विश्व जल दिवस पर विशेष: गंदा पानी पीकर कब तक मरते रहेंगे देश के लोग?

इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतें भारत के वर्तमान जल आपूर्ति मॉडल की कमजोरी उजागर करती हैं। इस समस्या से निपटने के लिए कड़ी निगरानी, बेहतर डाटा और सीवेज-प्राथमिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
विश्व जल दिवस पर विशेष: गंदा पानी पीकर कब तक मरते रहेंगे देश के लोग?
फोटो: दिव्या शर्मा
Published on

अरुण प्रजापत को अंदेशा था कि कोई दिक्कत सामने आने वाली है लेकिन उन्हें यह अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि वह परेशानी इतनी जल्दी उनके सामने आएगी और उनकी जिंदगी को उलट कर रख देगी। 28 दिसंबर 2025 को वह एक निर्माण स्थल पर काम कर रहे थे तभी उनकी मां का फोन आया। उन्होंने बताया कि घर में आने वाले नल के पानी से बदबू आ रही है और वह पीने लायक नहीं रह गया है। उनकी मां ने जोर दिया कि अब पानी का फिल्टर खरीदने का वक्त आ गया है।

अगले ही दिन अरुण के मां की तबीयत बिगड़ने लगी। अरुण याद करते हैं, “मां को तेज पेट दर्द और मितली की शिकायत थी। यह समझने का मौका ही नहीं मिला कि आखिर हो क्या रहा है। दस्त और उल्टी के दो दौर के बाद उन्होंने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया।”

इस घटना के कुछ ही दिनों में यह बीमारी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के घनी आबादी वाले इलाके भागीरथपुरा में तेजी से फैली। स्थानीय निवासियों का अनुमान है कि करीब 3,000 लोग उल्टी, दस्त, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) और कमजोरी से पीड़ित हुए, जिनमें से 450 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। 21 जनवरी, 2026 तक कम से कम 25 लोगों की जान चली गई।

इंदौर के महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज द्वारा किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में नल के पानी के नमूनों में रोगजनक जीव पाए गए। पानी के नमूनों में हैजा फैलाने वाला विब्रियो कॉलरा, मानव मलजनित कोलीफॉर्म (फीकल कोलीफॉर्म) और एस्चेरिचिया कोलाई (ई.कोलाई) पाए गए, जो यह साबित करते हैं कि सीवर पीने के पानी में मिल गया था और इसी कारण दस्तों का प्रकोप हुआ।

इन मौतों के बाद पूरे शहर में विरोध प्रदर्शन हुए और उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन पर महीनों से दूषित पानी की शिकायतों को अनदेखा करने का आरोप था। राज्य सरकार ने इस घटना को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित किया। प्रभावित लोगों को मुफ्त चिकित्सा सुविधा और प्रत्येक पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की गई। इस घटना के बाद नर्मदा नदी से पानी की आपूर्ति करने वाली पाइपलाइनों को भी बदलने का काम शुरू हुआ।

नगर निगम के जल आपूर्ति विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर नरेश भास्कर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि 20 किलोमीटर लंबी नई पाइपलाइन बिछाई जा रही है और काम तेजी से किया जा रहा। प्रकोप शुरू होने के तुरंत बाद अधिकारियों ने पीने के पानी की आपूर्ति के लिए 40 से अधिक पानी के टैंकर तैनात किए। हालांकि, कई निवासी टैंकर वाले पानी को लेकर सतर्क हैं और इसके बजाए बोतलबंद पानी खरीद रहे हैं या फिर व्यक्तियों और चैरिटी द्वारा वितरित फिल्टर किए गए पानी पर निर्भर हैं।

इस जानलेवा संकट से जुड़ी हुई कई याचिकाओं की सुनवाई मध्य प्रदेश (एमपी) हाईकोर्ट में जारी है। एमपी हाईकोर्ट ने 20 जनवरी को राज्य सरकार को फटकार लगाई और पूछा कि इंदौर में दूषित पानी की स्थिति इतनी गंभीर कैसे हो गई कि यह जानलेवा बन गया। कोर्ट ने सरकार से पीने के पानी में गंदगी पहुंचने के स्रोत को लेकर स्पष्टता भी मांगी। वहीं, राज्य सरकार ने बताया कि स्थानीय स्तर पर दूषित पानी फैलने का स्रोत दरअसल एक सार्वजनिक शौचालय था और उसे ध्वस्त कर दिया गया है।

