आदिवासियों महिलाओं को लघु वनोपज का वाजिब दाम तक नहीं मिल रहा

छत्तीसगढ़ में अधिकांश आदिवासी अपनी लघु वनोपज को बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
फोटो : पुरुषोत्तम ठाकुर
फोटो : पुरुषोत्तम ठाकुर
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वनोपज से आदिवासियों की आजीविका का सीधा संबंध है लेकिन क्या उन्हें अपने वनोपज का सही दाम मिल पाता है। डाउन टू अर्थ ने धमतरी जिले के सबसे अधिक वनोपज एकत्रित करने वाले नगरी ब्लॉक के सात गांवों के वनोपज एकत्रित करने वाले आदिवासियों से यह जानने की कोशिश की कि क्या उनकी दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत का वाजिब दाम मिल पा रहा है। अधिकांश आदिवासियों का कहना था कि हमें तो पिछले कई सालों से बस औनेपौने दाम पर अपनी वनोपज बिचौलियों को बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ध्यान रहे कि अधिकाशं वनोपज एकत्रित करने का काम आदिवासी महिलाओं द्वारा किया जाता है और पुरुष आदिवासियों की इस वनोपज के विक्रय कार्य में भागीदारी होती है। ध्यान रहे कि राज्य 44 फीसदी  जमीन पर जंगल हैं और यहा की 32 फीसदी जनसंख्या आदिवासियों की है।

सत्तर साल की धमशिला सिर पर औषधि की जड़ी-बूटियों का एक बड़ा बोझा लिए डगमगाते पैरों से जैसे-तैसे चलते हुए अपने टूटे-फूटे एक कमरे के कच्चे घर के सामने पटक दिया। दिनभर की थकीहारी और पसीने से तरबरत धमशिला जहां बोझा पटका था, वहीं धम्म से बैठ कर अपनी उखड़ती सांसों को काबू करने की भरसक कोशिश कर रहीं थीं। बड़ी मुश्किल से पाास के मटके से नारियल के खोल से बनी कटोरी में पानी डाल कर अपना गला तर किया और पास पड़े हुए गट्ठे को पास खींच कर उसकी सुतली खोली और जंगली लगने वाली घासों ( ये औषधि की झाड़ियां हैं ) को अलग-अलग करने लगीं। इसमें कितना मिल जाता है, इस पर वह कहती हैं, ये करीब पांच किलो झाड़ियों को बिनने में पूरा दिन चला गया और अब रात भर जाग कर अलग- अलग करुंगी और कल इसे बिचौलिए को दूंगी तो वह दस रुपए प्रति किलो के भाव से चालीस- पचास रुपए हाथ में रख देगा। वह कहती हैं कि हालांकि वह इसे कई गुना कीमत पर बेचेगा लेकिन हम क्या कर सकते हैं न तो मैं यहां से चालीस किलो मीटर दूर हाट बाजार जा सकती हूं और न ही मेरे पास गाड़ीघोड़े का पैसा ही है। बस ऐसे ही जिंदगी खींच रही हूं। वह बताती हैं कि सरकारी खरीद वाले तो हमारे इस इलाके में आते ही नहीं है, नहीं तो मुझे घर बैठे अच्छे दाम मिल जाएंगे। यह कहानी एक अकेले धमशिला की नहीं है बल्कि राज्य के अधिकांश आदिवासी इलाको में लघु वनोपज एकत्रित करने वाले आदिवासी महिलाओं की है।   

धमशिला कहती हैं कि बरसाती महिनों में (जून के आखिरी सप्ताह से यानी जुलाई से लेकर अक्टूबर तक) जंगलों से औषधीय पौधे, कंद-मूल और बीज ठीकठाक मात्रा में मिल जाते हैं। वह कहती हैं कि औषधि में गिलोय, सफेद मूसली, शतावर, कालमेघ और हर्रा-बहेड़ा जैसी महत्वपूर्ण औषधियां जंगलों में मिल जाती हैं। वह अपनी पीड़ा बया करती हुए कहती हैं कि बाजार में तो मूसली का भाव छह सौ रुपए से भी अधिक है और हमसे बिचौलिया औनेपौने में खरीद लेता है और हम करें तो करें क्या, हमारी भी मजबूरी होती है कि उसे ही दे दो कम से कम वो कुछ न कुछ तो दे ही जाता है। सरकार की तरह वह हमारी ओर से आंखें तो नहीं मूंद लेता। ध्यान रहे कि इन माहों में लाख की भी खेती की जाती है। ध्यान रहे कि कुसमी और पलाश के पेड़ों पर लाख की खेती की जाती है और अक्टूबर से नवंबर और अप्रैल-मई माहों में इसकी कटाई होती है। वर्षा ऋतु और इसके ठीक बाद धावड़ा, बबूल और कुल्लू के पेड़ों से गोंद भी निकालने काम शुरू हो जाता है।  

