किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना: छह राज्यों में जल समझौता, बांध की उपयोगिता पर एक्सपर्ट्स ने उठाए सवाल

राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है और इसकी लागत का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों के बीच बंटेगा
यह कहानी केवल एक नदी या क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह उन पहाड़ी परिवारों की चिंता है, जिनके घरों तक पानी किसी बड़े बांध या पाइपलाइन से नहीं, बल्कि पहाड़ के किसी छोटे झरने, नदी से पहुंचता है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
यह कहानी केवल एक नदी या क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह उन पहाड़ी परिवारों की चिंता है, जिनके घरों तक पानी किसी बड़े बांध या पाइपलाइन से नहीं, बल्कि पहाड़ के किसी छोटे झरने, नदी से पहुंचता है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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यमुना बेसिन की बहुप्रतीक्षित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर 15 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए। गृह मंत्रालय के अनुसार, यह मोदी सरकार के कार्यकाल में सुलझाया गया दसवां जल विवाद है। हालांकि पर्यावरणविद और जमीनी कार्यकर्ता इस बहुउद्देशीय परियोजना को भविष्य के लिए फायदे से ज्यादा बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं और इस बांध परियोजना के भूकंपीय जोखिम, विस्थापन के पुराने आंकड़ों और पर्यावरणीय अध्ययनों के सार्वजनिक न होने को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल भी उठाए हैं।

गृह मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, किशाऊ परियोजना की बुनियाद 12 मई 1994 के उस समझौते पर टिकी है, जिसमें तय हुआ था कि यमुना बेसिन में आने वाली हर भंडारण परियोजना के लिए अलग-अलग समझौता किया जाएगा। उसी ढांचे के तहत 16 जून 2026 को छह राज्यों के बीच सैद्धांतिक सहमति बनी थी, जिसे अब औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित किया गया है। इसको राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है और इसकी लागत का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत 1994 के समझौते के अनुसार भागीदार राज्यों के बीच बंटेगा।

 इसके अलावा एक अहम व्यवस्था यह हुई है कि हिमाचल प्रदेश के पानी के हिस्से को दिल्ली और राजस्थान को आवंटित किया जाएगा, और बदले में ये दोनों राज्य हिमाचल के हिस्से की बिजली घटक की लागत साझा करेंगे। परियोजना की अनुमानित लागत को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में15,000 करोड़ से 15,624 करोड़ तक के आंकड़े दिए गए हैं, लेकिन गृह मंत्रालय के किसी भी आधिकारिक बयान में लागत का सीधा उल्लेख नहीं है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा, जिसकी जल भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी। दावा किया जा रहा है कि इससे 97,000 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पन्न होगी। साथ ही यह भी दावा किया गया है कि दिल्ली को इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ मिलेगा और परियोजना के जरिए यमुना के हिस्से का 25 प्रतिशत पानी पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) के रूप में उपलब्ध हो सकेगा, जिससे यमुना की सफाई में मदद मिलेगी।

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (सैंड्रप) से जुड़े जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर ने इस परियोजना को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है, "यह बहुउद्देशीय परियोजना दरअसल घातक है, क्योंकि पूरा हिमालयी क्षेत्र अस्थिर और उच्च भूकंपीय जोन में आता है। वहां इतनी ऊंचाई का बांध बनाया जाएगा तो भविष्य में एक छोटे से भूकंपीय झटके से भी बड़ा नुकसान हो सकता है। नेपाल इसका जीता-जागता उदाहरण है। दूसरी तरफ, इतनी बड़ी संरचना बनाकर हम दरअसल जलवायु परिवर्तन से पहले से पैदा हो रहे खतरों और जोखिम को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं। यह बांध भविष्य में व्यापक पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकता है।"

ठक्कर ने सरकार के यमुना-सफाई और जल-आपूर्ति संबंधी दावों को भी भ्रामक बताया। उनके मुताबिक, "यह दावा कि इस बांध के जरिए यमुना नदी की सफाई हो जाएगी, भ्रामक है। यमुना की सफाई और उसके कायाकल्प के लिए एक अलग, समर्पित कार्यक्रम चाहिए, न कि नदी के ही पानी को रोककर उसमें मौजूद प्रदूषण को डाइल्यूट करने की कोशिश होनी चाहिए। यह समाधान नहीं है। यमुना का ही पानी रोककर यमुना की सफाई का दावा मुझे तार्किक नहीं लगता।"