पहले कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह बताया गया था कि यह सार्वजनिक शौचालय मुख्य पाइपलाइन के ऊपर स्थित था, जो क्षेत्र में पीने का पानी सप्लाई करती थी और पाइपलाइन में लीकेज के कारण पानी दूषित हो गया। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने हाईकोर्ट को बताया कि भागीरथपुरा के 51 ट्यूबवेल भी ई. कोलाई से दूषित पाए गए। वहीं, मध्य प्रदेश के दूसरे शहरों में पानी के दूषित होने संबंधी याचिकाओं पर पहले से ही सुनवाई कर रहे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इंदौर त्रासदी मामले का स्वतः संज्ञान लिया और 15 जनवरी को वास्तविक स्थिति की जांच के लिए छह सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया।

मध्य प्रदेश में दूषित पानी की समस्या कोई नई बात नहीं है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2013 से 2018 के छह साल के दर्मियान इंदौर और राजधानी भोपाल में 5,45,000 से अधिक लोग जलजनित बीमारियों जैसे टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस से पीड़ित पाए गए। फिर भी, शहर की सार्वजनिक छवि कुछ और ही कहानी बताती है।

भागीरथपुरा के निवासी सुरक्षित पीने के पानी की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं, जबकि शहर की दीवारों पर पोस्टर लगे हैं जिनमें लिखा है “इंदौर रहेगा नंबर वन।” सड़कें नियमित रूप से साफ की जाती हैं और निवासी कचरे को नीले और हरे डिब्बों में सही तरीके से अलग करते हैं। यह नागरिक अनुशासन और व्यवस्था का दृश्य है। इस नागरिक अनुशासन और सफाई व्यवस्था ने इंदौर को जुलाई 2025 में केंद्रीय सरकार के वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण, स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 में लगातार आठवीं बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का खिताब दिलाने में मदद की। हाल ही में हुई मौतों ने उस सावधानीपूर्वक बनाए गए छवि को ध्वस्त कर दिया है और यह एक और चिंताजनक सवाल उठाया है कि इसके पीछे वास्तव में क्या छिपा हुआ है।

सिर्फ इंदौर नहीं, चपेट में पूरा भारत

इंदौर की घटना के दौरान ही गुजरात की राजधानी गांधीनगर में 150 से अधिक बच्चे संदिग्ध टाइफाइड के चलते अस्पताल में भर्ती हुए, जिनके दूषित पानी पीने की आशंका थी। सरकारी प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) के 8 जनवरी के एक बयान के मुताबिक, नई बिछाई गई पाइपलाइन में सात लीकेज प्वाइंट थे जिसके कारण सीवर का गंदा पानी पीने के पानी की आपूर्ति में मिल गया था।

भारत के तकनीकी केंद्र बेंगलुरु के लिंगराजपुरम में एक छोटे रिहायशी इलाके केएसएफसी लेआउट में कम से कम 30 परिवारों ने दस्त और पेट संक्रमण की शिकायत दर्ज कराई। वहीं, पटना के कंकड़बाग हाउसिंग कॉलोनी में निवासी बताते हैं कि इंदौर जैसी स्थिति वहां भी बन रही है। कई ब्लॉकों का नल का पानी इतना प्रदूषित है कि त्वचा पर संपर्क होने पर खुजली होती है और इसे नहाने या कपड़े धोने तक के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वहां के निवासी टूटी हुई पाइपलाइनों को दोषी मानते हैं, जो कई दशकों पुरानी हैं और सीवर नालों के साथ बिछी हुई हैं।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कचना हाउसिंग बोर्ड एरिया, पिंक सिटी, सेजबहार हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, स्टील सिटी और गांधी नगर के निवासी शिकायत करते हैं कि उन्हें एक महीने से बदबूदार और दूषित नल का पानी मिल रहा है। जनवरी की शुरुआत में कुछ लोगों ने जलजनित रोगों की रिपोर्ट भी की। निवासी आरोप लगाते हैं कि पुरानी पाइपलाइन और जाम हुए नालों के कारण सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल गया है। कई परिवार, खासतौर से गरीब परिवारों को अब पीने और खाना बनाने जैसी जरूरतों के लिए बोतलबंद पानी खरीदना पड़ रहा है।