इन्हीं माहों में माहुल पेड़ के पत्ते से पत्तल बनाने का भी काम शुरू होता है। इन पत्तों से पत्तल का काम करने वाली जबर्रा गांव की कुआरी बाई बताती हैं कि बाजार में तो इसका रेट अच्छा होता है लेकिन हम से बिचौलिया सौ रुपए में सौ लेता है। वह कहती हैं कि यह दस से 15 दिन का काम होता है और इन दिनों में पांच से सात सौ रुपए कमा लेते हैं। जबर्रा गांव की वन प्रबंधन समिति के अध्यक्क्ष माधव सिंह ने डाउन टू अर्थ से कहा कि गांव के हर आदिवासी की हालात इतनी अच्छी नहीं होती है कि वह मुट्रठी भर वनोपज के लिए हाट बाजार जाए, वह अक्सर अपनी वनोपज को कई बार सड़क किनारे ही अपना कपड़े पर बिछा कर दिर भर में वनोपज को बेचने की कोशिश करता है। हालांकि उनका कहना है कि यह कार्य बहुत कठिन होता है कारण कि यह इलाका तो पूरा का पूरा जंगल का है ऐसे में यहां कोई शहरों की तरह भीड़भाड़ तो होती नहीं, हां इक्कादुक्का राही जो निकलते हैं वे भी उनसे मोलभाव के बिना नहीं लेते ऐेसे में उनके हाथ में बस जैसेतैसे नोनतेल का जुगाड़ हो जाता है। उनके घर पर ही पत्तल बना रही उनकी मां कौशल्या बाई की तरफ इशारा करते हुए वह कहते हैं कि ये दिनभर अपनी आंखें गड़ा-गड़ा कर जो भी सौ पचास पत्तल बनाती हैं और यदि मैं इन्हें बाइक से पास के हाट बाजार में बेचने नहीं ले गया तो यहां तो उनकी मजदूरी इतनी कम मिलती है कि सोच में पड1 जाता है कि दिनभर की मेहनत के बाद क्या ही मिला। वह बताते हैं कि सरकारी खरीद अब कम होने लगी है। वह आंकड़ों के माध्यम से समझाते हैं कि एक समय था जब हमारे राज्य में अकेले कुल लघु वनोपज खरीद केंद का 75 हिस्सा था लेकिन अब सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वनोपज की खरीदी का मॉडल पूरी तरह से चरमरा गया है। ध्यान रहे कि  छत्तीसगढ़ में खरीदी केंद्रों की संख्या 4,969 थी जबकि देश भर में इनकी संख्या 6,873 थी।  

धमतरी से नगरी ब्लाक के रास्ते में पड़ने वाले बेंदापलानी गांव की सड़क किनारे कपड़ों पर काले और कत्थई रंग के कंद मूल बेचने के लिए रखते हुए मीना नेताम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि दोपहर खत्म होने वाली है और अब तक केवल एक ग्राहक ही आया है और वो भी  कोई किलो भर न खरीद कर बस आधा किलो जीमी कंद खरीद के चलते बना। वह कहती हैं कि दिरभर धूप में बैठो और शाम को मिलता है तो दस-बीस रुपए बस। मीना के बाजू में ही एक दूसरी आदिवासी महिला कृष्णा नेताम ने बताया कि इसका तो आधा किलो बिक भी गया हमारा तो अब तक सौ ग्राम भी न बिका, बताइए कैसे हम अपने परिवार का गुजारा करें कई कई दिनों तक खेतों की खुदाई के बाद यह जीमी कंद हम निकाल पाते हैं और उसे साफसूफ करके यहां पूरे सप्ताह भर धूप में जलो तब जाकर तीन से चार किलो बिक पाता है। वहीं कामिन निषाद कहती हैं कि हमारी हालात तो ऐसी है कि कभी तो कुछ नहीं बिकता और कभी तो कोई ऐसा ग्राहक आ जाता है कि वह सारा का सारा माल खदीद लेता है। हालांकि यह सारा माल वह अपने घर नहीं ले जाता बल्कि पास के हाट बाजार में ले जाकर अच्छे दामों में बेंच देता है। जहां ये आदिवासी अपनी वनोपज लेकर बैठे हैं बेचने के लिए यहां से दुगली हाट बाजार कम से कम चालीस किलो मीटर दूर है। ऐसे में उनके लिए वाहन का किराया देकर अपनी मुट्ठी भर वनोपज को बेचने जाना किसी भी तरह से अच्छा सौदा नहीं होगा।

