विश्व जल दिवस विशेष: ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी, सूखे की चपेट में दुनिया का भविष्य

मेगा-ड्राउट और डूबते हुए शहरों के बीच दुनिया का मीठा पानी तेजी से खत्म हो रहा है
चिली में, जो 2010 से मेगाड्राउट (अत्यधिक सूखा) का सामना कर रहा है, कोक्विंबो के कॉगोटी जलाशय में 2024 में पानी का स्तर रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया
चिली में, जो 2010 से मेगाड्राउट (अत्यधिक सूखा) का सामना कर रहा है, कोक्विंबो के कॉगोटी जलाशय में 2024 में पानी का स्तर रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया(फोटो: रॉयटर्स)
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ईरान, इराक और सीरिया का क्षेत्र लंबी अवधि वाले सूखे की चुनौतियों से जूझने वाला अकेला क्षेत्र नहीं है। दुनिया भर में अपनी अवधि और क्षेत्रफल के कारण गंभीर माने जाने वाले मेगाड्राउट पारिस्थितिकी तंत्र और समुदायों पर स्थायी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

चिली का ही उदाहरण लीजिए, जहां 2010 से एक मेगाड्राउट जारी है। विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक यह मुख्य तौर पर देश के मध्य क्षेत्र में केंद्रित है, जहां वर्षा की कमी 20 से 60 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। कुछ अध्ययन इसके आरंभ को 2007 तक मानते हैं, जिससे यह रिकॉर्ड पर दर्ज सबसे लंबी अवधि वाले सूखे की स्थितियों में से एक बन जाता है। चिली में ताजे पानी की सबसे अहम स्रोत केंद्रीय चिली की पर्वतीय झीलों को माना जाता है, 2010 से 2020 के बीच वह भी सूख गईं। दिसंबर, 2021 में जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी : रीजनल स्टडीज में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, इस अवधि में 12 झीलों का सतही क्षेत्र सात से 25 प्रतिशत तक सिकुड़ गया।

वहीं, मार्च, 2024 में साइंस ऑफ द टोटल एनवॉयरमेंट में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक सरकार की छोटी अवधि के उपायों ने भी स्थिति को और बिगाड़ा। दरअसल, 1997 से 2022 के बीच भूजल का अथ्यधिक दोहन हुआ और उसमें 383 फीसदी की बढोतरी दर्ज हुई। अप्रैल 2022 में चिली की राजधानी सैंटियागो में कड़े जल राशनिंग यानी जल नियंत्रण के उपाय लागू किए गए, जिनका एक सरल संस्करण आज भी जारी है।

दूसरे स्थानों पर भी मेगाड्राउट ने श्रृंखलाबद्ध प्रभाव पैदा किए हैं। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के कैलिफोर्निया में सूखे के अध्यायों ने जंगलों में भयानक आग को जन्म दिया। 2025 में कैलिफोर्निया की आग इतिहास की सबसे महंगी जलवायु परिवर्तन-संबंधित आपदाओं में शामिल रहीं, जिनमें अनुमानित हानि 60 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई। वैज्ञानिक इन वाइल्डफायर की वजह आंशिक रूप से “हाइड्रोक्लाइमेटिक व्हिपलैश” की मानते हैं। यह एक ऐसा घटना क्रम होता है, जिसमें एक वर्ष अत्यधिक वर्षा वाला होता है और उसके तुरंत बाद एक बेहद सूखा और गर्म वर्ष आता है, जिससे व्यापक स्तर की आग जंगल में फैलती है। वहीं, लंबी अवधि का शुष्क मौसम इस जोखिम को और बढ़ा देता है।

जनवरी 2025 में साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक पेपर ने इस प्रवृत्ति को दिखाया है। पत्रिका के मुताबिक, 1980 से 2018 के बीच 500 बहुवर्षीय सूखों का विश्लेषण करने पर लेखक ने पाया कि ऐसे सूखे अब पहले से अधिक गर्म, शुष्क और वनस्पति के लिए हानिकारक हो गए हैं। वहीं, हर साल प्रभावित भूमि क्षेत्र 49,000 वर्ग किलोमीटर बढ़ रहा है। सबसे लंबी घटना 2010 से 2018 के बीच पूर्वी कांगो बेसिन में हुई, जिसकी चरम सीमा 2014 में 15 लाख वर्ग किलोमीटर थी।

इन सूखों के साथ जुड़ी तापमान असमानताएं हर दशक में लगभग 0.26 से 0.35 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ी हैं। यह बढ़ोतरी दुनिया भर की जमीन की सतह के पास हवा के औसत तापमान में दर्ज की गई वृद्धि (लगभग 0.25 से 0.32 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक) के बराबर है। इसका मतलब है कि सूखे से जुड़े तापमान में बदलाव उसी गति से बढ़ रहे हैं, जिस गति से धरती का औसत तापमान बढ़ रहा है।

