उर्वरक आयात पर खतरनाक निर्भरता: भू-राजनीतिक झटकों के बीच भारत की खाद्य सुरक्षा पर बढ़ता जोखिम

भारत उर्वरक की अपनी 70 प्रतिशत जरूरतों के लिए वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है, जिससे इसकी खाद्य सुरक्षा पर भू-राजनीतिक उथल-पुथल का खतरा मंडराता रहता है
उर्वरक आयात पर खतरनाक निर्भरता: भू-राजनीतिक झटकों के बीच भारत की खाद्य सुरक्षा पर बढ़ता जोखिम
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भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य उत्पादकों में से एक है और इसी वजह से उर्वरकों का बड़ा उपभोक्ता भी है। ऐसे में भारत के लिए इन संसाधनों तक सुरक्षित पहुंच बहुत जरूरी है। हालांकि, भारत खाद्यान्न के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर हो चुका है, लेकिन उर्वरकों के मामले में हकीकत इसके उलट है। तैयार उत्पाद हों या उन्हें बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल, भारत को दोनों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़े बताते हैं कि मात्रा और मूल्य, दोनों के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक आयातक है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी लड़ाई ने यह उजागर कर दिया है कि खेती की पैदावार बनाए रखने के लिए उर्वरकों की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करने में भारत अभी भी कमजोर है।

10 मार्च को केंद्र सरकार ने प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को नियंत्रित करने और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू किया। पेट्रोकेमिकल और उर्वरक कारखानों को दी जाने वाली गैस की आपूर्ति घटाकर 70 प्रतिशत कर दी गई। औद्योगिक सूत्रों के अनुसार, इसके बाद से ये प्लांट्स पूरी क्षमता से कम पर चल रहे हैं और उर्वरकों के दाम बढ़ सकते हैं। 14 मार्च को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भारत आने वाले खरीफ सीजन की तैयारी के तहत फरवरी के मध्य से ही उर्वरकों का स्टॉक जुटा रहा है और पहले से ऑर्डर दे रहा है। 13 मार्च तक के आंकड़ों के अनुसार, यूरिया, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटैशियम (एनपीके) का स्टॉक पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले काफी ज्यादा था। हालांकि, अगर लड़ाई लंबी चली तो यह स्टॉक पर्याप्त नहीं होगा।

निर्भरता का पैमाना

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में उर्वरकों की कुल मांग 6.49 करोड़ टन थी, लेकिन इसके मुकाबले देश में 4.65 करोड़ टन का उत्पादन ही हो सका। सबसे ज्यादा मांग यूरिया की है, इसके बाद एनपीके, डीएपी, और पोटाश का नंबर आता है। घरेलू उत्पादन और मांग के बीच की इस खाई को आयात के जरिए पाटा जाता है, जो साल 2024-25 में 1.6 करोड़ टन रहा। इस आयात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से से आता है। यूरिया के कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा ओमान, सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आता है। डीएपी के मामले में अकेले सऊदी अरब की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से ज्यादा है। इस व्यापार का बड़ा हिस्सा हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है, जो फिलहाल बंद है। इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) के उप महाप्रबंधक (मार्केटिंग) रजनीश पांडे कहते हैं, “भारत की नाइट्रोजन आपूर्ति का लगभग 30-40 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। किसी भी तरह की रुकावट से कीमतें बढ़ेंगी, सब्सिडी बिल का बोझ बढ़ेगा, और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) व्यवस्था के तहत सरकार पर दबाव भी बढ़ेगा।”

हालांकि भारत खाड़ी देशों से पोटाश का आयात नहीं करता है, लेकिन यहां इसके व्यावसायिक रूप से उपयोगी भंडार नहीं हैं। इसका मतलब है कि अपनी पोटाश की जरूरतों के लिए हमें शत-प्रतिशत आयात पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता सिर्फ तैयार उर्वरकों तक सीमित नहीं है। घरेलू उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है। यूरिया के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस का 85 प्रतिशत हिस्सा आयात से आता है। इसके अलावा, रॉक फॉस्फेट का 90-95 प्रतिशत और फॉस्फोरिक एसिड का लगभग आधा हिस्सा विदेशों से आता है। मार्च में जारी किए गए भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) के एक नीति पत्र के अनुसार, यदि इन सभी इनपुट को शामिल कर लिया जाए, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भारत की असल निर्भरता बढ़कर 68–70 प्रतिशत हो जाती है। यह स्थिति उर्वरकों की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए बाहरी झटकों का जोखिम बढ़ा देती है।

जोखिम कैसे कम करें?

