

एनजीटी ने मध्य प्रदेश में दूषित पेयजल की समस्या को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दिए हैं।
इंदौर में दूषित जल की वजह से हुई घटनाओं के बाद, समिति गठित की गई है जो 6 सप्ताह में रिपोर्ट देगी।
राज्य के सभी जिलों में दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए गए हैं।
आईआईटी इंदौर और सीपीसीबी की संयुक्त समिति रिपोर्ट देगी।
मध्यप्रदेश के शहर इंदौर में प्रदूषित जल के बाद हुई मौतों के बाद पेयजल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई स्तरों पर शुद्ध पेयजल के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। न्यायालय में पेयजल संबंधी कई याचिकाएं भी लगाई जा रही हैं। गुरुवार को एक ऐसी ही याचिका की सुनवाई एनजीटी में हुई, जिसमें महत्वपूर्ण आदेश दिए गए हैं।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण, सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने मध्य प्रदेश के शहरों में सीवेज मिश्रित और दूषित पेयजल की आपूर्ति को जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानते हुए 15 जनवरी को फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और ईश्वर सिंह (विशेषज्ञ सदस्य) की पीठ ने कमल कुमार राठी बनाम मध्यप्रदेश शासन व अन्य (O.A. No. 06/2026) मामले की सुनवाई करते हुए राज्य शासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की है।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता हरप्रीत सिंह गुप्ता ने बताया कि सुनवाई में बताया गया कि भोपाल के तालाबों में फेकल कोलीफॉर्म की मात्रा खतरनाक स्तर (1600 मिली) पर है और सीवेज लाइनें पेयजल लाइनों को दूषित कर रही हैं, जो सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का हनन हो रहा है। एनजीटी ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21' का उल्लंघन है। एनजीटी ने आईआईटी (IIT) इंदौर और सीपीसीबी (CPCB) की संयुक्त जांच समिति गठित की है।
समिति 6 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। इस समिति में आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि, प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन, प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि, म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी) होंगे। एनजीटी ने विशेष रूप से आदेश दिया है कि इस फैसले की प्रति मध्यप्रदेश के सभी जिलों के जिला कलेक्टर और सभी नगर निगम आयुक्तों को भेजी जाए, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इन निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित कर सकें। मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च 2026 को होगी।
एनजीटी ने जारी किए 14-सूत्रीय दिशा-निर्देश :
एमआईएस और 24x7 वाटर ऐप: एक मजबूत 'प्रबंधन सूचना प्रणाली' और मोबाइल ऐप बनाया जाए, जिस पर पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट, सप्लाई का समय और शिकायत निवारण की जानकारी हो।
जीआईएस मैपिंग: पूरे राज्य में पेयजल और सीवेज लाइनों की 'जीआईएस-आधारित मैपिंग' हो ताकि यह पता चले कि कहां सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।
एरेशन और क्लोरीनेशन: पानी की शुद्धता के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन के साथ-साथ 'एरेशन प्रक्रिया' अनिवार्य रूप से अपनाई जाए।
टैंको की सफाई: सभी ओवरहेड टैंकों और सम्प-वेल को हमेशा चालू रखा जाए और उनकी नियमित सफाई व क्लोरीनेशन हो।
पाइपलाइन मरम्मत: लीकेज और ट्रांसमिशन लॉस को रोकने के लिए युद्धस्तर पर पाइपलाइनों की मरम्मत हो।
अतिक्रमण हटाना: जल स्रोतों (तालाब, कुएं, बावड़ी) के आसपास से सभी प्रकार के अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं।
ग्रीष्मकालीन जल प्रबंधन: मार्च से जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्यों पर रोक लगे और वार्ड-वार राशनिंग (वैकल्पिक दिन) की व्यवस्था हो।
जल पुनर्चक्रण : सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को पुनर्जीवित करने की योजना लागू की जाए।
सख्त वाटर हार्वेस्टिंग: सरकारी और निजी भवनों (स्कूल/कॉलेज सहित) में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
क्या करें-क्या न करें: नागरिकों के लिए पानी के उपयोग के संबंध में 'Do's and Don'ts' जारी किए जाएं।
डेयरियों का विस्थापन: शहर सीमा के भीतर 2 से अधिक पशुओं वाली सभी डेयरियों को 4 महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट किया जाए।
मूर्ति विसर्जन पर पूर्ण रोक: किसी भी पेयजल स्रोत (डैम, तालाब) में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे।
मीटरिंग: सभी घरेलू और व्यावसायिक पानी के कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएं।
टैंकर आपूर्ति: जल संकट के समय टैंकरों से आपूर्ति के लिए पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ योजना तैयार रहे।