मुश्किलें बढ़ रही हैं प्रकृति के स्वाभाविक संरक्षकों की

भोपाल में 'आईवायआरपी 2026' के तहत मालधारियों का कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग अपने ऊंटों और भेड़-बकरियों के साथ शामिल हुए
मालधारी यानी जिनके पास खूब सारे पशु, भेड़, बकरी, गाय-बैल और ऊंट हैं। फोटो: राकेश मालवीय
मालधारी यानी जिनके पास खूब सारे पशु, भेड़, बकरी, गाय-बैल और ऊंट हैं। फोटो: राकेश मालवीय
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सारांश
  • भोपाल में 'आईवायआरपी 2026' के तहत मालधारियों का कार्यक्रम आयोजित हुआ

  • यहां विभिन्न समुदायों के लोग अपने ऊंटों और भेड़-बकरियों के साथ शामिल हुए

  • कार्यक्रम का उद्देश्य चरागाहों और पशुपालक समुदायों के योगदान को वैश्विक मंच पर लाना है

  • मालधारियों ने अपनी समस्याओं और चुनौतियों को उजागर किया, जिसमें चराई की कमी और पशुओं की सुरक्षा शामिल है

पश्चिमी दिशा से मध्यप्रदेश की राजधानी में प्रवेश करने का शुरुआती इलाका नीलबड़। आज कड़ाके की सर्दी है। खाली पड़े कुछ आवासीय प्लाटों पर यहां सुबह से चहल—पहल है।

यहां ऊंट-भेड़ बकरियों का आना यूं तो कोई नई बात नहीं है, पर राहगीर आज उन्हें अचरज भरी निगाहों से देख रहे हैं। 30X30 फुट का एक शामियाना लगा है। बाजू में रसोई लगी है। पगड़ियां बांधे लोग अलाव ताप रहे हैं।

अलग—अलग समूहों में भेड़—बक​रियों के झुंड हैं और कुछ लोग, (जिनमें महिलाएं भी बराबर से शामिल हैं) अपने ऊंटों को सजा रहे हैं। रंग-बिरंगे परिधान में ये यायावर आज एक कार्यक्रम की तैयारी में हैं। 

दरअसल यहां पर मालधारियों-रबारियों का एक कार्यक्रम है। मालधारी यानी जिनके पास खूब सारे पशु, भेड़, बकरी, गाय-बैल और ऊंट हैं। मालधारी जो साल के दसों महीने अपने घर नहीं होते। इन पशुपालकों के लिए 2026 का केवल यह दिन नहीं, पूरा साल ही खास होने वाला है। यहां ‘आईवायआरपी 2026’ की शुरुआत होने जा रही है।

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मालधारी यानी जिनके पास खूब सारे पशु, भेड़, बकरी, गाय-बैल और ऊंट हैं। फोटो: राकेश मालवीय

आईवायआरपी यानी इंटरनेशनल ईयर आफ रेंजलैंड्स एंड पास्टोरेलिस्ट हिंदी में अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं पशुपालक वर्ष। यह वर्ष दुनिया भर में चरागाहों और घुमंतु/अर्ध-घुमंतु पशुपालक समुदायों  के योगदान, अधिकारों और चुनौतियों को वैश्विक मंच पर लाने के लिए घोषित किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 मार्च 2022 साल 2026 को यह साल मनाने की घोषणा की थी। भारत में इसकी शुरुआत मालधारी यूथ एसोसिएशन, सहजीवन और अन्य कई संस्थाओं के नेतृत्व में भोपाल से हुई। 

सब कुछ बदल गए, चुनौतियां बढ़ गईं: 

‘बहुत कुछ बदल गया। अब न हमारे पास जगह है, न जंगल है। पहले जब हम निकलते थे तो किसान हमें खुद ही अपने खेतों में रुकने के लिए बुलाते थे। हमारी भेड़—बकरियों को वहीं पर बैठाते थे। और इसके बदले हमें पैसे भी मिलते थे। अब हमें खाली जगह ही नहीं मिलती है, जानवरों को जिंदा रखना है तो घुमाना तो हमारी मजबूरी ही है।‘ 70 की उम्र पार कर चुके राजस्थान के पाली जिले के मदरूफ जब यह कहते हैं तो उनके माथे पर हमें चिंता की लकीरें साफ दिखाई देती हैं। 

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मालधारी यानी जिनके पास खूब सारे पशु, भेड़, बकरी, गाय-बैल और ऊंट हैं। फोटो: राकेश मालवीय

पास्टोरल यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष ईशाक बताते हैं कि यह ‘समुदाय वास्तव में प्रकृति संरक्षण का स्वाभाविक काम करते रहा है। भेड़—बकरियों के माध्यम से यह जैव विविधता को बचाने और सह​अस्तित्व की परम्परा को जीकर दिखाने का काम करते हैं। चरागाहों, जंगलों, वनों के संरक्षण में इनकी भूमिका है। घूमना और प्रकृति के साथ जीना इनसे ज्यादा अच्छे से कोई नहीं जान सकता, पर विकास की रफ्तार ने इनकी समस्याओं को दो—चार गुना कर दिया है।‘ 