आयात पर निर्भरता कम करने की जरूरत कोई नई बात नहीं है। जब 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, तब रातों-रात वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई थीं। जब 2025 में चीन ने डीएपी और दूसरे उर्वरकों के निर्यात पर रोक लगा दी, तो भारतीय कंपनियों ने कच्चा माल आयात करने के लिए यूरोप, रूस और पश्चिम एशिया की ओर रुख किया, लेकिन इसके लिए उन्हें काफी ऊंची कीमतें चुकानी पड़ीं।

आईसीआरआईईआर के नीति पत्र में कहा गया है कि आयात के लिए केवल मुट्ठी भर देशों और खासकर भू-राजनीतिक रूप से अशांत क्षेत्रों पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। इसलिए आयात के स्रोतों और उत्पादों में विविधता लाना सबसे जरूरी कदम है।

केरल के मुख्यमंत्री के पूर्व सचिव और राज्य के “सार्वजनिक क्षेत्र पुनर्गठन एवं ऑडिट बोर्ड” के अध्यक्ष सुकुमारन नायर बताते हैं कि लंबे समय से भू-राजनीतिक झटकों के जवाब में उर्वरकों के निर्यातकों में बदलाव करता रहा है। नायर कहते हैं, “इसी तरह हम 1980 के दशक में अमेरिका और कनाडा से आने वाली महंगी आपूर्ति खत्म कर पाए थे और फॉस्फेट वाले उर्वरकों के लिए मोरक्को और जॉर्डन पर पूरी निर्भरता से भी राहत पा सके थे।” जैसे-जैसे सऊदी अरब, रूस और चीन के उर्वरक उद्योगों का विकास हुआ, भारत की आपूर्ति धीरे-धीरे उनकी ओर स्थानांतरित हो गई। हालांकि, हर बार किसी रुकावट के बाद भारत को फिर से नई व्यवस्था करनी पड़ी है। नायर कहते हैं कि जब पारंपरिक आपूर्तिकर्ता अब पहले जैसे भरोसेमंद नहीं रहे, तो भारत के पास दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया, जैसे मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम, और ऑस्ट्रेलिया से उर्वरक और उनके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को लेने का विकल्प बचता है।

लेकिन केवल आयात के स्रोतों में विविधता लाना ही काफी नहीं होगा। आईसीआरआईईआर के नीति पत्र के अनुसार, “भारत में पहले से ही विदेशों में सफल उर्वरक उपक्रम मौजूद हैं, जैसे कि ओमान इंडिया फर्टिलाइजर कंपनी (ओएमआईएफसी)। संसाधन-संपन्न देशों में लंबी अवधि वाले ऑफ-टेक समझौतों और संयुक्त उपक्रमों के जरिए इस मॉडल का विस्तार करके ज्यादा स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकती है। पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं को प्रभावित करने वाले मौजूदा भू-राजनीतिक तनावों को देखते हुए, भारत को खाड़ी देशों से आगे बढ़कर अफ्रीका, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका के उत्पादकों के साथ भी साझेदारी करनी चाहिए।” नीति पत्र में आगे कहा गया है कि वैश्विक रॉक फॉस्फेट भंडार की 70 प्रतिशत हिस्सेदारी वाला मोरक्को अपस्ट्रीम निवेश के लिए एक अपेक्षाकृत स्थिर जगह मुहैया कराता है, क्योंकि यह सीधे-सीधे युद्ध क्षेत्र में नहीं आता है। लंबी अवधि के दौरान, भारत को तात्कालिक खरीद से आगे बढ़कर उर्वरक सुरक्षा के लिए ज्यादा रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। एक सुझाव यह है कि एक खास निवेश फंड बनाया जाए, जिससे भारतीय कंपनियां विदेशों में पोटाश और रॉक फॉस्फेट जैसे खनिज संसाधनों में हिस्सेदारी ले सकें। यह विचार सबसे पहले 2012 में उर्वरक मंत्रालय ने पेश किया था।