पारिस्थितिकी पर लगातार असर बढ़ रहा है। अध्ययन में पाया गया कि समशीतोष्ण घास के मैदानों यानी पृथ्वी के वह भू-भाग जहां सीमित वर्षा, मध्यम तापमान होता है और मुख्य वनस्पति घास होती है, वहां सर्वाधिक नुकसान हरित वनस्पति का हुआ है। यह क्षति खासतौर से मध्य और पूर्वी मंगोलिया, दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी अमेरिका में दर्ज की गई। वहीं, वर्ष 2000 से 2007 के बीच मंगोलिया में सूखा सबसे तीव्र और लगातार रहने वाला रहा, जिससे वनस्पति सूचकांक लगभग 30 प्रतिशत घट गया जबकि पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में दो बहुवर्षीय सूखों के दौरान वनस्पति सूचकांक 33 फीसदी घट गया।

स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर है। जुलाई 2025 में साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने चेतावनी दी कि सूखे क्षेत्र तेजी से सूख रहे हैं, जबकि नम क्षेत्र अपेक्षाकृत कम तेजी से नम हो रहे हैं, जिससे ग्रह पर कुल शुष्कता बढ़ रही है। 2002 से 2024 के बीच पृथ्वी पर जल संग्रह यानी टेरेस्टरियल वाटर स्टोरेज (टीड्बल्यूएस) में बदलाव का विश्लेषण दिखाता है कि हर साल सूखा क्षेत्र कैलिफोर्निया के आकार के दो गुना फैल रहे हैं, जिससे उत्तरी गोलार्द्ध में बड़े “मेगाड्राइंग क्षेत्र” बन रहे हैं।

पहले किए गए अध्ययन भी अलग-अलग सूखे के हॉटस्पॉट्स की पहचान कर चुके हैं। अमेरिका में स्थित एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी में अर्थ सिस्टम साइंटिस्ट और जुलाई 2025 के साइंस पत्रिका में प्रकाशित पेपर के लेखक हृषिकेश चंदनपुरकर डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “2009 में पहला हॉटस्पॉट पंजाब और राजस्थान में देखा गया था।” वह आगे कहते हैं, “लेकिन असलियत में यह क्षेत्र लगातार जुड़े हुए हैं। हमने पाया कि पिछले कुछ वर्षों में इन हॉटस्पॉट्स के मध्यवर्ती क्षेत्र जैसे दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश भी सूख रहे हैं।” हालांकि, मध्यवर्ती क्षेत्र हॉटस्पॉट इलाकों की तुलना में उतने अधिक सूखे नहीं हो रहे हैं, इसलिए उन पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। कई हॉटस्पॉट्स अब आस-पास के क्षेत्रों और अन्य हॉटस्पॉट्स से जुड़ने लगे हैं। चंदनपुरकर बताते हैं, “भारत का हॉटस्पॉट अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, कैस्पियन सागर और उत्तर अफ्रीका के हॉटस्पॉट्स से जुड़ रहा है। हम यह मेगाड्राइंग क्षेत्र पश्चिमी यूरोप से लेकर पूर्वी चीन सागर तक देख रहे हैं।”

उत्तरी गोलार्द्ध में तीन और बड़े “मेगाड्राइंग” क्षेत्र उभर रहे हैं। इनमें उत्तरी कनाडा और उत्तरी रूस शामिल हैं, जहां ऊंचे अक्षांशों पर पहले देखी जा रही नमी की प्रवृत्ति अब उलट गई है और वहां सूखापन बढ़ने लगा है। इसके अलावा दक्षिण-पश्चिमी उत्तरी अमेरिका और मध्य अमेरिका का जुड़ा हुआ क्षेत्र भी शामिल है, जहां शुष्कीकरण और भूजल का क्षय लगातार जारी है या और अधिक गंभीर होता जा रहा है। 2014 -16 के दौरान एक मजबूत अल नीनो की घटना ने इस प्रक्रिया को विशेष रूप से तेज किया। इसका पहला कारण ग्लेशियरों का पिघलना और वर्षा में कमी है, जो हिमालय में दिखाई देता है। वहीं, दूसरा कारण प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन, जैसे अल नीनो, आर्कटिक ऑसिलेशन और पैसिफिक डीकेडल ऑसिलेशन, जो कुछ वर्षों को अत्यधिक शुष्क या आद्र बनाते हैं। इसके अलावा तीसरा कारण, भूजल की अत्यधिक निकासी है, जो गैर-हिमनदीय महाद्वीपीय क्षेत्रों में टीडब्ल्यूएस हानि का 68 प्रतिशत हिस्सा है।

सबसे तेजी से सूखने वाले नदी बेसिनों में सिंधु बेसिन शामिल है, जहां कुल जल भंडार (टीडब्ल्यूएस) में हर साल लगभग 1.23 सेंटीमीटर की कमी आ रही है। इसके बाद गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन है, जहां यह कमी लगभग 1.09 सेंटीमीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई है। उत्तरी कनाडा और दक्षिण-पश्चिमी अमेरिका भी इससे बहुत पीछे नहीं हैं, जहां कुल जल भंडार में क्रमशः 0.86 और 0.85 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गिरावट देखी गई है। अध्ययन के मुताबिक, महाद्वीपीय स्तर पर बढ़ता सूखापन अब वैश्विक समुद्र-स्तर वृद्धि का सबसे बड़ा योगदान दे रहा है और इसका हिस्सा लगभग 44 प्रतिशत है। यह ग्रीनलैंड की हिम-चादर के पिघलने से समुद्र स्तर में 37 प्रतिशत और अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने से 19 प्रतिशत बढ़ोतरी से भी अधिक है। अध्ययन कहता है,“पिछले 22 वर्षों में मीठे पानी की मात्रा घटने वाले 101 देशों में लगभग छह अरब लोग रहते हैं, जो 2020 में दुनिया की कुल आबादी का लगभग 75 प्रतिशत है।”

