देश के 13 बड़े जलाशयों में भंडारण 50% से नीचे, नदी बेसिनों में तेजी से गिरा पानी

जलाशयों में बिगड़ती स्थिति आने वाले दिनों में पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा सकता है
File Photo by Amit Shanker/CSE
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सारांश
  • केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के 166 जलाशयों में पानी का भंडारण तेजी से घटकर 34.45 प्रतिशत रह गया है

  • 13 प्रमुख जलाशयों में स्तर सामान्य के 50 प्रतिशत से नीचे पहुंच गया है।

  • दक्षिण और पूर्वी भारत में स्थिति सबसे गंभीर है, कई बांध लगभग खाली हैं। इससे पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भारी दबाव की आशंका है।

  • दो हफ्तों में जलाशयों से करीब 8 बीसीएम पानी घटा है।

  • गंगा, गोदावरी, नर्मदा और कृष्णा सहित कई नदी बेसिनों में भी पानी तेजी से गिरा है।

  • अल-नीनो के कारण कमजोर मानसून रहा तो पेयजल और सिंचाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।

मानसून समय से पहले आ रहा है, लेकिन साथ ही आशंका जताई जा रही है कि अल-नीनो के असर से मानसून के दौरान बारिश कम होगी। अगर ऐसा होता है तो नदी बेसिनों व जलाशयों में पानी का अभूतपूर्व संकट पैदा हो सकता है। 

केंद्रीय जल आयोग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में इस समय कुल 63.232 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है, जो सामान्य भंडारण से लगभग 24 प्रतिशत अधिक है, लेकिन 30 अप्रैल 2026 तक देश के 166 जलाशयों में कुल 71.082 अरब घन मीटर (बीसीएम) पानी बचा था, जो उनकी कुल क्षमता का 38.72 प्रतिशत था। अब 14 मई की रिपोर्ट में यह घटकर 63.232 बीसीएम रह गया है, यानी केवल 34.45 प्रतिशत। महज दो हफ्तों में करीब 8 बीसीएम पानी कम हो गया। 

स्थिति सबसे ज्यादा दक्षिण और पूर्वी भारत में बिगड़ती दिख रही है। 30 अप्रैल की रिपोर्ट में दक्षिण भारत के 36 जलाशयों में पानी 40 प्रतिशत से नीचे बताया गया था। अब ताजा रिपोर्ट में तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना के कई जलाशय सामान्य स्तर के आधे से भी नीचे पहुंच चुके हैं। तमिलनाडु के वैगई जलाशय में सामान्य भंडारण का केवल 12.47 प्रतिशत पानी बचा है, जबकि अलियार में 21.25 प्रतिशत और केरल के पेरियार में 41.65 प्रतिशत पानी दर्ज किया गया है।

कुछ जलाशयों की हालत और ज्यादा गंभीर हो चुकी है। 30 अप्रैल की रिपोर्ट में केवल चंदन डैम के सूखने का उल्लेख था, लेकिन 14 मई की रिपोर्ट में बिहार का चंदन डैम, महाराष्ट्र का भीमा उज्जैनी और उत्तर प्रदेश का मौदाहा जलाशय पूरी तरह खाली यानी शून्य स्तर पर पहुंच गए हैं।

असम का खांडोंग, कर्नाटक का तट्टीहल्ला, मध्य प्रदेश का राजघाट और उत्तराखंड का टिहरी भी गंभीर संकट में हैं।

नदी बेसिनों में भी घटा पानी

नदी बेसिनों की स्थिति भी तेजी से बिगड़ रही है। 30 अप्रैल की रिपोर्ट में गंगा बेसिन लगभग 50 प्रतिशत, गोदावरी 40 प्रतिशत और नर्मदा करीब 39 प्रतिशत स्तर पर बताए गए थे। अब 14 मई की रिपोर्ट में गंगा बेसिन का भंडारण 43.34 प्रतिशत, गोदावरी का 36.52 प्रतिशत और नर्मदा का 34.96 प्रतिशत रह गया है। कृष्णा बेसिन पहले ही कमजोर स्थिति में था और अब वहां केवल 19.31 प्रतिशत पानी बचा है।

पूर्वोत्तर भारत का बराक बेसिन सबसे ज्यादा संकटग्रस्त बना हुआ है। 30 अप्रैल की रिपोर्ट में इसे सबसे कमजोर बेसिन बताया गया था और अब भी यह सामान्य से 20 प्रतिशत से अधिक नीचे बना हुआ है। ब्रह्माणी-बैतरणी, कावेरी और महानदी-पेन्नार के बीच की पूर्वी नदियों वाले बेसिन भी सामान्य स्तर से नीचे हैं।

देश में अब 13 प्रमुख जलाशय ऐसे हो गए हैं, जहां पानी का स्तर सामान्य भंडारण के 50 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच गया है। 30 अप्रैल को इनकी संख्या 9 थी। 

इनमें असम का खांडोंग (17.42 प्रतिशत), बिहार का चंदन डैम (0.00 प्रतिशत), कर्नाटक का तट्टिहल्ला (26.27 प्रतिशत), केरल का पेरियार (41.65 प्रतिशत), मध्य प्रदेश का राजघाट डैम (35.05 प्रतिशत), महाराष्ट्र का भीमा उज्जैनी (0.00 प्रतिशत), तमिलनाडु के अलियार (21.25 प्रतिशत) और वैगई (12.47 प्रतिशत), तेलंगाना का प्रियदर्शिनी जूराला (39.49 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश के माताटीला (40.58 प्रतिशत) और मौदाहा (0.00 प्रतिशत), उत्तराखंड का टिहरी (20.85 प्रतिशत) तथा पश्चिम बंगाल का कांगसबाती (31.50 प्रतिशत) शामिल हैं।

इसी तरह 31 जलाशय ऐसे हैं, जहां पानी का स्तर सामान्य भंडारण के 80 प्रतिशत या उससे कम रह गया है। इनमें से 13 जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य के 50 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच चुका है, जबकि 18 जलाशय 51 से 80 प्रतिशत के बीच हैं। इन 18 जलाशयों में 3 जलाशय 51 से 60 प्रतिशत, 7 जलाशय 61 से 70 प्रतिशत और 8 जलाशय 71 से 80 प्रतिशत के दायरे में हैं।

जलाशयों में बिगड़ती स्थिति आने वाले दिनों में पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ा सकता है।

हालांकि केंद्रीय जल आयोग का कहना है कि मौजूदा जल भंडारण पिछले वर्ष और 10 साल के औसत से अभी भी बेहतर है, लेकिन लगातार गिरता स्तर यह संकेत दे रहा है कि गर्मी बढ़ने और मानसून आने में देरी होने पर कई राज्यों में पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। मई के अंत तक हालात और कठिन हो सकते हैं, खासकर उन राज्यों में जहां जलाशय पहले ही आधे से नीचे पहुंच चुके हैं।  

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