गैर-रासायनिक विकल्पों को अपनाने की जरूरत

मई 2021 में श्रीलंका ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के चक्कर में अचानक रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के आयात पर रोक लगा दी। इसका नतीजा यह हुआ कि फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आई और वहां खाने-पीने का संकट खड़ा हो गया। भारत, जिसकी आबादी 140 करोड़ है और जिसका कृषि क्षेत्र कहीं बड़ा है, ऐसे किसी प्रयोग का जोखिम नहीं उठा सकता। इसके बावजूद, विशेषज्ञों का कहना है कि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में धीरे-धीरे और सावधानी से कमी लाना संभव भी है और जरूरी भी। इस बदलाव को सफल बनाने के लिए जैव उर्वरकों, जैविक खाद, कंपोस्ट, नैनो उत्पादों जैसे आधुनिक विकल्पों और भविष्य में ग्रीन अमोनिया का सहारा लेना होगा।

गुजरात में सस्टेनेबल खेती को बढ़ावा देने वाले जतन ट्रस्ट के कपिल शाह कहते हैं, “जैविक खेती की ओर बढ़ना संभव है।” असल में, भारत अगले 10 सालों के भीतर काफी हद तक जैविक या प्राकृतिक खेती की ओर शिफ्ट हो सकता है, लेकिन इसके लिए एक साफ और वैज्ञानिक आधार वाली रणनीति की जरूरत होगी। उनका मानना है कि इसमें सबसे अहम भूमिका स्थानीय स्तर पर पोषक तत्वों के बेहतर प्रबंधन की है।

खेती और कृषि-प्रसंस्करण से निकलने वाला कचरा जैसे कि धान की भूसी, गन्ने की खोई और सब्जियों के अवशेष ग्रामीण भारत में भारी मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन फिलहाल इनका सही इस्तेमाल नहीं हो पाता। इन्हें या तो जला दिया जाता है या ऐसे ही फेंक दिया जाता है।

घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी है, खासकर तब जब ऊर्जा और उर्वरक बाजार एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। उर्वरक बनाने में इस्तेमाल होने वाला एक जरूरी कच्चा माल अमोनिया अब लंबी दूरी के जहाजों के लिए ईंधन के तौर पर भी उभर रहा है

सब्सिडी व्यवस्था में सुधार

उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था में सुधार करना भी उतना ही जरूरी है। साल 2024–25 में सरकार ने इस सब्सिडी पर 1,77,157 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें से 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ यूरिया पर गया। इतनी भारी सब्सिडी की वजह से लंबे समय से इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होता रहा है। कई बार किसान जरूरत से ज्यादा मात्रा में इसका उपयोग करते हैं, जिससे पोषक तत्व बहकर बर्बाद हो जाते हैं और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने यूरिया की खुदरा कीमत बढ़ाने की सिफारिश की है, जो 2018 से ₹242 प्रति 45 किलो की बोरी पर स्थिर है। साथ ही, किसानों को इसकी भरपाई के लिए प्रति एकड़ (0.4 हेक्टेयर) के आधार पर सीधे नकद पैसे देने का सुझाव दिया गया है। फिलहाल, यूरिया की कुल लागत का 85-90 प्रतिशत हिस्सा सरकार खुद उठाती है।

