

वर्ष 2000 से 2020 के बीच दुनिया के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 2.49 लाख वर्ग किलोमीटर खेती की जमीन का नुकसान हुआ।
युद्ध प्रभावित क्षेत्र दुनिया की कुल जमीन का तीन प्रतिशत हैं, लेकिन वर्ष 2020 में छह प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि इन्हीं क्षेत्रों में थी।
संघर्ष प्रभावित इलाकों में खेती की जमीन औसतन तीन प्रतिशत घटी, जबकि शांतिपूर्ण क्षेत्रों की तुलना में नुकसान 23.7 प्रतिशत अधिक रहा।
युद्ध के कारण खोई खेती की जमीन पर पैदा होने वाला भोजन लगभग 25.5 करोड़ लोगों की न्यूनतम सालाना खाद्य ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता था।
पश्चिमी अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में खेती की जमीन का नुकसान अधिक रहा, जबकि मजबूत प्रशासन वाले देशों में नुकसान कम हुआ।
युद्ध का असर केवल लोगों की जान जाने, घरों के उजड़ने और शहरों के तबाह होने तक सीमित नहीं है। इसका एक गंभीर असर खेती की जमीन पर भी पड़ता है। युद्ध के कारण खेतों में खेती बंद हो जाती है, जमीन खराब हो जाती है और किसानों को अपना घर छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता है। इसका नुकसान लंबे समय तक बना रहता है, भले ही युद्ध समाप्त क्यों न हो जाए।
‘नेचर फूड’ पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 से 2020 के बीच दुनिया के संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खेती की जमीन कम हुई। इससे भविष्य में खाद्य उत्पादन और करोड़ों लोगों की भोजन संबंधी जरूरतों पर असर पड़ सकता है।
दुनिया भर के आंकड़ों से हुआ अध्ययन
यह अध्ययन चीन के विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोग्राफिक साइंसेज एंड नेचुरल रिसोर्सेज रिसर्च के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किया गया है।
शोधकर्ताओं ने साल 2000 से 2020 तक के उपग्रह आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इसमें 30 मीटर के स्तर पर खेती की जमीन में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया गया। साथ ही, 155 देशों में हुई 4.6 लाख से अधिक सशस्त्र संघर्ष की घटनाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
शोधकर्ताओं ने संघर्ष वाली जगहों के पांच किलोमीटर के दायरे में खेती की जमीन में हुए बदलावों को देखा। उन्होंने सांख्यिकीय तरीकों से यह समझने की कोशिश की कि जमीन में कितनी कमी सीधे संघर्ष के कारण हुई और कितनी कमी दूसरे कारणों से आई।
युद्ध वाले इलाकों में ज्यादा घटी खेती की जमीन
अध्ययन के अनुसार, संघर्ष प्रभावित क्षेत्र दुनिया की कुल जमीन का लगभग तीन प्रतिशत हैं। लेकिन वर्ष 2020 में दुनिया की छह प्रतिशत से अधिक कृषि भूमि इन्हीं क्षेत्रों में थी। वर्ष 2000 से 2020 के बीच दुनिया में खेती की जमीन का कुल क्षेत्रफल बढ़ा। इसके उलट, संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में खेती की जमीन कम होती गई।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, सशस्त्र संघर्ष से प्रभावित इलाकों में खेती की जमीन में औसतन लगभग तीन प्रतिशत की कमी आई। हर प्रभावित क्षेत्र में औसतन सालाना करीब 14.5 हेक्टेयर जमीन कम हुई।
शांतिपूर्ण क्षेत्रों की तुलना में संघर्ष प्रभावित इलाकों में खेती की जमीन का नुकसान 23.7 प्रतिशत अधिक था। पश्चिमी अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में इसका असर खास तौर पर देखा गया। कुल मिलाकर, इन दो दशकों में संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में लगभग 2.49 लाख वर्ग किलोमीटर खेती की जमीन का नुकसान हुआ।
25.5 करोड़ लोगों के भोजन जितनी क्षमता प्रभावित
खेती की जमीन कम होने का असर केवल किसानों की आजीविका पर नहीं पड़ता, बल्कि इससे दुनिया की खाद्य आपूर्ति भी प्रभावित होती है। अध्ययन के अनुसार, खोई हुई जमीन पर जितना भोजन पैदा किया जा सकता था, उससे लगभग 25.5 करोड़ लोगों की न्यूनतम सालाना ऊर्जा संबंधी खाद्य जरूरतें पूरी हो सकती थीं।
हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह संभावित खाद्य उत्पादन का अनुमान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि इतने लोग सीधे भूखे रह गए। लोगों तक भोजन पहुंचना व्यापार, कीमतों, वितरण व्यवस्था और उनकी खरीदने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।
फिर भी, खेती की जमीन का नष्ट होना या खाली पड़े रहना भविष्य के खाद्य उत्पादन के लिए बड़ा खतरा है।
लंबे युद्ध से नुकसान भी ज्यादा
अध्ययन में पाया गया कि हर संघर्ष का असर एक जैसा नहीं होता। जिन क्षेत्रों में बार-बार लड़ाई हुई, वहां खेती की जमीन का नुकसान लगभग एक-तिहाई तक पहुंच गया। लंबे समय तक चलने वाले और अधिक तीव्र संघर्षों में नुकसान ज्यादा हुआ।
युद्ध के कारण किसानों को अपने खेत छोड़ने पड़ते हैं। कई जगह सिंचाई व्यवस्था, सड़कें और कृषि से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी प्रभावित होता है। इससे खेती दोबारा शुरू करना मुश्किल हो जाता है।
मजबूत प्रशासन से मिल सकती है सुरक्षा
अध्ययन में एक उम्मीद जगाने वाली बात भी सामने आई। जिन क्षेत्रों में संघर्ष समाप्त होने के बाद शांति लौटी, वहां खेती की जमीन में लगातार गिरावट का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला। इससे पता चलता है कि सही प्रयासों से कृषि व्यवस्था को संभाला जा सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन देशों में प्रशासन अधिक प्रभावी था, कानून का शासन बेहतर था और नियामक संस्थाएं मजबूत थीं, वहां खेती की जमीन का नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। इसके विपरीत, विस्थापन और खाद्य असुरक्षा वाले क्षेत्रों में नुकसान अधिक देखा गया।
खेती बचाने के लिए जरूरी हैं लंबे समय के प्रयास
अध्ययन के अनुसार, युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में केवल तत्काल राहत देना पर्याप्त नहीं है। किसानों की वापसी, खेतों की बहाली, सिंचाई सुविधाओं की मरम्मत और कृषि व्यवस्था को मजबूत करने पर भी ध्यान देना जरूरी है।
युद्ध समाप्त होने के बाद भी खेती को सामान्य होने में कई साल लग सकते हैं। इसलिए संघर्ष की निगरानी के साथ खेती की जमीन में होने वाले बदलावों पर भी नजर रखनी चाहिए।
विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि युद्ध का नुकसान केवल वर्तमान तक सीमित नहीं रहता। यदि समय पर कदम नहीं उठाए गए, तो खेती की जमीन का नुकसान आने वाले वर्षों में खाद्य सुरक्षा और लाखों किसानों की आजीविका के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।