हिमालय में आपदा से पहले चेतावनी देने वाली मोबाइल ऐप बनाई

दावा किया गया है कि ‘आपदा सहायक’ ऐप हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़ व भूस्खलन जैसी आपदाओं की अग्रिम चेतावनी देकर स्थानीय समुदायों को समय पर जानकारी प्रदान करेगी
हिमालय में आपदा से पहले चेतावनी देने वाली मोबाइल ऐप बनाई
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सारांश
  • भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए विकसित ‘आपदा सहायक’ एंड्रॉइड ऐप बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाओं की अग्रिम चेतावनी देकर स्थानीय समुदायों को तैयार रहने में मदद करेगा

  • दिल्ली विश्वविद्यालय सहित भारतीय और ब्रिटिश संस्थानों के सहयोग से बनी यह द्विभाषी, निःशुल्क ऐप सीमित इंटरनेट वाले पर्वतीय इलाकों में भी काम करने के लिए डिजाइन की गई है और पायलट परीक्षण कुल्लू में सफल रहा है।

  • हिफ्लो-ऐप शोध परियोजना के तहत विकसित ‘आपदा सहायक’ मोबाइल ऐप हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम घटाने के लिए एक साझा डिजिटल मंच प्रदान करती है।

  • यह इंटरैक्टिव मानचित्र, आपात संपर्क, स्थानीय सरकारी निर्देशिका और समुदाय से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर जोखिम आकलन में मदद करती है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए 'आपदा सहायक' नाम का एक नया मोबाइल ऐप बनाई गई है। दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस द्विभाषी (हिंदी और अंग्रेजी) एंड्रॉइड ऐप के शुभारंभ की घोषणा की है। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को आपदा के प्रति पहले से तैयार करना, समय पर सूचना उपलब्ध कराना और राहत एवं पुनर्वास कार्यों को अधिक प्रभावी बनाना है।

यह ऐप हिफ्लो-ऐप शोध परियोजना के तहत विकसित किया गया है। परियोजना को ब्रिटिश काउंसिल इंडिया का वित्तीय सहयोग प्राप्त है। इसका नेतृत्व ब्रिटेन के कंबरिया विश्वविद्यालय और ग्लॉस्टरशायर विश्वविद्यालय कर रहे हैं। इस परियोजना में दिल्ली विश्वविद्यालय, गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कैरिटास इंडिया, क्लाइमेट बी वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड और आईयूसीएन पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन आयोग भी साझेदार हैं।

वहीं, एप के मुख्य अन्वेषक कंबरिया विवि के प्रो रिचर्ड जॉनसन हैं। डीयू से एप के संचालन का नेतृत्व प्रो. बी.डब्ल्यू. पांडेय ने किया जो हिमालय अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के मुख्य निदेशक है।

फिलहाल इस ऐप का पायलट परीक्षण हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में किया गया है। शोधार्थी राम मनोहर के अनुसार परीक्षण के दौरान ऐप ने संभावित आपदा के संकेत लगभग एक घंटे पहले देना शुरू कर दिया था और अंतिम पांच मिनट तक लगातार स्थिति की जानकारी उपलब्ध कराई गई।

आपदा सहायक ऐप के माध्यम से उपयोगकर्ता किसी भी खतरे या आपदा की घटना की रिपोर्ट कर सकते हैं। इसमें इंटरैक्टिव मानचित्र पर खतरे वाले क्षेत्रों की जानकारी देखने, आपातकालीन संपर्क नंबर और सहायता सेवाओं तक पहुंचने, स्थानीय सरकारी कार्यालयों की निर्देशिका देखने तथा आपदा-पूर्व तैयारी से जुड़ी जानकारी प्राप्त करने की सुविधा दी गई है। ऐप स्थानीय समुदायों से मिलने वाली सूचनाओं को भी एकत्र करता है, जिससे भविष्य में जोखिम आकलन और योजना बनाने में मदद मिल सके।

यह ऐप लगभग एक दशक से चल रहे शोध कार्य का परिणाम है। इससे पहले परियोजना के तहत हिफ्लो-डैट नामक बाढ़ डेटाबेस तैयार किया गया था। इस अध्ययन में कुल्लू जिले में वर्ष 1846 से 2020 के बीच 175 वर्षों में 59 स्थानों पर 128 बाढ़ घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया गया। इसी शोध के आधार पर आगे हिफ्लो-पैट और अब हिफ्लो-ऐप विकसित किया गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिमालयी अध्ययन केंद्र के निदेशक और भूगोल विभाग के प्रोफेसर बिंध्य वासिनी पांडेय का कहना है कि स्थानीय स्तर पर आंकड़ों का संग्रह और उनका उपयोग हिमालयी क्षेत्रों को अधिक आपदा-प्रतिरोधी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार यह ऐप संयुक्त राष्ट्र के सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (2015-2030) तथा भारत की राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 की भावना के अनुरूप विकसित किया गया है।

परियोजना के प्रमुख अन्वेषक डॉ. रिचर्ड जॉनसन के अनुसार यह ऐप स्थानीय नागरिकों, प्रशासन और शोधकर्ताओं को एक साझा डिजिटल मंच उपलब्ध कराएगा, जिससे जोखिम कम करने और आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया देने में सहायता मिलेगी।

आपदा सहायक ऐप पूरी तरह निःशुल्क है और हिंदी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है। इसे विशेष रूप से ऐसे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है, जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी सीमित रहती है। ऐप को परियोजना की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

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