

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत उत्तराखंड और राजस्थान में जल स्रोतों के पुनर्जीवन से सिंचाई सुविधा और जल संरक्षण बढ़ रहा है।
एथेनॉल मिश्रित ईंधन ई20 से वाहनों की दक्षता बढ़ती है, कार्बन उत्सर्जन घटता है और किसानों को आर्थिक फायदा मिल रहा है।
हाथियों की ट्रेन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए 77 रेलवे मार्गों पर 705 संरचनाओं का निर्माण प्रस्तावित।
उत्तर भारत में वायु प्रदूषण कम करने हेतु सरकार ने योजनाएं लागू कीं, जिससे पराली जलाने की घटनाओं में 90 प्रतिशत कमी आई।
देश में 601 प्रदूषणकारी उद्योग मानकों का पालन नहीं कर रहे, जिन पर सरकार ने सख्त कार्रवाई शुरू की है।
उत्तराखंड और राजस्थान में पारंपरिक जल स्रोतों का जीर्णोद्धार
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण जारी है, इसी बीच सदन में उठे एक सवाल का लिखित जवाब में आज, जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि भारत सरकार जल संरक्षण और सिंचाई सुधार के लिए कई योजनाएं चला रही है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण योजना है प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) - हर खेत को पानी। इस योजना के तहत उत्तराखंड और राजस्थान में पारंपरिक जल स्रोतों को जीर्णोद्धार करने का काम किया जा रहा है।
चौधरी ने बताया कि उत्तराखंड में कुल 422 सतही लघु सिंचाई योजनाएं लागू की जा रही हैं, जिनकी कुल लागत लगभग 349.36 करोड़ रुपये है। वहीं राजस्थान में 121 जल स्रोतों का विकास किया जा रहा है, जिनकी लागत लगभग 160.57 करोड़ रुपये है। यह योजनाएं किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा देने और जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए बनाई गई हैं।
वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारत सरकार ने राजस्थान को 48 करोड़ रुपये और उत्तराखंड को 78.60 करोड़ रुपये की धनराशि जारी की है। इस धनराशि में से राजस्थान सरकार ने 43.50 करोड़ रुपये और उत्तराखंड सरकार ने 48.68 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इन योजनाओं से जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में खेती को मजबूत बनाया जा सकेगा।
वाहनों और उपभोक्ताओं पर एथेनॉल मिश्रण का प्रभाव
एथेनॉल मिश्रण के असर को लेकर सदन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने लोकसभा में बताया कि भारत सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर पर्यावरण को बेहतर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रही है। इस दिशा में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) का उपयोग बढ़ाया जा रहा है।
गोपी ने सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएएम) और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एआरएआई) का हवाला दिया। जिसमें कहा गया है कि ई20 ईंधन से वाहनों की गति और चलने की गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके साथ ही यह ई10 की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन को कम करता है। एथेनॉल में उच्च ऑक्टेन होता है, जो आधुनिक इंजनों के लिए अच्छा माना जाता है। यह इंजन को ठंडा रखने में भी मदद करता है, जिससे ईंधन की क्षमता बढ़ती है। एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम के तहत किसानों को भी बड़ा फायदा हुआ है।
पिछले कुछ वर्षों में किसानों को 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है। इसके अलावा देश ने 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत की है। इस कार्यक्रम से कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में भी बड़ी कमी आई है और कच्चे तेल के आयात में भी कमी हुई है।
देश में हाथियों की मौत और रोकथाम के उपाय
सदन में उठे सवाल के जवाब में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में कहा कि भारत में रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत एक गंभीर समस्या है। इस समस्या को कम करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। मंत्रालय ने एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें हाथियों और अन्य वन्यजीवों को ट्रेन से होने वाली दुर्घटनाओं से बचाने के उपाय बताए गए हैं।
इस रिपोर्ट में देश के 77 संवेदनशील रेलवे मार्गों की पहचान की गई है। इन मार्गों पर 705 सुरक्षा ढांचे बनाने की सिफारिश की गई है। यह कार्य प्रोजेक्ट एलीफैंट के तहत किया जा रहा है। सिंह ने बताया कि इस कार्य में रेलवे मंत्रालय और भारतीय वन्यजीव संस्थान भी सहयोग कर रहे हैं। एक ऑनलाइन पोर्टल भी बनाया गया है, जिससे इन उपायों की निगरानी की जा सके। इन उपायों से वन्यजीवों की सुरक्षा बढ़ेगी और दुर्घटनाओं में कमी आएगी।
उत्तर भारत में बढ़ता वायु प्रदूषण
उत्तर भारत, खासकर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। सर्दियों के मौसम में यह समस्या और भी बढ़ जाती है। इसका एक मुख्य कारण पराली जलाना है। इसी को लेकर सदन में पूछे गए एक और प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में बटाया कि सर्दियों में तापमान कम होने, हवा की गति धीमी होने और तापमान में बदलाव (इनवर्जन) के कारण प्रदूषक वातावरण में ही फंसे रहते हैं। इससे हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है।
मंत्री ने बताया कि सरकार ने इस समस्या को हल करने के लिए “सम्पूर्ण सरकार” दृष्टिकोण अपनाया है। दिल्ली-एनसीआर के सभी राज्यों ने अल्पकालिक और दीर्घकालिक योजनाएं बनाई हैं। इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिला है। पंजाब और हरियाणा में वर्ष 2025 में पराली जलाने की घटनाओं में लगभग 90 प्रतिशत की कमी आई है, यदि इसकी तुलना 2022 से की जाए।
देश में अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग
सदन में उठाए गए एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में बताया कि देश में कई ऐसे उद्योग हैं जो अधिक प्रदूषण फैलाते हैं। इन्हें अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योग (जीपीआईएस) कहा जाता है। इनकी निगरानी और नियंत्रण के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है।
देश में कुल 4,498 ऐसे उद्योग हैं। इनमें से 3,637 उद्योग चालू हैं। इन चालू उद्योगों में से 601 उद्योग पर्यावरण मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं। इन उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है। 29 उद्योगों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं। 571 उद्योगों को कारण बताओ नोटिस भेजे गए हैं और एक उद्योग को निर्देश जारी किया गया है। सिंह ने कहा इन कदमों से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के पर्यावरणीय प्रभाव
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर सदन में पूछे गए एक और प्रश्न के उत्तर में आज, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा कि आज के समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इसके साथ कुछ पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आई हैं। एआई डेटा सेंटर बहुत अधिक बिजली और पानी का उपयोग करते हैं और इससे इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी बढ़ता है।
मंत्री ने कहा कि सरकार इन समस्याओं को समझती है और इनके समाधान के लिए काम कर रही है। हालांकि एआई और डेटा सेंटर सीधे तौर पर पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना 2006 के अंतर्गत नहीं आते हैं। लेकिन यदि कोई भवन 20,000 वर्ग मीटर से बड़ा है, जिसमें डेटा सेंटर स्थापित किया जाना है, तो उसे पर्यावरणीय स्वीकृति लेनी होती है। यह स्वीकृति विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के आधार पर दी जाती है। इस प्रकार सरकार तकनीकी विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है।