वहीं, राज्यों की जल-आपूर्ति के बड़े जरिए के तौर पर इस परियोजना को पेश किए जाने पर भी उन्होंने असहमति जताई: "सभी संबंधित राज्य बरसाती पानी का संग्रहण करके अपनी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, और असल में उन्हें इसी पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।"

पर्यावरण शोध संस्था हिमधारा एनवायरनमेंट रिसर्च एंड एक्शन कलेक्टिव की रिपोर्ट सबमर्जिंग जौनसार-बावर :  द डैम ऑनस्लॉट कंटीन्यूज में शोधार्थी रहीं मानसी अशर ने बताया कि 2014 में किए गए फील्ड अध्ययन के अनुसार किशाऊ बांध का असर केवल डूब क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि टोंस नदी घाटी की खेती, पशुपालन, जंगल, मछली पालन और स्थानीय आजीविका पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। खासतौर से अदरक और टमाटर की खेती पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित डूब क्षेत्र में करीब 2,950 हेक्टेयर जमीन आएगी, जिसमें 512 हेक्टेयर कृषि भूमि और 2,438 हेक्टेयर वन क्षेत्र शामिल है। उस समय के अनुमान के मुताबिक 701 परिवारों के करीब 5,498 लोग प्रभावित होने की बात थी। अशर के अनुसार, क्षेत्र की सिंचित और उपजाऊ जमीन पर साल में तीन से चार फसलें ली जाती थीं, और जंगल तथा नदी स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि विस्थापन और प्रभावित परिवारों के उपलब्ध आंकड़े पुराने हैं और फील्ड स्तर पर पूरी तरह सत्यापित नहीं थे, इसलिए वास्तविक प्रभाव इससे कहीं अधिक हो सकता है।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि परियोजना की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए), फिजिबिलिटी रिपोर्ट और वास्तविक प्रभाव आकलन से जुड़ी रिपोर्टें अब तक ठीक से सामने नहीं आई हैं और इन्हें विस्तृत स्तर पर किए जाने की जरूरत है। उनका कहना है कि समझौता ज्ञापन तो हो गया है, लेकिन परियोजना के आकार लेने से पहले ये सभी अध्ययन सार्वजनिक होने चाहिए, तभी इस बहुउद्देशीय परियोजना की मूल हकीकत सामने आ पाएगी।

16 जून 2026 के मंत्रालयी बयान के अनुसार, राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए रखा जाना था। 15 सितंबर को हुए औपचारिक हस्ताक्षर को लेकर जारी बयान में यह नहीं बताया गया कि मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल चुकी है या नहीं। यानी छह राज्यों की सहमति और समझौता ज्ञापन एक राजनीतिक-वित्तीय मील का पत्थर जरूर है, लेकिन इसके बाद भी मंत्रिमंडल की स्वीकृति, वन भूमि हस्तांतरण, पर्यावरण मंजूरी और विस्तृत पुनर्वास योजना जैसे कदम अभी बाकी हैं। इनमें से किसी की भी समयसीमा फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है।

 नए दावों में अंतर

केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति यानी ईएसी की जनवरी 2026 की 47वीं बैठक के दस्तावेज में किशाऊ परियोजना की प्रस्तावित बिजली उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट बताई गई है। इसमें चार इकाइयां हैं और प्रत्येक की क्षमता 105.5 मेगावाट है। दस्तावेज में बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर और कुल डूब क्षेत्र 2,950 हेक्टेयर बताया गया है। 

वहीं, हिमाचल प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के 16 अगस्त 2018 के वेब पर उपलब्ध परियोजना विवरण के मुताबिक बिजली उत्पादन क्षमता 660 मेगावाट यानी 4×165 मेगावाट बताई गई थी। इतना ही नहीं, 15 जून 2022 की 29वीं ईएसी बैठक के एजेंडा में भी किशाऊ परियोजना को 660 मेगावाट (4×165 मेगावाट) और 97,076 हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र वाली परियोजना के रूप में दर्ज किया गया था। इस तरह 660 मेगावाट से 422 मेगावाट की क्षमता का अंतर बना हुआ है। 2022 में भी सरकारी ईएसी दस्तावेज में 660 मेगावाट दर्ज था, जबकि जनवरी 2026 के नए ईएसी दस्तावेज में क्षमता 422 मेगावाट हो गई है। नए दस्तावेज में इस बदलाव का विस्तृत कारण नहीं बताया गया है।

