

भारत के जंगलों की सरहदों पर बाघों की एक नई कहानी गढ़ी जा रही है। ये घास के मैदानों में राज करने वाले या फिर जंगलों में हिरणों का शिकार करने वाले बाघ नहीं हैं। इसके उलट, ये लैंटाना कैमारा की उन घनी झाड़ियों के बीच बसेरा बना चुके हैं, जहां घुसना तक नामुमकिन है। इस आक्रामक प्रजाति को लैंटाना, घाणेरी, टणटणी, राईमुनिया, वन फंदा, उन्नीचेड़ी, गाजू पुलु आदि नामों से भी जाना जाता है।
लैंटाना के ये शिकारी बाघ उन इलाकों में शिकार तलाशते हैं, जहां घास चरने वाले जंगली जानवर आमतौर पर कदम भी नहीं रखते। इन बाघों का मुख्य शिकार चीतल या सांबर नहीं, बल्कि वे मवेशी हैं जो या तो बूढ़े हो चुके हैं या फिर लावारिस छोड़ दिए गए हैं। खास बात यह है कि ये बाघ अब संरक्षित इलाकों की सीमा के भीतर नहीं, बल्कि उनके बाहर ज्यादा नजर आ रहे हैं। “शुगरकेन टाइगर्स” यानी गन्ने के खेतों में रहने वाले बाघों को देख चुके भारत के सामने अब एक नया और अजीबोगरीब अध्याय खुल रहा है जिसे “लैंटाना टाइगर्स” कहा जा रहा है और इनकी तादाद बढ़ती जा रही है।
यह महज एक रूपक भर नहीं है। बल्कि, यह एक इकोलॉजिकल पैटर्न है जो पूरे भारत में पैर पसार रहा है, खासकर बांधवगढ़, ताडोबा, कान्हा और पेंच जैसे टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में। यह कहानी तेजी से फैलने वाले एक विदेशी पौधे, बदलती पशुपालन अर्थव्यवस्था और एक ऐसे शिकारी के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो समाज की सोच से कहीं ज्यादा तेजी से खुद को ढाल रहा है। यह हालात एन्थ्रोपोसीन युग में सहअस्तित्व, संघर्ष और संरक्षण के प्रति हमारे नजरिए को पूरी तरह बदल सकते हैं।
लैंटाना 19वीं सदी की शुरुआत में भारत लाई गई थी, ताकि उसका इस्तेमाल बाड़ लगाने और सजावटी पौधे के रूप में किया जा सके। आज यह देश की सबसे आक्रामक प्रजातियों में से एक बन चुकी है। यह जंगलों, झााड़ियों वाले इलाकों और गांवों की साझा जमीनों के 50 फीसदी हिस्से पर फैल चुकी है। हर साल नए इलाकों में तेजी से इसका प्रसार हो रहा है। लैंटाना तो बस ऐसी कई आक्रामक वनस्पतियों का एक उदाहरण भर है, जो लगातार फैल रही हैं, घनी होती जा रही हैं। इसी तरह, वैश्विक बदलावों के कारण अब देसी पेड़ों की कई प्रजातियां भी खुले इलाकों जैसे घास के मैदानों आदि में तेजी से कब्जा कर रही हैं।
यहां मुद्दा सिर्फ लैंटाना नहीं है, बल्कि इससे शुरू होने वाली पूरी श्रृंखलाबद्ध प्रक्रिया है। लैंटाना जहां भी फैलना शुरू करती है, वहां इतनी घनी झाड़ियां खड़ी कर देती है, जिससे स्थानीय घास और जड़ी-बूटियां दम तोड़ देती हैं।
घास चरने वाले चीतल, सांबर और नीलगाय जैसे जंगली जानवरों के लिए चारा खत्म करके लैंटाना एक ऐसा इलाका तैयार कर देता है, जो बनावट के लिहाज से तो जटिल है, लेकिन वहां शिकार की बहुत किल्लत होती है। ऐसे इलाकों में चारा कम होता है, दूर तक देखना मुश्किल होता है और आवाजाही में बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। जैसे-जैसे लैंटाना फैलता है, घास चरने वाले जानवर पीछे हटते जाते हैं और फिर वे या तो संरक्षित इलाकों के अंदर सिमट जाते हैं या फिर बचे-खुचे सुरक्षित ठिकानों में छिप जाते हैं।