रायपुर की मेयर मीनल चौबे ने डाउन टू अर्थ को बताया कि दूषित पानी की आपूर्ति रोकने और तकनीकी दोषों को ठीक करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया गया था। उन्होंने अपने बयान में कहा, “जैसे ही शिकायतें आती हैं, हम कार्रवाई करते हैं। लेकिन कुछ देरी हो जाती है क्योंकि पुरानी पाइप बदलने और तकनीकी दोष सुधारने में समय लगता है।”

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। ऊंची इमारतों और निजी जल आपूर्ति के लिए जाना जाने वाला गुरुग्राम में भी यह समस्या बरकरार है। सेक्टर 70ए के निवासियों ने दिसंबर की शुरुआत में नल का पानी पीने के बाद दस्त और पेट संबंधी रोगों की शिकायत की। लगभग 60-70 लोग प्रभावित हुए, जिनमें से 10 को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ग्रेटर नोएडा के डेल्टा 1 सेक्टर के निवासियों ने भी नल के पानी का इस्तेमाल करने के बाद उल्टी, बुखार, पेट दर्द और दस्त जैसी समस्याओं की रिपोर्ट की। उन्होंने शिकायत की कि सीवर का पानी आपूर्ति में मिला था। वहीं, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने पीने के पानी में किसी तरह की गंदगी होने को खारिज किया, लेकिन निवासी अभी भी संतुष्ट नहीं हैं।

डाउन टू अर्थ ने मीडिया रिपोर्ट और आधिकारिक बयानों का विश्लेषण किया, जिससे पता चलता है कि फरवरी 2025 से जनवरी 2026 तक कम से कम 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 12 शहरों में सीवर से प्रदूषित नल का पानी बीमारी फैलाने का कारण बना। इससे कम से कम 34 लोगों की मौतें हुई और 5,800 से अधिक लोग बीमार पड़े। सबसे अधिक रिपोर्ट की गई बीमारी दस्त थी, इसके बाद टाइफाइड, हेपेटाइटिस और लंबे समय तक बुखार होने की शिकायतें भी शामिल थीं। इन घटनाओं के बाद यह अनुमान भी गलत साबित हुआ कि ऐसे प्रकोप केवल मॉनसून के समय होते हैं। मॉनसून के वक्त बाढ़ और ओवरफ्लो वाले नाले सीवर के पानी के मिल जाने का जोखिम बढ़ा देते हैं, हालांकि अब ऐसे मामलों की रिपोर्ट हर मौसम में की जा रही।

एनजीटी ने 15 जनवरी के आदेश में यह दोहराया कि पीने के पानी का दूषित होना स्पष्ट रूप से पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अनुच्छेद 21 जीवन जीने के मौलिक अधिकार से जुड़ा है, जिसमें स्वच्छ और सुरक्षित पानी का अधिकार भी शामिल है। शहरी क्षेत्रों में इस मौलिक अधिकार की सुरक्षा के लिए केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय नीति निर्देश जारी करता है और राज्यों व शहरी स्थानीय निकायों को तकनीकी सहायता प्रदान करता है। कम से कम चार प्रमुख ऐसी योजनाएं चल रही हैं, जिनमें अटल मिशन फॉर रिजुवनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (अमृत), नमामि गंगे कार्यक्रम, स्मार्ट सिटी मिशन और राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना शामिल हैं।

अमृत का पहला चरण 2015 में शुरू हुआ था और इसमें 500 शहर शामिल थे। इस मिशन को 2021 में बढ़ाकर देश के सभी 4,378 वैधानिक नगरों तक विस्तृत किया गया, जिसका लक्ष्य पहले चरण में शामिल 500 शहरों में पानी की 100 प्रतिशत आपूर्ति और पूरी तरह से सीवर व सेप्टेज का प्रबंधन सुनिश्चित करना था।

गंगा नदी की सफाई पर केंद्रित केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नमामि गंगे कार्यक्रम भी शहरों में व्यापक स्तर पर सीवर के बुनियादी ढांचे के विकास को भी शामिल करता है। इसके तहत शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित करना और इंटरसेप्शन और डाइवर्जन जैसे काम शामिल हैं ताकि नदियों में गैर शोधित सीवेज सीधा न मिल सके।

वहीं, भारत के अन्य प्रदूषित नदियों के हिस्सों में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना भी इसी तरह के उपाय को लागू करती है। स्मार्ट सिटी मिशन एक कदम आगे बढ़ता है और 100 चयनित शहरों को स्मार्ट जल प्रबंधन प्रणाली, चौबीसों घंटे पानी की आपूर्ति, स्मार्ट मीटरिंग के माध्यम से पीने के पानी के नुकसान को कम करना और उन्नत सीवेज ट्रीटमेंट लागू करने की बात करता है।

इसके बावजूद भारत के शहर और कस्बे बार-बार पीने के पानी में गंदगी और जलजनित रोगों के प्रकोप की रिपोर्ट क्यों करते हैं? समस्या वास्तव में कहां निहित है?