डाउन टू अर्थ ने दुगली गांव में लगे हाट बाजार को भी देखा और देखने से ही पता चलता है कि यहां अधिकांश दूकानें बिचौलियों की हैं। एक- दो लोगों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश बिक्रेताओं ने बताया कि वे आसपास के आदिवासी गांवों से ही यह वनोपज खरीद कर लाएं हैं और अब उसे बेच रहे हैं। इमली के ढेर के किनारे बैठे दूकानदार ने बताया कि पिछले डेढ़ माह में मैंने आसपास के कई आदिवासी गांवों का चक्कर काट कर यह माल एकत्रित किया है और उम्मीद करता हूं कि आज शाम तक बिक जाएगा। ध्यान रहे कि नवंबर से फरवरी यानी सर्दियों के महीनों में विभिन्न प्रकार की जड़ें, कंद मूल और औषधीय फल प्राप्त होते हैं। इसके अलावा फल, बीज और अन्य उपज बड़ी मात्रा में एकत्र की जाती हैं। जैसे इमली के पेड़ों से इमली का संग्रहण किया जाता है, जो कि पूरे साल के लिए एक महत्वपूर्ण और आसानी से बिकने वाली उपज है।

नगरी ब्लॉक के ही कमारपारा गांव की चालीस वर्षीय बीरझा सोरी अपने घर के सामने बच्चों के साथ बैठ कर चिरौंता औषधि की झाड़ियों को अलग- अलग कर रहीं हैं। वह कहती हैं कि इसे एकत्रित करने में मुझे तीन दिन लगे हैं लेकिन इतनी मेहनत के बाद मुझे कोई उम्मीद मुझे इसका सही दाम मिल पाएगा। कारण कि अब हमारी स्थिति ऐसी नहीं है कि हम हाट बाजार जाकर इसे बेच सकें। वह बताती हैं कि कहने के लिए हमारे गांव में ही लघु वनोपज खरीद केंद्र है लेकिन वह कब खुलता है और बंद हो जाता है हमें आज तक पता नहीं चला। ऐसे में हमें अपनी इस वनोपज को बिचौलिए के हाथों ही बेचने पर मजबूर हो जाते हैं। 

मकराम ने बताया कि मार्च से अप्रैल तक महुआ का समय होता है और मई-जून तेंदुपत्ता का होता है। ध्यान रहे कि इन इलाकों में इन्हीं माहों में चिरौंजी के फल पकते हैं और इनका बाजार दाम बहुत अधिक है और यह एक मंहगी उपज है। इसके अलावा इन माहों में साल के पेड़ों से बीज गिरते हैं और इनसे तेल निकाला जाता है। वह कहते हैं कि कुछ ऐसे वनोपज हैं जो कि साल भर एकत्रित होता है। जैसे शहद, बांस और मशरूम आदि। माधव सिंह मकराम का कहना था कि सरकारी आंकड़े पर यदि गौर करें तो गत पांच सालों में छत्तीसगढ़ में लघु वनोपज की सरकारी खरीद में भारी गिरावट आई है। मकराम की बातों को छत्तीसगढ़ लघु वनोपज के आंकड़े भी यही कहते हैं। आंकड़ों के अनुसार 2021 में  6,27,470.50 क्विंटल वनोपज समर्थन मूल्य पर खरीदी गई थी, वहीं 2024-25 में यह घटकर 35,002.85 क्विंटल रह गई।

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