लेकिन, बाघों के लिहाज से हालात एकदम अलग होते हैं। उनके लिए लैंटाना की झाड़ियां छिपने का बेहतरीन ठिकाना हैं। यहां दृश्यता कम होती है और शिकार के लिए भागने के रास्ते सीमित होते हैं। सबसे अहम बात यह है कि झाड़ियों से घिरे ये इलाके अक्सर पशुपालन और खेती वाले इलाकों के बीच मौजूद होते हैं। ठीक वहीं, जहां मवेशियों का जमावड़ा होता है। अनजाने में ही सही, लैंटाना ने उन इलाकों में शिकारियों के अनुकूल माहौल तैयार कर दिया है, जहां हिरण जैसे जंगली शिकार का नामोनिशान नहीं है।
भारत के अधिकतर हिस्सों में लाखों मवेशी खुलेआम घूमते रहते हैं। इनमें खासतौर पर वे जानवर शामिल हैं, जो अब दूध नहीं देते, बूढ़े या कमजोर हो चुके हैं। ऐसे मवेशी ग्रामीण परिवारों के लिए बोझ बन गए हैं और उन्हें पालना आर्थिक तौर पर मुश्किल हो गया है। ये मवेशी जंगलों की सरहदों, गांवों की सामुदायिक जमीनों, परती भूमि और अब तेजी से फैलते लैंटाना से भरे झाड़-झंखाड़ वाले इलाकों में चरते हैं। बाघों के लिए ऐसे इलाके ऊर्जा का एक बड़ा भंडार हैं।
मवेशी आकार में चीतल से बड़े होते हैं, सांबर के मुकाबले सुस्त होते हैं और अक्सर उन पर कोई निगरानी रखने वाला भी नहीं होता। बाघ हमेशा से मवेशियों का शिकार करते आए हैं। संभव है कि मवेशियों को पालतू बनाए जाने से पहले भी वे बाघों की पहली पसंद रहे हों। ऐसे इलाकों में जहां जंगली शिकार ढूंढने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और इंसानों से आमना-सामना होने का जोखिम रहता है, वहां मवेशी भरोसेमंद और “हाई-कैलोरी” वाला भोजन साबित होते हैं। इसलिए, मवेशी बाघों के लिए स्वाभाविक चुनाव हैं। इस व्यवहार को “ऑप्टिमल फोरेजिंग थ्योरी” के जरिए समझा जा सकता है। यह सिद्धांत बताता है कि जानवर किस तरह से कम मेहनत में ज्यादा पोषण वाला शिकार चुनते हैं। यह महज कोई इत्तेफाक नहीं है कि बाघों द्वारा मवेशियों के शिकार की सबसे ज्यादा घटनाएं अब संरक्षित इलाकों से बाहर हो रही हैं। ठीक उन्हीं जगहों पर, जहां लैंटाना का असर सबसे ज्यादा है।
दशकों से भारत में बाघों का सरंक्षण एक स्पष्ट रणनीति पर टिकी रही है, जो भौगोलिक प्रबंधन से जुड़ी है। इसमें बाघों के लिए संरक्षित कोर एरिया, मिलजुल कर रहने के लिए बफर जोन और उनके बाहर इंसानी आबादी वाले इलाके शामिल हैं। लेकिन लैंटाना अब इस बंटवारे और सीमाओं को धुंधला कर रही है। बांधवगढ़ और ताडोबा जैसी जगहों पर बाघ अब संरक्षित क्षेत्र से बाहर आ रहे हैं और लैंटाना की घनी झाड़ियों वाले इलाकों का इस्तेमाल दिन में छिपने और शिकार करने के लिए कर रहे हैं। बनावट के लिहाज से ये इलाके किसी घने जंगल के भीतरी हिस्से जैसे नजर आते हैं, पर सामाजिक तौर पर ये गांव की जमीनें हैं। इसका नतीजा एक अनोखे सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र के रूप में सामने आया है। यहां जंगल जैसी संरचना तो है, पर जंगली शिकार नदारद हैं। यहां गांव की जमीन का इस्तेमाल तो हो रहा है, पर इंसानों का उस पर नियंत्रण बहुत कम है। और यहां बाघ व तेंदुए जैसे शिकारी अब पूरी तरह पालतू जानवरों पर निर्भर हो रहे हैं। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष का कोई पारंपरिक मामला नहीं है। बल्कि उससे कहीं ज्यादा अजीब और संभवत: स्थायी समस्या बन चुकी नई हकीकत है। जब कोई बाघ मवेशियों का शिकार करता है, तो अक्सर उसके बदले मुआवजे की प्रक्रिया शुरू होती है। कई ग्रामीण परिवारों के लिए यह मुआवजा उस मवेशी की बाजार में कीमत से भी ज्यादा हो सकता है, खासकर जिनके पास बूढ़े, कमजोर जानवर हैं। यहीं से एक ऐसी परिस्थिति पैदा होती है, जो ऊपरी तौर पर तो विरोधाभास लगती है लेकिन भीतर ही भीतर खामोश हकीकत बन चुकी है।
