

योगेंद्र कुमार कनौजिया को हर साल जुलाई और दिसंबर का इंतजार रहता है। जुलाई में सारस के घोंसलों और दिसंबर में सारस की संख्या जानने के लिए वह सुबह-सुबह हाथों में दूरबीन लिए अपने साथियों के सर्वेक्षण के लिए निकल पड़ते हैं और शाम होते-होते उनके पास आंकड़े आ जाते हैं।
योगेंद्र के गांव में दो तालाब है जिनमें एक 27 एकड़ में फैला और दूसरे का क्षेत्रफल 4 एकड़ है। जुलाई 2025 में हुए पिछले सर्वेक्षण में उन्हें अपने गांव के दोनों तालाबों में सारस के 3 घोंसले और 6 सारस पक्षी दिखाई दिए। 2024 में घाेंसलों की संख्या 2 और सारस की संख्या 4 थी। पिछले 13 वर्षों में वह अपने गांव में 30 घोंसलों और 114 सारस का सर्वेक्षण कर चुके हैं।
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के बैदाैली गांव के रहने योगेंद्र अपने गांव से दो किलोमीटर दूर निचलौल तहसील में फोटो स्टूडियो चलाते हैं। हालांकि वह अपने गांव में सारस मित्र के रूप में अधिक लोकप्रिय हैं। वन्यजीव संरक्षण के प्रतिबद्ध संगठन वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) द्वारा 2013 में सारस के संरक्षण के लिए उनके गांव में सारस संरक्षण समिति बनाई गई थी, तभी से वह समिति के अध्यक्ष और सारस मित्र के रूप में स्वैच्छिक अवैतनिक सेवाएं दे रहे हैं। सारस और अंडों के सर्वेक्षण के साथ अपने गांव में इस पक्षी को संरक्षित करने में उनकी बड़ी भूमिका है।
डब्ल्यूटीआई ने 2013 में सारस हैबिटेट सिक्योरमेंट प्रोजेक्ट के तहत बैदौली गांव काे चुना था। 2019 से पहले इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य सारस क्रेन का संरक्षण करना था। ये सारस संरक्षित क्षेत्रों के बाहर खेतों और वेटलैंड के मिले-जुले इलाकों में रहते थे। लेकिन 2019 के बाद इस प्रोजेक्ट का दायरा बढ़ गया और पूर्वी उत्तर प्रदेश के वेटलैंड्स को सुरक्षित करना इसका मुख्य फोकस बन गया ।
टाटा ट्रस्ट, स्थानीय संगठनों और उत्तर प्रदेश वन विभाग द्वारा समर्थित इस प्रोजेक्ट के तहत सारस संरक्षण समिति और तालाब प्रबंधन समिति के जरिए सारस के आवास को सामुदायिक भागीदारी के जरिए संरक्षित करने का प्रयास होता है।
सारस संरक्षण समिति से सबसे सक्रिय सदस्य का चयन सारस मित्र के रूप में होता और कोषाध्यक्ष व सचिव अन्य महत्वपूर्ण पद होते हैं। इनके अलावा समिति में सदस्य के रूप में औसतन 12-15 लोग शामिल होते हैं। वहीं तालाब प्रबंधन समिति में उन्हें सदस्य बनाया जाता है जिनके खेत तालाब के आसपास होते हैं। इस समिति का सबसे सक्रिय सदस्य अध्यक्ष चुना जाता है।
इस परियोजना के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की गतिविधियां संचालित की जाती हैं, जैसे स्वयंसेवकों की मदद से सारस की संख्या का निगरानी, किसानों के साथ मिलकर घोंसलों की सुरक्षा, बच्चों के बीच जागरुकता कार्यक्रम तथा आर्द्रभूमियों के संरक्षण और सुरक्षा के उपाय। ये सभी गतिविधियां 10 जिलों के लगभग 25 प्रखंडों के 100 से अधिक गांवों में संचालित हो रही हैं।
बजहीं गांव के सारस मित्र ठाकुर यादव डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि इन गतिविधियों के कारण ग्रामीण सारस के संरक्षण के प्रति जागरुक हो गए। वह स्पष्टता के साथ कहते हैं कि 2013 से पहले कुछ लोग सारस का शिकार खाने के लिए करते थे। जागरुकता के कारण शिकार तो बंद हो ही गया है, साथ ही अब वे किसान भी सारस के अंडों को संरक्षित करते हैं जिनके खेत में ये विशाल पक्षी घोंसला बनाते हैं।
योगेंद्र के अनुसार, सारस पानी से भरे धान के खेतों में धान के पौधों को तोड़कर ही अपना घोंसला बनाती है, इसलिए खेतों को थोड़ा बहुत नुकसान होता है, लेकिन हम किसानों को समझाने में कामयाब होते हैं कि उनके नुकसान की भरपाई हो जाएगी। ऐसे किसानों को हर साल 2 फरवरी को वेटलैंड दिवस पर होने वाले कार्यक्रम में सम्मानित भी किया जाता है।
