ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण की चुनौती: राजस्थान के घास के मैदानों की कहानी
मुझे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के साथ अपनी पहली मुलाकात स्पष्ट रूप से याद है। यह साल 2000 में बीकानेर के बाहरी इलाके की बात है। मैं एक युवा शोधकर्ता था जो ज्ञान से अधिक जिज्ञासा के साथ झाड़ियों वाले इलाकों में घूमता रहता था। कुछ अन्य शोधकर्ताओं के साथ ऐसी ही एक सैर के दौरान, मैंने एक “अभूतपूर्व” क्षण का अनुभव किया। वह पक्षी पहले एक पहचान में न आने वाली आकृति के रूप में उभरा, वह काफी लंबा था और उसकी चाल बहुत नपी-तुली थी। उसका विशाल आकार और धीमी, शक्तिशाली पंखों की फड़फड़ाहट के साथ हवा में उड़ने का उसका तरीका मुझ पर एक स्थायी छाप छोड़ गया। पीछे मुड़कर देखें तो वह पहली झलक उस परिदृश्य में अंतिम झलकों में से एक थी।
यह राजस्थान का राज्य पक्षी है और कभी मानवीय बस्तियों से दूर, थार रेगिस्तान के विशाल खुले घास के मैदानों में रहता था। इसकी संख्या कभी बहुत अधिक नहीं थी, यहां तक कि 1980 और 1990 के दशक में भी नहीं, लेकिन अगले दो दशकों में जो गिरावट आई वह अत्यंत गंभीर रही है।
यह आकर्षक प्रजाति अपने पूर्व निवास क्षेत्र के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से से विलुप्त हो चुकी है, जिसमें वह स्थान भी शामिल है जहां मैंने इसे पहली बार देखा था।
इस कठिन वातावरण में लोग पीढ़ियों से अपने परिवेश के साथ गहरे तालमेल में रहकर जीवित रहे हैं। आजीविका, दैनिक दिनचर्या, ज्ञान प्रणालियां और यहां तक कि गीतों, भोजन और अनुष्ठानों के रूप में सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां भी स्थानीय जैव विविधता से जुड़ी हुई हैं। इसलिए जब कोई प्रजाति लुप्त होती है तो वह नुकसान केवल पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं रहता।
अतीत में चिंकारा, कृष्णमृग और घास के मैदानों की कई अन्य प्रजातियां भी गिरावट के इसी रास्ते पर चली हैं। यहां तक कि वे स्थानीय पौधे भी लुप्त हो रहे हैं जो कभी स्थानीय आहार और लोक चिकित्सा का हिस्सा थे। फोग की झाड़ी, जिसके फूलों को दही में मिलाकर लोग भीषण गर्मी सहने के लिए इस्तेमाल करते थे, बढ़ते मानवीय दबाव के कारण कई क्षेत्रों से गायब हो गई है।
पश्चिमी राजस्थान में “बंजर भूमि” जैसी कोई चीज नहीं है। औपनिवेशिक भूमि अभिलेखों में इस तरह से चिन्हित किए गए भूखंड व्यवहार में चारागाह, औषधीय भंडार, सामुदायिक चराई स्थल और वन्यजीव आवास हैं और ये सारे जो स्थानीय अस्तित्व के लिए आवश्यक संपत्तियां हैं। फिर भी यह शब्द कायम है और भूमि को राज्य समर्थित विकास परियोजनाओं हेतु इस्तेमाल करने के लिए एक सुविधाजनक औचित्य बन गया है।
यह स्थानीय समुदायों और सरकार के बीच सबसे विवादास्पद मतभेदों में से एक बना हुआ है। ग्रामीणों के साथ बातचीत के कुछ ही मिनटों में उनकी चिंताओं को स्पष्टता के साथ सुना जा सकता है। यदि सरकार स्वयं उनके अंतिम शेष आवासों पर कब्जा कर रही है, तो जंगली जानवर कहां रहेंगे?
यह चिंता निराधार नहीं है। यहां जैव विविधता कोई पर्यावरणीय नारा नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का एक हिस्सा है। लोक गीत आज भी उन पौधों और जानवरों को याद करते हैं जो अब इस क्षेत्र में मौजूद नहीं हैं। सिकुड़ते आवासों और स्थानीय विलुप्ति के साथ, वह सांस्कृतिक ताना-बाना कमजोर हो रहा है। ये चिंताएं तेजी से धरने और विरोध प्रदर्शनों में अभिव्यक्ति पा रही हैं।
कुछ लोग सरल हस्तक्षेपों का उपयोग करते हैं ताकि युवा प्रकृति से जुड़े रहें। इकोलॉजी, रूरल डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी (ईआरडीएस) फाउंडेशन नामक एक संस्था स्कूली बच्चों को जंगली क्षेत्रों में ले जाती है और उन्हें स्थानीय जैव विविधता के बारे में बताती है। स्थानीय लोग कहते हैं कि पर्यावरण की समस्याओं को तभी प्रबंधित किया जा सकता है जब उसके कारणों को समझा जाए और निराशा के बजाय धैर्य के साथ सही जानकारी साझा की जाए।

