

एक महीने से भी कम समय में भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास खारे पानी के पांच मगरमच्छों की मौत हो चुकी है। इसके साथ ही अप्राकृतिक कारणों से मगरमच्छों की मौत का आंकड़ा छह वर्षों में 22 और 14 वर्षों में 44 तक पहुंच गया है।
संरक्षणवादी सुधाकर कर ने इन मौतों के लिए सुरक्षा व्यवस्था में कमी और अवैध मछली पकड़ने में इस्तेमाल होने वाले जालों को जिम्मेदार ठहराया है। इन जालों में मगरमच्छ फंसकर डूब सकते हैं।
भितरकनिका में मगरमच्छों की आबादी में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्ष 1975 में इनकी अनुमानित संख्या 95 थी, जो जनवरी 2026 में बढ़कर 1,858 हो गई। यह पांच दशकों के संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।
ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले में भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के आसपास 27 दिनों के भीतर पांच मगरमच्छों की मौत का मामला सामने आया है। 3 नवंबर को बड़ाकोटा गांव के पास हंसुआ नदी में खारे पानी की मादा मगरमच्छ मृत पाई गई। इन लगातार मौतों ने अवैध मछली पकड़ने और वन्यजीवों की सुरक्षा एवं निगरानी व्यवस्था में खामियों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
पशु चिकित्सकों ने पांचों मगरमच्छों का पोस्टमार्टम किया है। इसके बाद उनके ऊतकों (टिश्यू) के नमूने जांच के लिए भुवनेश्वर स्थित ओडिशा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वन्यजीव स्वास्थ्य केंद्र भेजे गए हैं। भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के मंडलीय वन अधिकारी वरदराज गोनकर ने कहा, "मौत के वास्तविक कारणों का पता जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही चल सकेगा।"
ताजा घटना से पहले 25 अक्टूबर को खारे पानी की मादा मगरमच्छ की मौत हुई थी। लगभग 1.88 मीटर लंबी इस मादा मादा मगरमच्छ का शव गोपीनाथपुर गांव के पास लूना नदी में मिला था। इससे एक दिन पहले, 24 अक्टूबर को 2.13 मीटर लंबी एक अन्य मादा मगरमच्छ का शव बेंगमारी गांव के पास ब्राह्मणी नदी के किनारे मिला था। यह इलाका डांगामल वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
इसी तरह, 22 अक्टूबर को वन अधिकारियों ने बड़ाकोटा गांव के पास हंसुआ नदी से 1.12 मीटर लंबी मादा मगरमच्छ का शव बरामद किया था। इससे पहले 6 अक्टूबर को नगाड़ा गांव के पास ब्राह्मणी नदी में 4.26 मीटर लंबा एक नर खारे पानी का मगरमच्छ मृत पाया गया था। उसकी उम्र लगभग 20 वर्ष आंकी गई थी।
इस ताजा घटना के साथ ही राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास पिछले छह वर्षों में मगरमच्छों की अस्वाभाविक मौतों की दर्ज संख्या बढ़कर 22 हो गई है। वहीं, पिछले 14 वर्षों में ऐसी मौतों के कुल 44 मामले सामने आ चुके हैं। लगातार हो रही इन मौतों ने वन अधिकारियों और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।
ओडिशा वन विभाग के पूर्व वन्यजीव शोधकर्ता और सरीसृप विशेषज्ञ सुधाकर कर ने कहा, "इतने कम समय में चार मगरमच्छों की मौत बेहद चिंताजनक है। हम प्रजनन की उम्र तक पहुंच चुके नर और मादा मगरमच्छों को खो रहे हैं। अगर ऐसा ही जारी रहा तो धीरे-धीरे मगरमच्छों की पूरी आबादी खत्म हो सकती है। पिछले 50 वर्षों में संरक्षण के लिए की गई मेहनत बेकार हो सकती है। मुहाना क्षेत्र में पाए जाने वाले मगरमच्छों और उनके मैंग्रोव आवास की रक्षा के लिए स्थानीय समुदायों और वन विभाग को पूरी प्रतिबद्धता के साथ मिलकर काम करना होगा।"
सुधाकर ने हाल में हुई मगरमच्छों की मौतों के लिए राष्ट्रीय उद्यान और उसके आसपास के जल क्षेत्रों में सुरक्षा के अपर्याप्त इंतजामों को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि प्रतिबंध के बावजूद इन इलाकों में अवैध मछली पकड़ने का सिलसिला जारी है। नदियों और जलधाराओं में प्रतिबंधित जालों का इस्तेमाल करने वाले मछुआरे मगरमच्छों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि मगरमच्छ मछली पकड़ने वाले जालों में फंस सकते हैं और सांस लेने के लिए पानी की सतह पर नहीं पहुंच पाने की स्थिति में डूबकर या दम घुटने से उनकी मौत हो सकती है।
पांच दशकों में मगरमच्छों की आबादी में वृद्धि
वर्ष 1975 में भितरकनिका क्षेत्र में खारे पानी के मगरमच्छों की आबादी 95 आंकी गई थी, जिनमें 34 वयस्क मगरमच्छ थे। इसी वर्ष केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की संयुक्त पहल से मगरमच्छ संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम ने राष्ट्रीय उद्यान की नदियों और जलधाराओं में मुहाना क्षेत्र के मगरमच्छों की आबादी को फिर से बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सुधाकर कर के मुताबिक, वर्ष 2006 में भितरकनिका को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, जब गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने यहां पाए गए 7.01 मीटर लंबे खारे पानी के मगरमच्छ को दुनिया का सबसे बड़ा मगरमच्छ दर्ज किया।
भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान के मंडलीय वन अधिकारी (डीएफओ) वरदराज गोनकर ने बताया कि जनवरी 2026 में हुई गणना के अनुसार, उद्यान में अब खारे पानी के मगरमच्छों की आबादी बढ़कर 1,858 हो गई है।