कागजों पर मैनुअल

दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में वाटर प्रोग्राम के डायरेक्टर सुब्रत चक्रवर्ती का कहना है कि इंदौर जैसी घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि पाइपलाइन बिछाने और बनाए रखने के लिए इंजीनियरिंग दिशानिर्देशों को नियमित रूप से अनदेखा किया जाता है।

भारत में शहर स्तर के इंजीनियरों के लिए सीवेज और पीने के पानी की लाइनों की योजना और डिजाइन तैयार करने हेतु दो मैनुअल हैं। पहला, मैनुअल ऑन वाटर सप्लाई एंड ट्रीटमेंट सिस्टम्स (ड्रिंक फ्रॉम टैप), मार्च 2024 है। इसे सेंट्रल पब्लिक हेल्थ एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग ऑर्गेनाइजेशन (सीपीएचईईओ) द्वारा मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग अर्बन अफेयर्स के तहत प्रकाशित किया गया है। यह पाइपलाइन स्थापना के मानक तय करता है। इसमें पीने के पानी की लाइनों को मौजूदा या संभावित सीवेज या ड्रेनों से क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रूप से अलग रखने पर जोर दिया गया है ताकि मिलावट और गंदगी से सुरक्षा हो सके।

इसके तहत पानी की मुख्य पाइपलाइन को सीवर या नालों से कम से कम तीन मीटर दूर रखा जाना चाहिए। ऊंचाई के हिसाब से पानी की पाइपलाइन का निचला हिस्सा किसी भी सीवर या नाले से कम से कम 0.5 मीटर ऊपर होना चाहिए। और अगर यह दूरी रखना संभव न हो तो सुरक्षा के लिए विशेष आवरण लगाना चाहिए।

सीपीएचईईओ द्वारा 2013 में मैनुअल ऑन सीवरेज एंड सीवेज ट्रीटमेंट सिस्टम्स नाम से दूसरा मैनुअल प्रकाशित किया गया था। यह मैनुअल सलाह देता है कि सीवर लाइन हमेशा पानी की लाइनों के नीचे बिछाए जाएं। इसमें लैटरल ऑफसेट यानी एक-दूसरे के बगल में रखी गई पाइपलाइनों के बीच की न्यूनतम क्षैतिज दूरी का विवरण है जो मैनहोल की आधी चौड़ाई से 30 सेमी अधिक रखी जानी चाहिए। साथ ही जहां पर्याप्त अलगाव संभव नहीं हो वहां सीवर को आवरण में रखने की सिफारिश की गई है।

इसके साथ, कोड ऑफ प्रेक्टिस फॉर बिल्डिंग ड्रेनेज (आईएस कोड 1742:1983) यह निर्धारित करता है कि पानी और सीवर लाइनों के बीच न्यूनतम ऊर्ध्वाधर दूरी 0.3 मीटर और क्षैतिज दूरी 3 मीटर होनी चाहिए ताकि अशुद्धता का जोखिम कम किया जा सके। सुब्रत चक्रवर्ती कहते हैं कि यह मानक इंदौर में हुई पानी और सीवर के मिल जाने जैसी घटनाओं को रोकने के लिए बनाए गए हैं लेकिन शहरी विकास के दौरान इन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

एनजीटी के द्वारा 15 जनवरी, 2026 को भी इस समस्या को उजागर किया गया। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, “कई शहरी केंद्रों में पीने के पानी की पाइपलाइन और सीवर लाइनें बहुत पास-पास बिछाई जाती हैं, अक्सर एक-दूसरे को काटती हैं या समानांतर चलती हैं। कई मामलों में तो पीने के पानी की पाइपलाइन सीवर या नालों के नीचे बिछाई जाती है, जिससे लीकेज, दबाव में उतार-चढ़ाव या पाइपलाइन को नुकसान होने की स्थिति में पीने के पानी में गंदगी पहुंचने का जोखिम बढ़ जाता है।”