कुछ इलाकों में बाघों का मवेशियों का शिकार करना हमेशा कड़वाहट या गुस्से की वजह नहीं बनता। अगर मुआवजे का फायदा मिले, तो इसे बर्दाश्त भी कर लिया जाता है। इस तरह, बाघ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अनकहा हिस्सा बन जाता है। वह बोझ बन चुके मवेशियों को नकदी में तब्दील करने का जरिया बन जाता है। हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि लोग अपने घरों के पास और ज्यादा बाघ चाहते हैं। डर, जोखिम और नाराजगी आज भी मौजूद है। लेकिन यह इशारा जरूर करता है कि लैंटाना प्रभावित इलाकों में मवेशियों का शिकार हमेशा बदले का रूप नहीं लेता। हालांकि, यह स्थिति बाघों के व्यवहार को बिगाड़ सकती है। यह एक ताकतवर शिकारी को इंसानों के बेहद करीब ले आती है और इंसानी मदद पर उसकी निर्भरता बढ़ा देती है।
पारिस्थितिकी नजरिए से यह बात बहुत अहमियत रखती है। जब बड़े शिकारियों को मवेशियों के रूप में एक तरह की सब्सिडी मिलने लगती है, तो उनके प्राकृतिक आवास को बचाने और उसे सुधारने की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है। अगर सुरक्षा के इंतजाम बेहतर भी हो जाएं, तब भी लैंटाना की अधिकता वाले ये इलाके घास चरने वाले जंगली जानवरों के फिर से बसने के लिए अनुकूल नहीं रह जाते। क्योंकि वहां देसी चारा पूरी तरह खत्म हो चुका होता है। यह स्थिति पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को एक “पारिस्थितिक जाल” में फंसा सकती है, जहां जंगली शिकार की भारी कमी के बावजूद शिकारी तो मौजूद रहते हैं, लेकिन सिस्टम अपनी स्वाभाविक स्थिति में नहीं लौट पाता। यह सह-अस्तित्व के एक ऐसे नए दौर की ओर इशारा करता है, जो जंगली शिकार की बहाली पर नहीं, बल्कि पौधों की आक्रामक प्रजातियों, बेसहारा छोड़ दिए गए आवारा पशुओं और सरकारी प्रबंधन के तालमेल पर टिका है। “लैंटाना टाइगर” शायद सिर्फ व्यवहार में आए लचीलेपन का उदाहरण भर नहीं हैं। वक्त के साथ, यह प्रक्रिया उन बाघों के प्राकृतिक चुनाव को बढ़ावा दे सकती है, जो ज्यादा निडर हों, व्यवहार में ज्यादा लचीले हों और जटिल बनावट वाले लेकिन पारिस्थितिक रूप से बिगड़े हुए इलाकों में खुद को ढालने में माहिर हों। दूसरे शब्दों में कहें तो लैंटाना सिर्फ जमीन की सूरत ही नहीं बदल रही, बल्कि शिकारियों की बुनियादी रणनीतियों को भी नया आकार दे रही है।
फिलहाल इन दिनों आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन के तहत लैंटाना को हटाना निस्संदेह तौर पर सही और अच्छा कदम माना जा रहा है। अगर हम वनस्पतियों, जैवविविधता और इकोसिस्टम सर्विसेज के लिहाज से यह नजरिया बिल्कुल सही है। लेकिन टाइगर इकोलॉजी के लिहाज से यह कहानी कहीं ज्यादा उलझी हुई और पेचीदा है। अगर स्थानीय घासों को दोबारा उगाए बिना ही सिर्फ लैंटाना को हटा दिया जाए, तो इसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इससे संरक्षित क्षेत्रों के बाहर बाघों के छिपने के ठिकाने अचानक खत्म हो सकते हैं, जिससे उन्हें वापस संरक्षित क्षेत्रों के कोर एरिया की तरफ जाने को मजबूर होना पड़ेगा।