बैदौली गांव के ऐसे ही एक सम्मानित किसान जमुना सिंह ने डाउन टू अर्थ को बताया कि सारस अपना घोंसला बनाने में अधिकतम एक क्विंटल फसल का नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन किसान इसका अफसोस नहीं करते क्योंकि राज्य पक्षी सारस के अंडों को बचाना उनकी प्राथमिकता में शामिल हो गया है। उनका कहना है कि अब तक गांव के करीब 27 किसान सारस का घोंसला व अंडे बचाने के लिए पुरस्कृत हो चुके हैं।
इस साल 2 फरवरी 2026 को निचलौल रेंज में आयोजित कार्यक्रम में 35 किसानों व सारस मित्रों को सम्मानित किया गया। किसानों व सारस मित्रों ने मिलकर 52 सारस क्रेन घोंसलों में रखे 104 अंडों की सुरक्षा में सहायता की थी। ये घोंसले सोहागीबरवा वन्यजीव प्रभाग के अंतर्गत ऐसे क्षेत्रों में स्थित थे जहां मानवीय गतिविधियां अधिक होती हैं। स्वयंसेवकों ने अंडों से सफलतापूर्वक बच्चे निकलने तक घोंसलों और अंडों की देखभाल की थी।
सारस संरक्षण में योगदान देने वाले बैदौली गांव के भूतपूर्व सैनिक और समाजसेवी छोटे लाल थापा मानते हैं कि ग्रामीणों की सारस के प्रति जागरुकता बढ़ी है। खुद छोटे लाल ने सारस के दो बच्चों को बचाने के लिए पानी में छलांग लगा दी थी। उनका कहना है कि 2024 में सारस के बच्चे जलकुंभी में फंस गए थे। उन्होंने सारस के बच्चों को पानी से निकालकर मुंह से सांस (सीपीआर) दी थी जिसके बाद दोनों बच्चे ठीक हो गए।
गांवों में बनी तालाब प्रबंधन समिति यह खयाल रखती है कि तालाब अथवा वेटलैंड में खरपतवारों को हटाने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल न किया जाए। योगेंद्र के अनुसार, मछली के लिए तालाबों का टेंडर लेने वाले ठेकेदार कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। 2013 से पहले उनके गांव के तालाब में भी कीटनाशक डाला जाता था और सारस पानी पीकर बीमार भी होते थे, लेकिन सारस समिति और तालाब समिति के हस्तक्षेप से इसका इस्तेमाल बंद हो गया है। वह कहते हैं कि डब्ल्यूटीआई ने सारस समिति को पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए किट उपलब्ध कराई है, जिसका इस्तेमाल समय-समय पर किया जाता है।
2016 में प्रकाशित डब्ल्यूटीआई के एक अध्ययन के अनुसार, उत्तर प्रदेश की सारस आबादी का 73.04 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चार जिलों मैनपुरी, इटावा, एटा और अलीगढ़ में मौजूद है। राज्य के 35 जिलों में यह प्रजाति बहुत कम संख्या में है। अध्ययन के अनुसार, भारत में सारस क्रेन के प्राकृतिक वेटलैंड (आर्द्रभूमि) आवासों की बदहाली और नष्ट होने की वजह से उन्हें खेतों की ओर जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
अध्ययन के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के खेती प्रधान इलाकों में ये पक्षी अपने जीवन-चक्र की कई गतिविधियों के लिए खेती वाली जमीनों का इस्तेमाल करते हैं, फिर भी उनके 80 प्रतिशत घोंसले वेटलैंड से चार से पांच किलोमीटर के दायरे में ही पाए गए। यह तथ्य दुनिया के सबसे ऊंचे उड़ने वाले पक्षी के लिए “खेती की जमीन-वेटलैंड मैट्रिक्स” के महत्व को उजागर करता है।
उत्साहजनक नतीजे
सारस संरक्षण के लिए स्थानीय भागीदारी का सबसे बड़ा नतीजा यह निकला कि विलुप्तप्राय सारस पक्षी की संख्या में नियमित वृद्धि होने लगी। डब्ल्यूटीआई के चीफ ईकोलॉजिस्ट समीर कुमार सिन्हा के अनुसार, इस परियोजना के कारण प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकार के लाभ हुए हैं। वर्ष 2013 से 2026 के बीच सारस की संख्या में लगभग पांच गुना वृद्धि दर्ज की गई है। इस अवधि में सारस के करीब 1,800 घोंसलों की सुरक्षा हुई। वह कहते हैं कि किसानों एवं ग्रामीणों के सहयोग से पूर्वी उत्तर प्रदेश में सारस संरक्षण की यह पहल देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है। आंकड़ों के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में 2013 में सारस की जनसंख्या 681 से बढ़कर 2025 में 2,878 तक पहुंच गई। पिछले दो वर्षों से सारस के 200 से अधिक अंडों को हर साल बचाया जा रहा है।