एनजीटी ने 15 जनवरी के अपने आदेश में कहा, “अंतराल वाले जल आपूर्ति सिस्टम स्थिति को और बिगाड़ते हैं क्योंकि यह पाइपलाइनों में नकारात्मक दबाव पैदा करता है, जिससे दूषित पानी का प्रवेश आसान हो जाता है।” यह दोनों मैनुअल इंजीनियर्स को सीवर और पीने के पानी के नेटवर्क के नियमित रखरखाव के बारे में भी मार्गदर्शन देते हैं, जो लीकेज और पुरानी पाइपलाइन का पता लगाने के लिए आवश्यक हैं। यह खासकर उन शहरों के लिए अत्यंत जरूरी है जहां जहां सीवर नेटवर्क काफी पुराने हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली में पानी आपूर्ति नेटवर्क का आधे से अधिक हिस्सा 20 से 30 साल पुराना है। दिल्ली जल बोर्ड नियमित रूप से दूषण संबंधी हजारों शिकायतें प्राप्त करता है, जिससे ट्रांस-यमुना क्षेत्रों में बार-बार आपातकालीन जांच और मरम्मत की जाती है।

ग्रेटर नोएडा में जनवरी में सीवर से दूषित गंदे पानी के प्रकरण के बाद वहां के लोगों ने 30 साल से अधिक पुरानी पाइपों को बदलने की मांग की है। हैदराबाद में 1960 के दशक की पाइपलाइन अक्सर लीकेज करती है, जिससे शहर में रोजाना लगभग 7.5 करोड़ लीटर पानी बर्बाद हो जाता है।

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिला आधे से अधिक शताब्दी पुरानी पाइपलाइनों पर निर्भर करता है, जिससे अधिकारियों को सिस्टम पर दबाव कम करने के लिए आपातकालीन सुधार योजना बनानी पड़ रही है। कुछ शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर तो और भी पुराना है।

कोलकाता भारत का पहला शहर था जहां आधुनिक पाइपलाइन के जरिए जलापूर्ति 1870 से शुरू हुई थी और यह उन पहले शहरों में से था जहां सीवर लाइनें भी बनाई गईं। शहर के कुछ हिस्सों में ईंट से बनी सीवर लाइनों को आज भी देखा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा इन संरचनात्मक कमजोरियों को और बढ़ा रही है, क्योंकि बाढ़ और भूस्खलन से पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। कुछ शहरों के अधिकारी चरणबद्ध सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने की घोषणाएं कर चुके हैं। हालांकि, सुब्रत चक्रवर्ती का कहना है कि यह काम कहीं से भी आसान नहीं है।

इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दस्त (डायरिया) फैलने के बाद नगर निगम अधिकारियों ने पाइप से आने वाली पानी की सप्लाई बंद कर दी है और उस इलाके में 20 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन को बदला जा रहा है
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दस्त (डायरिया) फैलने के बाद नगर निगम अधिकारियों ने पाइप से आने वाली पानी की सप्लाई बंद कर दी है और उस इलाके में 20 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन को बदला जा रहा है(फोटो: योगेश गुंजल)

पुरानी मानचित्रण प्रणाली और डाटा की कमी, एक बड़ी समस्या

भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। 2036 तक इसके कस्बों और शहरों में 60 करोड़ लोग रहेंगे यानी कुल आबादी का 40 प्रतिशत, जो 2011 में 31 प्रतिशत था। इसलिए देश दो दबावों के बीच फंसा है। पहला है, विशाल और पुराने बुनियादी ढांचों की मरम्मत और रखरखाव करना और दूसरी समस्या नई आबादी वाले क्षेत्रों में जल आपूर्ति का विस्तार करना है।