हालांकि ऐसा बहुत कम होता है क्योंकि कोर एरिया पहले से ही बाघों की भारी आबादी से भरे होते हैं। ऐसी स्थिति में संरक्षित क्षेत्रों के भीतर आपसी होड़ और संघर्ष बढ़ सकता है या फिर बाघों को खुले और जोखिम भरे इलाकों में शिकार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इसके उलट, अगर लैंटाना को बेरोकटोक बढ़ने दिया जाए तो यह घास चरने वाले जंगली जानवरों के लिए पारिस्थितिक जाल का काम करती है। मवेशियों के शिकार की समस्या स्थायी रूप ले लेती है। विजिबिलिटी कम होने से इकोसिस्टम सर्विसेज को लंबे समय तक नुकसान पहुंचता है। यह संरक्षण की एक ऐसी दुविधा है जिसका कोई आसान हल फिलहाल मौजूद नहीं है।
“लैंटाना टाइगर” कोई इत्तेफाक नहीं हैं। यह एन्थ्रोपोसीन के दौर में कंजर्वेशन की बदलती हकीकत की एक बानगी हो सकती है। यह हमें एक बहुत ही कड़वे सवाल का सामना करने पर मजबूर करता है कि अगर बाघ इन आक्रामक और इंसानी हस्तक्षेप वाले इलाकों में न केवल जीवित हैं, बल्कि फल-फूल रहे हैं, तो हम असल में किसका संरक्षण कर रहे हैं? क्या लैंटाना की घनी झाड़ियों को हम वाकई “हैबिटेट” कह सकते हैं? क्या मवेशी बाघों के वैध शिकार माने जा सकते हैं? और क्या मुआवजे पर टिका यह सहअस्तित्व लंबे समय तक चल पाएगा? ये सवाल संरक्षण की बुनियाद को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसे और धार देते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि पारिस्थितिक वास्तविकता हमारी विचारधाराओं के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बदल रही है। इन असहज कर देने वाले पैटर्न को नजरअंदाज करने से वे गायब नहीं हो जाएंगे।
बाघ, मवेशी और लैंटाना की यह कहानी संरक्षण की कोई सुखद गाथा नहीं है। यह इकोलॉजिकल इंजीनियरिंग की चालाकी में लिपटी एक चेतावनी है। यह दिखाती है कि कैसे एक आक्रामक प्रजाति का पौधा शिकारी और शिकार के रिश्तों को पूरी तरह बदल सकता है। यह वन्यजीवन और समाज के बीच की सरहदों को फिर से परिभाषित कर रहा है। साथ ही, यह ऐसे नए पारिस्थितिकी तंत्र तैयार कर रहा है जो कामयाबी और नाकामी के बीच के एक अनिश्चित मोड़ पर खड़े हैं। भारत के बाघ हमारी गलतियों का अंजाम भुगतते हुए सिर्फ किसी तरह अपनी जान ही नहीं बचा रहे, बल्कि वे खुद को उन गलतियों के हिसाब से ढाल भी रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या हम भी इसके जवाब में खुद को बदल पाएंगे?
चाहे वह इन आक्रामक पौधों को नियंत्रित करना हो, स्थानीय वनस्पतियों को फिर से उगाना हो या संरक्षित इलाकों के बाहर सहअस्तित्व पर नए सिरे से विचार करना हो, हमारे कदम ही यह तय करेंगे कि “लैंटाना टाइगर” भविष्य की ओर ले जाने वाला पुल बनेंगे या फिर यह पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश का महज एक लक्षण बनकर रह जाएंगे।
एक बात तो पूरी तरह साफ है, बांधवगढ़ या ताडोबा के बाहर लैंटाना की झाड़ियों के बीच शिकार की तलाश में घूमते बाघ अब अपवाद नहीं हैं। यह आने वाले समय का संकेत है।
(निनाद अविनाश मुंगी डेनमार्क की आरहूस यूनिवर्सिटी और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से जुड़े हैं। रजत रस्तोगी वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेटिव बायोडायवर्सिटी रिसर्च, जर्मनी से संबद्ध हैं। जेन्स क्रिश्चियन स्वेनिंग आरहूस यूनिवर्सिटी से हैं)