वैकल्पिक उत्पादों को बढ़ावा तो दिया गया है, लेकिन उनके नतीजे मिले-जुले रहे हैं। 2021 में शुरू किए गए नैनो लिक्विड यूरिया को पारंपरिक उर्वरक के विकल्प के तौर पर पेश किया गया था, जिससे लागत और आयात कम होने और पैदावार बढ़ने की उम्मीद थी। लेकिन इसके प्रभाव को लेकर अब तक कोई पक्का सबूत नहीं है और इसका इस्तेमाल भी सीमित रहा है। जमीनी रिपोर्टें बताती हैं कि फसलों पर इसका कुछ खास असर नहीं हुआ। वहीं, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के दो साल के अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक उर्वरक की तुलना में नैनो यूरिया से चावल और गेहूं की पैदावार कम हुई और अनाज में नाइट्रोजन की मात्रा भी घट गई। फॉस्फेट की खपत के मामले में भारत की जरूरत से ज्यादा निर्भरता मुख्य तौर पर डीएपी पर टिकी है, जिससे जोखिम और भी बढ़ रहा है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट और अमोनियम सल्फेट जैसे कम पोषक तत्व वाले उर्वरकों की ओर रुख किया जाना चाहिए। वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी है, खासकर तब जब ऊर्जा और उर्वरक बाजार एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। उर्वरक बनाने में इस्तेमाल होने वाला एक जरूरी कच्चा माल अमोनिया अब लंबी दूरी के जहाजों के लिए ईंधन के तौर पर भी उभर रहा है। 2023 में शुरू किए गए भारत के “नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन” का लक्ष्य लक्ष्य देश को ग्रीन हाइड्रोजन और अमोनिया के ग्लोबल हब के रूप में स्थापित करना है।

नायर का सुझाव है कि ऊर्जा क्षेत्र के साथ बेहतर तालमेल से निजी निवेश बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, नए प्लांट जल्दी शुरू करने और पुराने प्लांट को आधुनिक बनाने से उत्पादन और क्षमता दोनों में बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा, बेहतर प्रोसेसिंग के जरिए भारत में मौजूद कम गुणवत्ता वाले रॉक फॉस्फेट का भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

उर्वरकों के बेहतर और संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सरकारी नीतियां अभी भी पूरी तरह से व्यवस्थित नहीं हैं। रासायनिक उर्वरकों की खपत घटाने, मिट्टी की सेहत सुधारने और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए साल 2023 में “पीएम-प्रणाम” योजना शुरू की गई थी, जिसमें खाद का इस्तेमाल कम करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान था। लेकिन अपने आखिरी साल (2025–26) में पहुंचने के बाद भी यह योजना खास आगे नहीं बढ़ पाई। हाल ही में एक संसदीय समिति ने बताया कि अभी तक किसी भी राज्य को इसके तहत कोई फंड या पैसा नहीं दिया गया है। हालांकि, मौजूदा संकट एक मौका दे सकता है कि इस क्षेत्र में सुधार के जो प्रस्ताव लंबे समय से अटके हुए हैं, उन्हें अब लागू किया जाए।

पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट नरसिम्हा रेड्डी डोंथी का सुझाव है कि इस संसाधन के बेहतर इस्तेमाल के लिए “राष्ट्रीय जैविक कंपोस्ट मिशन” शुरू किया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी ढांचे के कुछ हिस्से पहले से मौजूद हैं, जैसे कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत कई शहरों में गीले कचरे को अलग किया जाता है, जिसे आसानी से कंपोस्ट में बदला जा सकता है। हालांकि, पोषक तत्वों को रीसाइकल करना ही पूरी समस्या का हल नहीं है।

पौधों के लिए सबसे जरूरी पोषक तत्व नाइट्रोजन है और इसका भारत सबसे ज्यादा आयात करता है। लेकिन इसे दोबारा सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि यह हवा में घुल-मिल जाता है। शाह का तर्क है कि इसका विकल्प मिट्टी के जीवविज्ञान में छिपा है। ऐसी मिट्टी, जिसमें जैविक पदार्थ भरपूर हों और जिसमें नाइट्रोजन स्थिर करने वाले सूक्ष्म जीव मौजूद हों, वह सीधे हवा से नाइट्रोजन खींच सकती है। यह विदेशों से मंगाए जाने वाले यूरिया का एक प्राकृतिक और जैविक विकल्प बन सकता है।

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