सुब्रत चक्रवर्ती कहते हैं, “चूंकि जल आपूर्ति का विस्तार सीवर प्रणाली से आगे निकल गया है और बड़े हिस्से के शहरी घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना बाकी है, इसलिए यह आवश्यक है कि इंजीनियर सबसे पहले मौजूदा पीने के पानी की लाइनों की पहचान करें और सीवर लाइन बिछाने से पहले इसे पूरी सावधानी से करें।” हालांकि, भरोसेमंद मानचित्रों की कमी और ऐसी घनी आबादी वाले क्षेत्र जहां कई यूटिलिटी लाइनें समानांतर चलती हैं, वहां पाइपलाइन अलगाव के सुरक्षा मानकों का उल्लंघन होने का जोखिम बढ़ा सकते हैं। भोपाल स्थित स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के डिपार्टमेंट ऑफ एनवायरमेंटल मैनेजमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर गोविंद एम पी बताते हैं कि भूमिगत ढांचों का पुराना और टुकड़ों में मौजूद मानचित्रण एक केंद्रीय समस्या है। किसी शहर में आधारभूत ढांचों को बिछाने और बनाए रखने में कई संस्थाएं शामिल होती हैं। आमतौर पर पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (पीएचईडी) पाइपलाइन स्थापित करता है, जबकि नगर पालिकाएं उनका रखरखाव करती हैं। अक्सर अधिकारी अनजाने में इन पाइपलाइनों के ऊपर शौचालय या अन्य संरचनाएं बना देते हैं क्योंकि नेटवर्क के अपडेटेड मानचित्र उपलब्ध नहीं होते। गोविंद कहते हैं कि अक्सर सलाहकारों के पास सबसे सटीक डाटा होता है। वह जोर देते हैं “तकनीकी विशेषज्ञता संस्थानों के भीतर मौजूद है, लेकिन यह केवल तभी उपयोग में लाई जा सकती है जब डाटा उपलब्ध हो।”

मध्य प्रदेश के शहरों में पानी के प्रदूषण के संबंध में एनजीटी में याचिका दायर करने वाले भोपाल के सामाजिक कार्यकर्ता कमल राठी बताते हैं कि बढ़ते शहर में भूमिगत ढांचों के मानचित्र कितने महत्वपूर्ण हैं। जब भोपाल की अरेरा कॉलोनी में 1965 में पानी और सीवर लाइनें बिछाई गई थीं तो ध्यान रखा गया था कि सीवर लाइनें सड़क के एक तरफ और पानी की लाइनें दूसरी तरफ रहें ताकि प्रदूषण का जोखिम कम हो। लेकिन इस वक्त जगह की कमी के कारण इस अभ्यास को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

राठी कहते हैं, “अगर आप किसी भी शहर की किसी भी कॉलोनी में जाएं, तो आप पाएंगे कि सीवर लाइनें और पानी की लाइनों का क्रॉस होना आम बात हो गई है और यह इंदौर जैसी घटनाओं को बार-बार जन्म देता रहेगा।” वह जोड़ते हैं कि सभी शहरों को जियोस्पेशियल (जीआईएस) मानचित्रण अपनाना चाहिए ताकि भूमिगत ढांचों का डिजिटलीकरण किया जा सके और इसके प्रभावी निगरानी और रखरखाव को सुनिश्चित किया जा सके।

भूमिगत ढांचों का जीआईएस मानचित्रण पहले से ही स्मार्ट सिटी मिशन और अमृत योजना का एक अहम हिस्सा है। इसका उद्देश्य शहरों की नीचे मौजूद पाइपलाइन, केबल और अन्य ढांचों की सही जानकारी रखना है। साथ ही सभी प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पीएम गति शक्ति पोर्टल पर मैप करना जरूरी है। इसके पीछे तर्क यह है कि ऐसा करने से शहरी योजना बेहतर बनेगी और विकास कार्य ज्यादा प्रभावी तरीके से हो पाएंगे।

कुछ शहरों ने भूमिगत यूटिलिटी के लिए जीआईएस तकनीक लागू की है। इनमें वाराणसी, वडोदरा और पुणे का नाम शामिल है। हालांकि, सभी नामित शहर यह कार्य पूरा नहीं कर पाए हैं और अभी भी कागज आधारित मानचित्रों, तालिकाओं और रेखाचित्रों के साथ जूझ रहे हैं।

जयपुर के मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुड़े शहरी योजनाकार प्रताप रावल कहते हैं कि अधिकांश यूटिलिटी कंपनियां यह पहचानने के लिए प्रेशर मीटर पर निर्भर करती हैं कि लीकेज किस क्षेत्र में हो रहा है। यह तरीका दोष का सटीक स्थान नहीं बताता। भारत में जल आपूर्ति प्रणाली में खराबियों का पता लगाने और प्रबंधन करने में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) सेंसर जैसी तकनीक निर्णायक भूमिका निभा सकती है। भूमिगत पाइपलाइन का मानचित्र बनाने और लीकेज पहचानने के लिए ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार का भी उपयोग किया जा सकता है। जयपुर जैसे शहरों में इसका प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, रावल यह स्वीकार करते हैं कि उच्च लागत के कारण इसका उपयोग सीमित ही रहा है।

