खाद्य तेल की बढ़ेगी पूर्ति, सरसों की नई किस्मों के विकास की राह आसान करेगा यह शोध

सरसों की नई हाइब्रिड किस्मों से बढ़ेगा तेल उत्पादन, वैज्ञानिकों ने खोजा परागण रोकने वाले जीन का रहस्य, आत्मनिर्भरता की उम्मीद हुई मजबूत
भारत खाद्य तेल की घरेलू जरूरत का करीब 56 प्रतिशत आयात करता है, आत्मनिर्भरता के लिए सरसों उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।
भारत खाद्य तेल की घरेलू जरूरत का करीब 56 प्रतिशत आयात करता है, आत्मनिर्भरता के लिए सरसों उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत खाद्य तेल की घरेलू जरूरत का करीब 56 प्रतिशत आयात करता है, आत्मनिर्भरता के लिए सरसों उत्पादन बढ़ाना जरूरी है।

  • वैज्ञानिकों ने टोरिया में परागण रोकने वाले चार प्रमुख जीन की पहचान की, जो संकर बीज बनाने में मदद करेंगे।

  • एसआरके, एफईआर1 और एआरसी1 जीन बंद करने पर टोरिया ने अपना पराग स्वीकार किया और पराग नलिकाओं का विकास शुरू हुआ।

  • एमएलपीके जीन की भूमिका अलग मिली, इसे बंद करने पर टोरिया में पराग अस्वीकृति केवल आंशिक रूप से कमजोर हुई।

  • शोध से अधिक उत्पादन, बेहतर तेल गुणवत्ता और मौसम अनुकूल हाइब्रिड सरसों विकसित करने की भविष्य की राह मजबूत होगी।

भारत में खाद्य तेल की मांग लगातार बढ़ रही है। देश अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है। साल 2023-24 में घरेलू मांग का करीब 56 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा हुआ। ऐसे में देश के लिए खाद्य तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनना बड़ी चुनौती है। इसी दिशा में सरसों की अधिक उपज देने वाली संकर यानी हाइब्रिड किस्में विकसित करने की कोशिशें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सरसों अनुसंधान निदेशालय, भरतपुर के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। यह शोध हाल ही में फ्रंटियर्स इन प्लांट साइंस में प्रकाशित हुआ है।

पौधा खुद के पराग को क्यों रोकता है?

फूलों वाले कई पौधों में एक प्राकृतिक व्यवस्था होती है, जिसे स्व-असंगति या सेल्फ-इन्कम्पैटिबिलिटी कहा जाता है। आसान भाषा में कहें तो इसमें पौधा अपने ही परागकण को स्वीकार नहीं करता, लेकिन दूसरे पौधे के पराग को स्वीकार कर लेता है।

यह व्यवस्था पौधों में पर-परागण को बढ़ावा देती है। इससे अलग-अलग पौधों के गुण आपस में मिलते हैं और नई संतानों में बेहतर ताकत, उत्पादन और अनुकूलन क्षमता आ सकती है। कृषि वैज्ञानिकों के लिए यह व्यवस्था इसलिए भी उपयोगी है क्योंकि इससे संकर बीज तैयार करने में मदद मिलती है।

संकर बीज बनाने के दौरान वैज्ञानिकों को यह सुनिश्चित करना होता है कि मादा पौधा अपने ही पराग से निषेचित न हो। प्राकृतिक रूप से मौजूद स्व-असंगति इस काम को काफी आसान बना सकती है।

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टोरिया और पीली सरसों में अंतर

वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में सरसों की दो किस्मों पर ध्यान दिया। इनमें टोरिया अपने ही पराग को स्वीकार नहीं करती। दूसरी ओर पीली सरसों अपने पराग को स्वीकार कर लेती है।

शोधकर्ताओं ने नियंत्रित परागण प्रयोगों के जरिए देखा कि इन दोनों पौधों में परागकण किस तरह व्यवहार करते हैं। टोरिया में जब उसके अपने परागकण डाले गए तो पराग नलिकाओं का विकास लगभग नहीं हुआ। लेकिन जब दूसरे पौधे से पराग दिया गया तो पराग नलिकाएं तेजी से बढ़ीं और बीज बनने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

