

वैज्ञानिकों ने लोहे और निकेल के ऑक्साइड से सस्ते उत्प्रेरक विकसित किए, जो ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को किफायती बना सकते हैं।
एमक्सइन की सतह पर कार्बन नैनोफाइबर उगाकर तैयार की गई नई तकनीक ने पानी से हाइड्रोजन बनाने की उम्मीद जगाई।
हाइड्रोजन उत्पादन के परीक्षण में निकेल आधारित उत्प्रेरक ने बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि लोहे वाले ने इलेक्ट्रोलाइजर में बाजी मारी।
महंगे प्लेटिनम और रूथेनियम का विकल्प तलाशने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली, हालांकि नए उत्प्रेरकों में सुधार की गुंजाइश अभी बाकी है।
नई तकनीक से स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन की लागत घटाने की उम्मीद, लेकिन औद्योगिक इस्तेमाल से पहले लंबे दौर के परीक्षण जरूरी हैं।
पानी से बिजली की मदद से हाइड्रोजन बनाना सुनने में जितना आसान लगता है, इसे बड़े पैमाने पर करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले महंगे उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट)। अभी बेहतर प्रदर्शन करने वाले कई उत्प्रेरकों में प्लेटिनम, रूथेनियम और इरिडियम जैसी दुर्लभ और महंगी धातुओं का इस्तेमाल होता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक नया रास्ता खोजने की कोशिश की है। उन्होंने लोहे और निकेल के ऑक्साइड से ऐसे उत्प्रेरक तैयार किए हैं, जो पानी से हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया में काम आ सकते हैं।
इस शोध के नतीजे प्रतिष्ठित शोध पत्रिका एसीएस एप्लाइड नैनो मैटेरियल्स में प्रकाशित हुए हैं। इसमें वैज्ञानिकों ने कार्बन नैनोफाइबर और एमक्सइन नाम के खास पदार्थ की मदद से दो नए उत्प्रेरक विकसित किए हैं।
हाइड्रोजन उत्पादन में छिपी है बड़ी चुनौती
आज दुनिया में बनने वाली लगभग 96 प्रतिशत हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन, यानी कोयले और प्राकृतिक गैस से तैयार होती है। इस प्रक्रिया में काफी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। एक किलोग्राम ग्रे हाइड्रोजन बनाने में करीब 10 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। ब्लू हाइड्रोजन में यह मात्रा करीब छह किलोग्राम रहती है।
इसके मुकाबले ग्रीन हाइड्रोजन पानी को बिजली की मदद से तोड़कर बनाई जाती है। यदि इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल हो, तो उत्पादन के दौरान कार्बन उत्सर्जन बहुत कम किया जा सकता है। यही वजह है कि भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था में ग्रीन हाइड्रोजन को बेहद अहम माना जा रहा है।
लेकिन पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बांटने के लिए बिजली के साथ अच्छे उत्प्रेरकों की जरूरत होती है। इस प्रक्रिया में एक तरफ हाइड्रोजन बनती है और दूसरी तरफ ऑक्सीजन निकलती है। दोनों प्रतिक्रियाओं को तेज और प्रभावी बनाने के लिए उत्प्रेरक जरूरी हैं।
एमक्सइन की चादरों पर उगाए कार्बन के रेशे
वैज्ञानिकों ने इस चुनौती से निपटने के लिए टाइटेनियम आधारित एमक्सइन (टीआई3सी2टीएक्स) को आधार बनाया। यह दो-आयामी पदार्थ है और बिजली का अच्छा सुचालक है। हालांकि इसकी चादरें समय के साथ ऑक्सीकृत हो सकती हैं और एक-दूसरे के ऊपर चिपककर जमने लगती हैं। इससे बिजली के प्रवाह में रुकावट आती है।