इन सीमाओं के बावजूद कुछ शहर नवाचार कर रहे हैं। ओडिशा के 11 शहरों में अब चौबीसों घंटे पीने लायक पानी की आपूर्ति की जा रही है। इसके लिए पाइपलाइनों में निरंतर दाब बनाए रखा जा रहा है, साथ ही समुदाय की सक्रिय भागीदारी के साथ सतत निगरानी सुनिश्चित की गई है (देखें : नल से जल अब हो सकता है हकीकत, पृष्ठ 28)। गुजरात में सूरत नगर निगम ने “नॉन-रेवेन्यू वाटर सेल” की स्थापना की है। यह सेल जीआईएस की मदद से पानी के रिसाव का मानचित्रण करता है, जल लेखा-परीक्षण (वॉटर ऑडिट) करता है और सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डाटा एक्विजिशन (एसीएडीए) जैसी स्मार्ट तकनीकों का उपयोग करता है। इससे न सिर्फ राजस्व वसूली में सुधार हो रहा है बल्कि पानी की बर्बादी कम होने के साथ कार्यकुशलता बढ़ रही है। वहीं, दिल्ली में अधिकारियों का ध्यान सही स्थापना और सामग्री की गुणवत्ता पर केंद्रित है ताकि जहां ज्वाइंट हो वहां से पानी न रिसे। स्थानीय नियम यूटिलिटी कंपनियों को सीवर और पानी की लाइनों के बीच निर्धारित दूरी बनाए रखने के लिए बाध्य करते हैं।

पटना सिटी के कैमाशिकोह हाउसिंग सोसाइटी में पानी की सप्लाई की पाइपलाइन वर्षा जल निकासी नाले (स्टॉर्म वाटर ड्रेन) के साथ-साथ चलती है
पटना सिटी के कैमाशिकोह हाउसिंग सोसाइटी में पानी की सप्लाई की पाइपलाइन वर्षा जल निकासी नाले (स्टॉर्म वाटर ड्रेन) के साथ-साथ चलती है(फोटो: सचिन कुमार)

सीवर-केंद्रित रणनीति की ओर बदलाव

इसके बावजूद. ऐसी रणनीतियां अक्सर पूरी तरह काम नहीं कर पातीं। सार्वभौमिक सीवर व्यवस्था अभी भी सिर्फ एक सपना है और हर घर से मल-मूत्र को इकट्ठा करने के लिए बहुत कम काम किया जा रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स के मुताबिक, अमृत योजना के तहत राज्यों में लगभग 8,792 परियोजनाओं के लिए 1,93,095 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं। लेकिन जल आपूर्ति अभी भी शीर्ष प्राथमिकता है, जो स्वीकृत खर्च का 62 प्रतिशत लेती है। वहीं, सीवर और सेप्टेज प्रबंधन के लिए केवल 34 प्रतिशत खर्च किया गया है जबकि जलाशयों के पुनर्जीवन पर केवल तीन प्रतिशत खर्च हुआ। चक्रवर्ती बताते हैं कि “सीवरयुक्त” माने जाने वाले शहरों में भी बड़े गैर-सीवर वाले क्षेत्र मौजूद हैं। शहरी भारत का अधिकांश हिस्सा ऑन-साइट सैनिटेशन सिस्टम पर निर्भर करता है यानी सेप्टिक टैंक या अधूरे कंटेनमेंट सिस्टम होते हैं, जिनमें नीचे या चारों तरफ कोई जलरोधक परत नहीं होती।

सीएसई द्वारा 2022 में किए गए एक सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के चुनार में 95 प्रतिशत घरों में व्यक्तिगत शौचालय पाए गए। फिर भी सीवर लाइनों की अनुपस्थिति में 88 प्रतिशत घरों ने शौचालय का मल जल निकासी नालों या आसपास के जलाशयों या खुले मैदान में ही छोड़ा। 2024 के सीएसई सर्वेक्षण में दिल्ली के संगम विहार क्षेत्र में 70 प्रतिशत सेप्टेज होल्डिंग टैंक के नीचे लाइनिंग यानी जल रोधी सुरक्षा परत नहीं पाई गई। ऐसे तरीके भूमिगत पानी को गंदा करते हैं साथ ही खराब पेयजल और बार-बार होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का चक्र बनाते हैं। चक्रवर्ती कहते हैं, “इसलिए सबसे पहले जरूरी है कि सेप्टिक टैंकों से कीचड़ को नियमित रूप से निकालकर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में ठीक से साफ किया जाए। अगर कीचड़ निकालने वाली गाड़ियां इसे एसटीपी में डालने के बजाय खुले नालों या तालाबों में फेंक देती हैं तो अधिकारियों को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।”