जिलों के चयन के सवाल पर समीर कहते हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में सारस परियोजना शुरू करने के पीछे कई कारण थे। पहला, इस क्षेत्र में वेटलैंड की अच्छी-खासी संख्या है, जो सारस का प्रमुख निवास हैं। साथ ही यहां धान की खेती भी बड़े पैमाने पर होती है, जहां सारस अपने घोंसले बनाते हैं। इन अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद इस क्षेत्र में सारस की उपस्थिति उतनी नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी।
दूसरा, यहां परियोजना आरंभ होने से पहले सारस की आबादी लगभग 600–700 थी, लेकिन इसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी थी और यह क्षेत्र संरक्षण के मामले में अपेक्षाकृत उपेक्षित था।
तीसरा, इस क्षेत्र में टाटा ट्रस्ट द्वारा कृषि विकास से संबंधित परियोजना करीब दो दर्जन गैर-सरकारी संस्थाओं के साथ चलाई जा रही थी। अतः टाटा ट्रस्ट की यह सोच थी कि इन गतिविधियों से जैव विविधता विशेषकर सारस की जनसंख्या को कोई नुकसान न हो। इसी दृष्टि से महाराजगंज के अतिरिक्त पूर्वी उत्तर प्रदेश के अन्य 9 जिलों (बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, देवरिया, प्रतापगढ़, बाराबंकी और फैजाबाद) में भी संरक्षण कार्य प्रारंभ किया गया, जिसमें सारस को स्वस्थ खेती और आर्द्रभूमि पारितंत्र के एक सूचक के रूप में देखा गया।
चुनौतियां भी कम नहीं
सारस के संरक्षण में जुटे सारस मित्रों का मानना है कि सारस को सबसे बड़ा खतरा बिजली की तारों से है। हाईटेंशन और खेतों में बिजली की तारों से अक्सर सारस उलझकर जख्मी हो जाते हैं और उनकी मौत तक हो जाती है। समीर मानते हैं कि सारस संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती इसके अधिवास के क्षरण की है। आर्द्रभूमियां लगातार संकुचित हो रही हैं और उनकी हाइड्रोलॉजी में व्यवधान आने के कारण उनमें पानी का अभाव भी एक प्रमुख समस्या बन गया है। खेती में बढ़ते रासायनिक उपयोग से न केवल खेत, बल्कि आर्द्रभूमियां भी विषैली हो रही हैं।
समीर के अनुसार, खेती के पैटर्न में बदलाव का भी सारस पर सीधा प्रभाव पड़ता है। आर्द्रभूमियों में राजस्व विभाग द्वारा मछली पालन के ठेके दिए जाते हैं और कई स्थानों पर लीजधारक पानी को रोकने के लिए छोटे-छोटे बांध बनाकर पोखरों में मछली पालन करते हैं। इससे वेटलैंड की प्राकृतिक हाइड्रोलॉजी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धान–गेहूं की जगह गन्ने और अन्य नकदी फसलों के विस्तार से भी सारस के अधिवास को नुकसान पहुंचता है।
उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में शासन द्वारा सारस संरक्षण के लिए सारस संरक्षण समिति का गठन किया गया है, जिसके माध्यम से वन विभाग और गैर-सरकारी संस्थाएं मिलकर संरक्षण कार्य कर रही हैं। साथ ही आर्द्रभूमियों के प्रबंधन और संरक्षण के लिए राज्य स्तरीय आर्द्रभूमि प्राधिकरण तथा जिला आर्द्रभूमि समितियों का भी गठन किया गया है, जिनकी जिम्मेदारी आर्द्रभूमियों के अधिसूचना, संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े कदम उठाना है। हालांकि, इनके द्वारा इस दिशा में ठोस पहल किए जाने की आवश्यकता है।
समीर कहते हैं कि सारस संरक्षण के लिए जरूरी है कि आर्द्रभूमियों को कानूनी रूप से सुरक्षित किया जाए और नियमानुसार उनके समेकित प्रबंधन का एक प्रभावी मॉडल विकसित किया जाए, जिससे उनका विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित हो सके। उनका मानना है, “आर्द्रभूमियों को केवल एक जल निकाय के रूप में नहीं, बल्कि जैव-विविधता संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के आधार के रूप में देखते हुए कृषि भू-परिदृश्य में उनके संरक्षण के प्रयासों को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। इसी दिशा में आगे कार्य करने पर विचार किया जा रहा है।”
(यह स्टोरी प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स मीडिया फेलोशिप 2024 के तहत प्रकाशित की गई है)