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चार महत्वपूर्ण जीन की पहचान

इसके बाद वैज्ञानिकों ने आणविक और कंप्यूटेशनल तकनीकों की मदद से चार प्रमुख जीनों का अध्ययन किया। इनमें एसआरके, एफईआर1, एमएलपीके और एआरसी1 शामिल हैं। ये जीन फूल की मादा प्रजनन संरचना में पराग को पहचानने और उसके प्रति प्रतिक्रिया देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वैज्ञानिकों ने इन जीनों को अलग करके उनका अनुक्रम देखा और दूसरे संबंधित पौधों के जीन से उनकी तुलना की। इससे यह पुष्टि हुई कि ये जीन सरसों में पाए जाने वाले स्व-असंगति से जुड़े वास्तविक और संरक्षित जीन हैं।

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शोध में इन जीनों से बनने वाले प्रोटीन की संरचना का भी अध्ययन किया गया। इसके लिए वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अल्फाफोल्ड3 तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे प्रोटीन की त्रिआयामी संरचना का अनुमान लगाने में मदद मिली।

जीन बंद करने पर खुला रहस्य

वैज्ञानिकों ने इन जीनों की भूमिका को समझने के लिए उन्हें एक-एक करके अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया। इसके लिए एंटी-सेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड नामक छोटे कृत्रिम अणुओं का इस्तेमाल किया गया। इन्हें फूल के वर्तिकाग्र यानी स्टिग्मा पर लगाया गया।

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जब एसआरके, एफईआर1 या एआरसी1 को शांत किया गया तो टोरिया ने अपने ही पराग को स्वीकार करना शुरू कर दिया। माइक्रोस्कोप से भी इसकी पुष्टि हुई। पराग नलिकाएं सामान्य रूप से बढ़ने लगीं।

एमएलपीके का परिणाम अलग रहा। इसे बंद करने पर स्व-अस्वीकृति पूरी तरह खत्म नहीं हुई, बल्कि केवल कमजोर हुई। इससे पता चला कि टोरिया में एमएलपीके की भूमिका दूसरी सरसों प्रजातियों की तुलना में कम या कुछ हद तक दूसरे जीनों से पूरी होने वाली हो सकती है।

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फूल की दूसरी सुरक्षा भी सामने आई

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि फूल अवांछित पराग से बचने के लिए रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज यानी आरओएस का इस्तेमाल करता है। ये प्रतिक्रियाशील अणु परागकणों को अंकुरित होने से रोक सकते हैं।

एसआरके, एफईआर1 और एमएलपीके को निष्क्रिय करने पर आरओएस का निर्माण कम हो गया। वहीं एआरसी1 को निष्क्रिय करने पर ऐसा असर नहीं दिखा। इससे संकेत मिलता है कि फूल में पराग को रोकने के लिए एक से अधिक सुरक्षा तंत्र काम करते हैं।

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बेहतर हाइब्रिड सरसों की उम्मीद

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन अभी शुरुआती और आधारभूत चरण में है। भविष्य में स्थायी जीन एडिटिंग और अन्य प्रयोगों के जरिए इन निष्कर्षों की और पुष्टि करनी होगी। हालांकि टोरिया और पीली सरसों के बीच सफल क्रॉस से यह संकेत मिला है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल व्यावहारिक प्रजनन कार्यक्रमों में किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में जब बारिश का समय बदल रहा है, गर्मी बढ़ रही है और फसलों पर कीटों का दबाव बढ़ रहा है, तब ऐसी फसलें विकसित करना जरूरी हो गया है जो अधिक उत्पादन देने के साथ बदलते मौसम को भी सह सकें।

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यह शोध भारतीय सरसों में परागण को नियंत्रित करने की प्रक्रिया को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके आधार पर भविष्य में अधिक तेल देने वाली, रोग प्रतिरोधी और मौसम की मार सहने वाली हाइब्रिड सरसों विकसित करने की राह आसान हो सकती है। इससे भारत की खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की कोशिशों को भी मजबूती मिल सकती है।

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