भुवनेश्वर में एक “जलसाथी”, जिसे ओडिशा के “ड्रिंक फ्रॉम टैप” मिशन के तहत 24 घंटे पानी की सप्लाई के लिए नियुक्त किया गया है, जो कि निगरानी और गुणवत्ता जांच के लिए जमीनी स्तर पर सहायता प्रदान करता है
भुवनेश्वर में एक “जलसाथी”, जिसे ओडिशा के “ड्रिंक फ्रॉम टैप” मिशन के तहत 24 घंटे पानी की सप्लाई के लिए नियुक्त किया गया है, जो कि निगरानी और गुणवत्ता जांच के लिए जमीनी स्तर पर सहायता प्रदान करता है(फोटो: शगुन / सीएसई)

इंदौर जल संकट यह दिखाता है कि क्यों सीवर-केंद्रित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। भागीरथपुरा जिस कान्ह नदी के किनारे फैला है, वह नदी अब ऊपर की ओर मौजूद असंगठित कॉलोनियों से आने वाले सीवर का रास्ता बन गई है। वहां के निवासी डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि भागीरथपुरा को केवल एक साल पहले ही सीवर लाइन मिली थी, उससे पहले अधिकांश घरों का शौचालय और घरेलू कचरा सीधे नदी में बहाया जाता था। अब यह नदी की बजाए एक नाले जैसी दिखती है और लगातार बदबू फैलाती है। इंदौर के स्वतंत्र जल और स्वच्छता विशेषज्ञ राहुल बनर्जी कहते हैं, “शहर के भीतर कान्ह नदी की पूरे 9 किलोमीटर लंबी सीमा किसी भी मानव उपयोग के लिए अनुपयुक्त है।” पिछले कुछ वर्षों में शहर की हजारों खुली नालियों और आउटफॉल को ठीक करने के बड़े कार्यक्रम चलाए गए हालांकि, उनका प्रभाव बहुत कम रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मल संक्रमण का अहम संकेतक ई. कोलाई हाल ही में भागीरथपुरा के 51 ट्यूबवेल के पानी के नमूनों में पाया गया। इससे पहले, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 2016-17 में की गई जांच में इंदौर के 60 स्थानों पर व्यापक भूजल प्रदूषण पाया गया, जिसमें भागीरथपुरा भी शामिल था। कुल कोलीफॉर्म स्तर यह संकेत देते हैं कि पानी में मल-संक्रमण मौजूद था।

सीएसई की महानिदेशक और पत्रिका की संपादक सुनीता नारायण साफ-सुथरे पानी की सुरक्षा के लिए तीन-स्तरीय दृष्टिकोण सुझाती हैं। उनके मुताबिक, अमृत योजना के दिशा-निर्देशों को सीवर प्रबंधन को प्राथमिकता देने के लिए फिर से तैयार किया जाना चाहिए। साथ ही शहरों को ऑन-साइट सेप्टेज टैंकों के मौजूदा नेटवर्क का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह तेज, सस्ता और अधिक समावेशी है। दूसरा, दिशा-निर्देशों में रीयूज को प्रोत्साहित करना चाहिए। शहरों को उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल और स्लज को जैव-उपज या ईंधन के लिए भेजने पर भुगतान किया जाना चाहिए। परियोजना केवल सीवर को इंटरसेप्ट करने या स्वतंत्र ट्रीटमेंट प्लांट बनाने तक सीमित ना हो। नारायण के मुताबिक, फाइनेंसिंग को इस बात से जोड़ा जाना चाहिए कि कितनी मात्रा में सीवर का पानी और कीचड़ साफ करके दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है। तीसरा, जल परियोजनाओं को स्थानीय स्रोतों से जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें जलाशयों का पुनर्जीवन शामिल है। इससे लंबी दूरी के जल स्थानांतरण की लागत कम होगी, भूजल उपयोग अधिक टिकाऊ होगा और जल आपूर्ति अधिक सस्ती होगी। हालांकि, नारायण यह भी जोड़ती हैं कि यह केवल सीवर को प्राथमिक दृष्टिकोण मानने और अपनाने पर ही संभव है।

(रायपुर से पुरुषोत्तम ठाकुर और पटना से मोहम्मद इमरान खान के इनपुट के साथ)

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in