ऊँटनियों को लाना बंद कर दिया:  

इन मालधारियों के अपने विषय हैं, अपनी समस्याएं हैं। सबसे बड़ा संकट जंगलों एवं वन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से चराई सुरक्षित, वैध एवं उपयुक्त चराई की व्यवस्था का है। पाली जिले के ही जगराम बताते हैं कि ‘चराई के लिए जगह मिलना मुश्किल होती है। हमारे पशु चोरी हो जाते हैं, और हम थाने जाते हैं तो हमारी रिपोर्ट भी नहीं लिखाई जाती है। हमें थाने के बाहर से ही भगा दिया जाता है, ऐसा किसी एक जगह या एक बार नहीं हुआ। हमारे पशुओं को न तो पशु चिकित्सा सेवाएं मिलती हैं, न आवश्यक दवाइयां और न टीकाकरण। क्या हमारे पशुओं को बीमारी नहीं लगती? क्या सरकार हमारे लिए कोई विशेष सुविधा नहीं कर सकती।‘ 

सवाल सचमुच वाजिब है। दवाओं का भी और चरागाहों का भी। यही कारण है कि राजस्थान से आने वाले इन मालधारियों ने अपने साथ ऊँटनियों को लाना बंद कर दिया है। जगाराम बताते हैं कि ‘ऊंटनियों को ऊंटों  से अच्छे किस्म का चारा चाहिए होता है जो यहां मिलना मुश्किल होता जा रहा है। उंटनियां एक दिन में ज्यादा से ज्यादा 8 से 10 किलोमीटर दूर ही चल पाती हैं, जबकि ऊंट बीस से 25 किलोमीटर का फासला ​तय कर लेता है। कम दूरी में चरागाह और रुकने की व्यवस्था मिलना मुश्किल होता है, इसलिए मालधारियों ने धीरे—धीरे ऊंटों को लाना ही बंद ​कर दिया।‘  

माल नहीं होगा तो मालधारी भी नहीं होगा: 

एसोसिएशन ने अपना इस साल के लिए अपना एक मांग पत्र भी तैयार किया है। मालधारियों के लिए गुजरात में काम करने वाले इसी समुदाय के युवा कार्यकर्ता गबरू देसाई ने डाउन टू अर्थ को बताया कि ‘हमारी सबसे बड़ी मांग तो यही है कि घुमंतू पशुपालकों की सामाजिक, कानूनी एवं प्रशासनिक पहचान सुनिश्चित की जाए तथा उन्हें केंद्र एवं राज्य सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं से प्रभावी रूप से जोड़ा जाए।

वह बताते हैं कि गुजरात में उन्होंने मालधारियों केा मुख्यधारा में काम करने के लिए बहुत सारे काम हो रहे हैं और इससे आने वाली पीढ़ी का भविष्य बेहतर हो रहा है। ऐसी कोशिशें की जानी चाहिए, लेकिन मालधारियों की असली पहचान उनके माल यानी भेड़—बकरियों से है। जब माल ही नहीं रहेगा तो मालधारी भी नहीं रहेगा, और मालधारी नहीं रहेगा तो प्रकृति भी नहीं रहेगी।‘ 

वह कहते हैं इस वर्ष हम मांग कर रहे हैं कि पशुओं के गुम होने की स्थिति में समयबद्ध रूप से एफआईआर दर्ज की जाए तथा पशुओं की खोज में प्रशासनिक सहयोग सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, सड़क दुर्घटना अथवा प्राकृतिक आपदाओं के कारण पशुओं की मृत्यु होने पर उचित एवं न्यायसंगत मुआवजा प्रदान किया जाए।

आजीविका का संकट: 

गबरू बताते हैं कि पहले जब घुमंतु पशुपालक एक जगह से दूसरी जगह जाते थे तो उनके भेड़ बकरियों के बाल, दूध—घी आदि की ​बिक्री से उन्हें एक अतिरिक्त आय मिलती थी। पर अब वह तरीका समय के साथ खत्म हो रहा है। भेड़—बकरियों के बाल का कोई ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम नहीं है, और है तो वह बहुत महंगा है।

मालधारी अपने साथ इतने बाल जमा करके नहीं रख सकता। पर यदि इस बारीक बात को पकड़कर सरकार का सहयोग मिल सके और कोई मार्केटिंग की व्यवस्था बन सके तो इनकी आय का एक अतिरिक्त जरिया हो सकता है। वह कहते हैं कि जब बीमारियां आती हैं तो एक साथ 50-100 पशु मार जाते हैं और हम बड़े संकट में चले जाते हैं, ऐसी स्थितियों में हमें कभी कोई राहत या मुआवजा नहीं मिलता। 

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