकिन यह साफ संकेत देता है कि हमारे आसपास का वातावरण इस दर्दनाक बीमारी को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा रहा है।
इस अध्ययन का नेतृत्व इजराइल की बेन-गुरियन यूनिवर्सिटी ऑफ द नेगेव के फैकल्टी ऑफ हेल्थ साइंसेज से जुड़े शोधकर्ता इडो पेलेस द्वारा किया गया है।
हवा का वार, दिमाग लाचार
अध्ययन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी दी है कि, “जिन लोगों में पहले से माइग्रेन की प्रवृत्ति होती है, उनके लिए पर्यावरण दो तरह से असर डालता है। एक ओर, गर्मी और नमी जैसे जलवायु संबंधी कारक धीरे-धीरे जोखिम को बढ़ाते हैं, तो दूसरी ओर अचानक से बढ़ता प्रदूषण सीधे माइग्रेन के दौरे को ट्रिगर कर सकता है।“
इस अध्ययन में माइग्रेन से पीड़ित 7,032 लोगों को शामिल किया गया, जो इजराइल के बेयर शेवा शहर में रहते थे। इन सभी लोगों पर औसतन 10 वर्षों तक नजर रखी गई। शोधकर्ताओं ने हर दिन ट्रैफिक, उद्योग और धूल भरी आंधियों से होने वाले वायु प्रदूषण के साथ-साथ मौसम की स्थिति का भी अध्ययन किया।
इसके बाद यह देखा गया कि किन दिनों में, कितनी बार लोगों को तेज माइग्रेन के कारण अस्पताल या डॉक्टर के पास जाना पड़ा। फिर इन मामलों की तुलना उसी दिन और उससे पहले के सात दिनों के प्रदूषण और मौसम के आंकड़ों से की गई, क्योंकि प्रदूषण का असर शरीर पर कुछ दिनों बाद भी दिखाई दे सकता है।
इसके अलावा, लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क और माइग्रेन के बीच संबंध को भी समझने की कोशिश की गई। माइग्रेन की गंभीरता मापने के लिए शोधकर्ताओं ने दवा की दुकानों के रिकॉर्ड भी खंगाले, ताकि यह पता चल सके कि लोगों को ‘ट्रिप्टान’ नाम की माइग्रेन की दवा कितनी बार लेनी पड़ी।
कैसे दिमाग पर असर करता है हवा में घुला जहर
इस विश्लेषण के नतीजे डराने वाले थे। स्टडी से पता चला कि जिन दिनों हवा में जहर अधिक था, उन्हीं दिनों अस्पतालों में माइग्रेन के मरीजों की संख्या भी बढ़ गई।
खास तौर पर पीएम10, पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ2) जैसे प्रदूषक तत्वों के स्तर बढ़ने पर सिरदर्द के मामले तेजी से उभरे। इतना ही नहीं, जिन लोगों को लंबे समय तक प्रदूषण का सामना करना पड़ा, उन्हें माइग्रेन की दवाओं की जरूरत भी अधिक पड़ी।
बता दें कि अध्ययन के दौरान करीब 32 फीसदी (2,215) लोगों को कम से कम एक बार तेज माइग्रेन के कारण अस्पताल या क्लिनिक जाना पड़ा। वहीं, 47 फीसदी लोगों ने इस दौरान ‘ट्रिप्टान’ नाम की दवा खरीदी। औसतन लोग महीने में 2 गोलियां लेते थे, जबकि 2.3 फीसदी लोगों को महीने में 10 या उससे ज्यादा गोलियां लेनी पड़ीं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि वायु प्रदूषण और माइग्रेन के कारण अस्पताल जाने के मामलों के बीच संबंध बेहद स्पष्ट था। जिन दिनों सबसे ज्यादा लोग इलाज के लिए पहुंचे, उन दिनों हवा में प्रदूषण का स्तर सामान्य से ज्यादा था।
उस दिन पीएम10 का स्तर 119.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जबकि पूरे अध्ययन के दौरान इसका औसत स्तर 57.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। इसी तरह पीएम2.5 (जो गाड़ियों और उद्योगों के धुएं से बनता है) का स्तर 27.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जबकि औसत स्तर 22.3 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड क्या गया। वहीं, ट्रैफिक से पैदा होने वाले नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर 11.2 भाग प्रति बिलियन था, जो सामान्य औसत 8.7 से काफी अधिक रहा।
स्पष्ट है कि जब हवा ज्यादा प्रदूषित हुई, तब माइग्रेन के मामले भी बढ़ गए।
भारी पड़ रही गर्मी-नमी और प्रदूषण की तिकड़ी
इसी तरह नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के उच्च स्तर के संपर्क में आने वाले लोगों में माइग्रेन के कारण अस्पताल या क्लिनिक जाने का खतरा 41 फीसदी तक बढ़ गया। तेज धूप यानी सूर्य की पराबैंगनी किरणों के ज्यादा संपर्क में आने वाले लोगों में भी यह खतरा 23 फीसदी तक बढ़ गया।
वहीं, जो लोग लंबे समय तक एनओ₂ के ऊंचे स्तर के संपर्क में रहे, उनमें माइग्रेन की दवाओं के ज्यादा उपयोग करने की आशंका 10 फीसदी बढ़ गई। कुछ ऐसा ही पीएम2.5 के मामले में देखा गया, जिसके लंबे समय तक संपर्क में रहने वालों में दवाओं के ज्यादा इस्तेमाल का खतरा नौ फीसदी अधिक पाया गया।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि मौसम ने इस खतरे को और गहरा दिया। तेज गर्मी और सूखी हवा में एनओ₂ का प्रभाव ज्यादा खतरनाक हो जाता है, जबकि ठंड और नमी में पीएम2.5 का असर और बढ़ जाता है।
यह अध्ययन एक बड़ी चेतावनी देता है, जिस तरह जलवायु परिवर्तन के चलते लू, धूल भरी आंधियां और प्रदूषण की घटनाएं बढ़ रही हैं, ऐसे में माइग्रेन जैसी समस्याएं भी गंभीर होती जाएंगी। इसकी वजह से मरीजों के लिए भी इन पर्यावरणीय जोखिमों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
कैसे करें खुद को सुरक्षित
विशेषज्ञों का मानना है कि अब स्वास्थ्य सलाह को केवल शरीर तक सीमित नहीं रखा जा सकता, पर्यावरणीय खतरे भी इसमें शामिल करने होंगे।
खासकर उन दिनों में जब प्रदूषण का स्तर बढ़ा हो, लोगों को अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचना चाहिए, घर के अंदर स्वच्छ हवा के लिए एयर फिल्टर का इस्तेमाल करना चाहिए और माइग्रेन के शुरुआती संकेत मिलते ही तुरंत दवा लेकर इसको बढ़ने से रोकना चाहिए।
यह स्पष्ट है कि हवा की गिरती सेहत अब महज पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रही, यह सीधे तौर पर हमारे दिमाग पर असर डाल रही है। ऐसे में यदि प्रदूषण और जलवायु बदलाव पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो माइग्रेन जैसी समस्याएं आने वाले वर्षों में कहीं ज्यादा आम व गंभीर हो सकती हैं। यह महज चेतावनी नहीं, बल्कि स्पष्ट संकेत है कि साफ हवा अब विकल्प नहीं, बल्कि जीवन की अनिवार्य जरूरत बन चुकी है।
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