डूब क्षेत्र का कुल आंकडा हालांकि दोनों दस्तावेजी दौर में 2,950 हेक्टेयर बना हुआ है। जनवरी 2026 के ईएसी दस्तावेज में इसमें 512 हेक्टेयर खेती की जमीन, 250 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट, 439 हेक्टेयर सिविल फॉरेस्ट, 317 हेक्टेयर बंजर जमीन और नाले, 33 हेक्टेयर आबादी की जमीन तथा 1,399 हेक्टेयर अन्य जमीन, जिसमें नदी तल भी शामिल है, बताया गया है। वहीं, 2018 में प्रकाशित हिमधारा एनवायरनमेंट रिसर्च एंड एक्शन कलेक्टिव की रिपोर्ट, जो यूजेवीएनएल से आरटीआई के जरिए मिली जानकारी और 1997 में तकनीकी सलाहकार समिति को दिए गए आंकड़ों पर आधारित थी, उस दस्तावेज में 2,950 हेक्टेयर डूब क्षेत्र में 512 हेक्टेयर खेती की निजी जमीन और 2,438 हेक्टेयर वन भूमि की बात कही गई थी। इसी रिपोर्ट में 5,498 लोगों और 701 परिवारों के प्रभावित होने का आंकड़ा भी दिया गया था। 

हालांकि हिमधारा की रिपोर्ट के मुताबिक 2,438 हेक्टेयर का पूरा वन क्षेत्र एक ही श्रेणी का नहीं था। उसी रिपोर्ट की तालिका में 689 हेक्टेयर सामुदायिक और निजी स्वामित्व वाले वन तथा 1,749 हेक्टेयर राज्य सरकार के वन दर्ज हैं। दोनों को मिलाकर 2,438 हेक्टेयर वन भूमि बनती है। 

इसके विपरीत 2026 के ईएसी दस्तावेज में रिजर्व और सिविल फॉरेस्ट की दो श्रेणियां मिलाकर 689 हेक्टेयर वन भूमि दर्ज है। दस्तावेज में 250 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट और 439 हेक्टेयर सिविल फॉरेस्ट बताया गया है।

मौजूदा रिकॉर्ड इतना जरूर दिखाते हैं कि 1997 के पुराने आंकड़ों और 2026 के ईएसी दस्तावेज में जमीन के वर्गीकरण में बडा अंतर आया है। खास तौर पर पुराने दस्तावेज में दर्ज 1,749 हेक्टेयर राज्य सरकार के वन को नए दस्तावेज में किस श्रेणी में रखा गया है, यह स्पष्ट होना बाकी है। यह इस परियोजना की पर्यावरणीय समीक्षा के दौरान महत्वपूर्ण सवाल है।

पानी के आंकड़ों में भी दस्तावेजों के बीच अंतर है। जनवरी 2026 के ईएसी दस्तावेज में किशाऊ जलाशय से 1,324 मिलियन घन मीटर पानी का लाभ बताया गया है। इसमें हरियाणा को 633, उत्तर प्रदेश को 411, राजस्थान को 124, दिल्ली को 80, हिमाचल प्रदेश को 42 और उत्तराखंड को 34 मिलियन घन मीटर पानी का हिस्सा बताया गया है। 

वहीं 15 सितंबर 2026 के केंद्र सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार परियोजना में 1,562 मिलियन घन मीटर जल भंडारण क्षमता, 97,000 हेक्टेयर सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का प्रावधान बताया गया है। बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर बताई गई है। 

अशर कहती हैं कि इस परियोजना की चर्चा 1940 से ही चल रही है और एमओयू होने का मतलब यह नहीं है कि यह अब भी धरातल पर उतर जाएगी क्योंकि असली चुनौतियां जहां बांध बनाया जाना है वहां है। साथ ही अभी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट्स भी नहीं हैं जिससे इसकी उपयोगिता का वास्तविक पता चल पाए।

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