इस समस्या को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने एमक्सइन की चादरों पर सीधे कार्बन नैनोफाइबर उगाए। इसके लिए लोहे या निकेल के अग्रदूत पदार्थ को एमक्सइन के साथ मिलाकर पहले 400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया गया। इसके बाद तापमान बढ़ाकर 720 डिग्री सेल्सियस किया गया और एसिटिलीन गैस की मदद से दो घंटे तक रासायनिक वाष्प जमाव (सीवीडी प्रक्रिया अपनाई गई।
इस दौरान कार्बन के बेहद महीन रेशे एमक्सइन की सतह पर विकसित हुए। हर रेशे के सिरे पर लोहे या निकेल के ऑक्साइड का एक छोटा कण मौजूद था। इस तरह दो नए पदार्थ तैयार हुए, जिन्हें एफईओ-सीएनएफ ऐट एमएक्स और एनआईओ-सीएनएफ ऐटएमएक्स नाम दिया गया।
निकेल ने हाइड्रोजन बनाने में दिखाई बेहतर क्षमता
वैज्ञानिकों ने दोनों उत्प्रेरकों की जांच पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के घोल में की। हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया में निकेल आधारित उत्प्रेरक को 10 मिलीएम्पियर प्रति वर्ग सेंटीमीटर का करंट हासिल करने के लिए 490 मिलीवोल्ट अतिरिक्त वोल्टेज की जरूरत पड़ी। वहीं लोहे आधारित उत्प्रेरक के लिए यह जरूरत 520 मिलीवोल्ट रही।
ऑक्सीजन उत्पादन में भी निकेल आधारित उत्प्रेरक ने बेहतर प्रदर्शन किया। इसे 300 मिलीवोल्ट अतिरिक्त वोल्टेज की जरूरत पड़ी, जबकि लोहे आधारित उत्प्रेरक के लिए 360 मिलीवोल्ट की जरूरत थी। तुलना करें तो रूथेनियम ऑक्साइड को इसी प्रक्रिया में 250 मिलीवोल्ट की जरूरत पड़ी।
पूरी मशीन में लोहे ने मारी बाजी
दिलचस्प बात यह रही कि जब वैज्ञानिकों ने दोनों उत्प्रेरकों को एक छोटी इलेक्ट्रोलाइजर मशीन में दोनों इलेक्ट्रोड पर इस्तेमाल किया, तो नतीजे बदल गए। लोहे आधारित उत्प्रेरक ने 10 मिलीएम्पियर प्रति वर्ग सेंटीमीटर करंट हासिल करने के लिए 2.2 वोल्ट पर काम किया, जबकि निकेल आधारित उत्प्रेरक को 2.7 वोल्ट की जरूरत पड़ी।
हालांकि 24 घंटे के परीक्षण में निकेल आधारित उत्प्रेरक ने वोल्टेज के मामले में थोड़ी बेहतर स्थिरता दिखाई। इससे पता चलता है कि लोहे का उत्प्रेरक शुरुआती प्रदर्शन में बेहतर हो सकता है, जबकि निकेल वाला लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्थिर रह सकता है।
अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी
यह शोध सस्ती धातुओं से बेहतर उत्प्रेरक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे महंगी और दुर्लभ धातुओं पर निर्भरता कम करने की संभावना बनती है। हालांकि इन उत्प्रेरकों का प्रदर्शन अभी प्लेटिनम जितना अच्छा नहीं है। साथ ही, इनकी लंबी अवधि की स्थिरता और बड़े औद्योगिक संयंत्रों में उपयोग की क्षमता की जांच भी जरूरी है।
फिर भी इस शोध की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि सही तरीके से तैयार की गई सामग्री की बनावट साधारण धातु ऑक्साइड को भी उपयोगी उत्प्रेरक बना सकती है। अगर आगे के परीक्षण सफल रहे, तो भविष्य में स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन को सस्ता और अधिक व्यावहारिक बनाने में यह तकनीक अहम भूमिका निभा सकती है।