दुनिया के सूखे क्षेत्र तेजी से सूख रहे हैं, जबकि गीले क्षेत्र उतने अधिक गीले नहीं हो रहे, जिससे पूरे ग्रह में कुल मिलाकर सूखापन बढ़ रहा है

बड़ा नुकसान

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ ने अपनी रिपोर्ट में इसे “वाटर बैंकरप्सी” कहा है। यानी यह पानी के मामले में संकट से भी एक कदम आगे बढ़कर दिवालिया होने की स्थिति है (देखें : खाली हो गया है पानी का चालू खाता, पृष्ठ 38)। यूनिवर्सिटी की ओर से 20 जनवरी को जारी की गई रिपोर्ट “ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी : लिविंग बियांड ऑवर हाइड्रोलाजिकल मीन्स इन द पोस्ट क्राइसिस एरा” में चेतावनी दी गई है, “कई बेसिन और भूजल स्रोतों में लंबे समय से पानी का उपयोग नवीनीकरणीय जल प्रवाह और सुरक्षित उपयोग की सीमा से अधिक हो गया है। लिहाजा नदियां, झीलें, भूमिगत जल, आर्द्रभूमि, मिट्टी और ग्लेशियर में से कई प्राकृतिक संसाधनों का वास्तविक रूप में पूरी तरह बहाल होना संभव नहीं दिखता।” रिपोर्ट के अनुसार, अब दुनिया की तीन-चौथाई आबादी उन देशों में रहती है जिन्हें जल असुरक्षित या गंभीर जल संकट वाले देशों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कई नदियां समुद्र या महासागर तक नहीं पहुंच पातीं या पूरे वर्ष पर्यावरणीय जल प्रवाह सुनिश्चित नहीं कर पातीं। विश्व की लगभग 25 प्रतिशत आबादी अपनी जीविका के लिए मीठे पानी की झीलों पर निर्भर है, जो 1990 के दशक से तेजी से घट रही हैं। वहीं, पिछले 50 वर्षों में दुनिया ने यूरोपीय संघ के बराबर यानी लगभग 410 मिलियन हेक्टेयर आर्द्रभूमि खो दी है। इनमें से लिबिया देश के आकार वाली 177 मिलियन हेक्टेयर इनलैंड वेटलैंड जो अंदरूनी पानी वाले इलाके होते हैं और स्वाम्प यानी पेड़ों-झाड़ियों के साथ स्थायी पानी वाले इलाके भी नहीं रहे। यह जैव विविधता से भरपूर होते हैं। इन वेटलैंड से पारिस्थितिकी सेवाओं का नुकसान 5.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर है, जो दुनिया के सबसे गरीब 135 देशों की वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बराबर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भूजल का अत्यधिक दोहन पहले ही 60 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि के डूबने का कारण बन चुका है, जो कि वैश्विक भूमि क्षेत्र का लगभग पांच प्रतिशत है। इसमें 2,00,000 वर्ग किलोमीटर शहरी और घनी आबादी वाले क्षेत्र शामिल हैं, जहां करीब दो अरब लोग रहते हैं। कुछ स्थानों पर भूमि हर साल 25 सेंटीमीटर तक डूब रही है, जिससे जल भंडारण क्षमता स्थायी रूप से कम हो रही है और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। विश्व ने 1970 से अब तक अपने ग्लेशियर का 30 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। आने वाले दशकों में कई पर्वतीय ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो सकते हैं। यह खतरा खासतौर से निम्न और मध्यम अक्षांश वाले क्षेत्रों में है। ऐसे में उन समुदायों के जीवन और आजीविका को गंभीर खतरा है जो ग्लेशियर और हिमनदी से आने वाले नदियों पर निर्भर हैं। खेती-किसानी जो दुनिया के मीठे पानी का लगभग 70 प्रतिशत उपयोग करती है, सबसे अधिक खतरे में है। पानी की उपलब्धता और घट रही है क्योंकि गैरशोधित वेस्टवाटर, कृषि से बहने वाला रसायनयुक्त पानी, और उद्योग एवं खनन से निकलने वाला दूषित पानी जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, मीठे पानी के चक्र के दो महत्वपूर्ण घटक पहला “नीला पानी” (सतही और भूमिगत जल) और दूसरा “हरा पानी” (मिट्टी में नमी) अब सुरक्षित उपयोग की सीमा से परे पहुंच चुके हैं। साथ ही, यह बदलाव जलवायु, पारिस्थितिकी संतुलन और भूमि प्रबंधन जैसी वैश्विक सीमाओं के लिए भी जोखिम पैदा कर रहा है।

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