संकटग्रस्त रेड पांडा के संरक्षण के साथ जंगलों और बांस के आवास बचाने पर जोर

हिमालय के लाल नन्हे प्रहरी को बचाने की मुहिम तेज, जंगलों और बांस के संरक्षण के साथ रेड पांडा के भविष्य पर बढ़ा जोर, अवैध शिकार व तस्करी रोकने की जरूरत
भारत में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल रेड पांडा के प्रमुख आवास हैं, जहां संरक्षण प्रयास लगातार जारी हैं।
भारत में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल रेड पांडा के प्रमुख आवास हैं, जहां संरक्षण प्रयास लगातार जारी हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • अंतरराष्ट्रीय रेड पांडा दिवस आज मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य इस संकटग्रस्त हिमालयी जीव के संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाना है।

  • भारत में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल रेड पांडा के प्रमुख आवास हैं, जहां संरक्षण प्रयास लगातार जारी हैं।

  • जंगलों की कटाई, बांस की कमी, अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी रेड पांडा के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौतियां बनी हैं।

  • सिक्किम में रेड पांडा राज्य पशु है और इसके कई आवास संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित हैं, जिससे समुदायों की भूमिका बढ़ती है।

  • दार्जिलिंग का पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क संरक्षण प्रजनन और रेड पांडा को जंगलों में छोड़ने की दिशा में काम कर रहा है।

दुनिया भर में आज अंतरराष्ट्रीय रेड पांडा दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस हर साल सितंबर के तीसरे शनिवार को मनाया जाता है। इस साल यह दिवस 19 सितंबर को मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य रेड पांडा के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना और उसके प्राकृतिक आवास को बचाने के लिए प्रयासों को मजबूत करना है।

हिमालय का अनोखा जीव

रेड पांडा एक छोटा और बेहद आकर्षक पहाड़ी स्तनधारी है। यह मुख्य रूप से पूर्वी हिमालय के जंगलों के साथ-साथ चीन और म्यांमार के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। भारत में इसकी प्रमुख मौजूदगी सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और उत्तर बंगाल में है। लाल-भूरे रंग के शरीर, लंबी पूंछ और चेहरे पर सफेद निशान के कारण इसे आसानी से पहचाना जा सकता है।

रेड पांडा अपना अधिकतर समय पेड़ों पर बिताता है और इसके भोजन में बांस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए बांस से भरपूर पहाड़ी जंगल इसके अस्तित्व के लिए बेहद जरूरी हैं।

विलुप्ति का खतरा

रेड पांडा को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ यानी आईयूसीएन की रेड लिस्ट में संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। दुनिया में 10 हजार से भी कम प्रजनन योग्य रेड पांडा बचे होने का अनुमान है। इनकी संख्या कम होने के साथ-साथ इनके रहने का क्षेत्र भी कई छोटे हिस्सों में बंटता जा रहा है।

जंगलों की कटाई, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण, अवैध शिकार और वन्यजीवों की तस्करी इसके लिए बड़ी चुनौतियां हैं। जंगलों में बदलाव से बांस और पेड़ों की उपलब्धता कम होती है, जिससे रेड पांडा के लिए भोजन और सुरक्षित आश्रय दोनों प्रभावित होते हैं।

भारत में महत्वपूर्ण आवास

भारत रेड पांडा के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। सिक्किम में रेड पांडा को राज्य पशु का दर्जा प्राप्त है। यहां यह ऊंचाई वाले जंगलों में पाया जाता है। खास बात यह है कि सिक्किम में रेड पांडा का करीब 66 प्रतिशत आवास संरक्षित क्षेत्रों के बाहर माना जाता है। ऐसे में सामुदायिक और आरक्षित वन इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण हैं।

सिक्किम का पांगोलाखा वन्यजीव अभयारण्य भी रेड पांडा के महत्वपूर्ण आवासों में शामिल है। यहां किए गए सर्वेक्षणों में रेड पांडा की मौजूदगी दर्ज की गई है।

उत्तर बंगाल में भी मौजूदगी

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कालिम्पोंग जिलों में भी रेड पांडा पाया जाता है। सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान और नेओरा वैली राष्ट्रीय उद्यान इसके प्रमुख आवास हैं। सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान सिंगालीला पर्वत श्रृंखला में स्थित है और साल 1992 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला था। नेओरा वैली के घने पहाड़ी जंगल भी रेड पांडा के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते हैं। इन जंगलों में कई अन्य हिमालयी वन्यजीव भी पाए जाते हैं।

संरक्षण के लिए प्रयास

रेड पांडा की संख्या और उसके आवास के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए लगातार सर्वेक्षण किए जा रहे हैं। साल 2011 में सिक्किम में करीब 300 रेड पांडा होने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इनकी वास्तविक संख्या और स्थिति को समझने के लिए निगरानी जारी है।

दार्जिलिंग स्थित पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क ने 1990 के दशक में रेड पांडा के संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम के जरिए रेड पांडा के प्रजनन और देखभाल में विशेषज्ञता विकसित की गई है। पार्क ने कैद में पैदा हुए रेड पांडा को उपयुक्त जंगलों में छोड़ने की योजना भी बनाई है। इसके तहत करीब पांच वर्षों में 20 रेड पांडा को जंगल में छोड़े जाने की योजना है। इसके लिए सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान को भी संभावित क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है।

जंगल बचेंगे तो रेड पांडा बचेगा

रेड पांडा केवल एक दुर्लभ वन्यजीव नहीं है, बल्कि हिमालयी जंगलों के स्वास्थ्य का संकेत देने वाली प्रजाति भी माना जाता है। इसके आवास में होने वाले बदलाव व्यापक पर्यावरणीय बदलावों की ओर भी संकेत कर सकते हैं।

इसलिए रेड पांडा का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए बांस वाले जंगलों, पेड़ों और पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय रेड पांडा दिवस इसी दिशा में लोगों, स्थानीय समुदायों और संरक्षण संस्थाओं को जागरूक करने का अवसर देता है।

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