बायो-फार्मा उद्योग के जहरीले कचरे से बनेगा साफ जल और बायो-गैस, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी क्रांतिकारी तकनीक

बिट्स पिलानी के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो बायो-फार्मा उद्योग के खतरनाक कचरे को बिना रसायनों के सुरक्षित बनाकर उसे दोबारा उपयोग योग्य जल और बायो-गैस में बदल सकती है।
पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक है उद्योगों से निकलने वाला यह गन्दा पानी; प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक है उद्योगों से निकलने वाला यह गन्दा पानी; प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • बायो-फार्मा उद्योग से निकलने वाला खतरनाक जहरीला पानी अब केवल पर्यावरण के लिए खतरा नहीं, बल्कि स्वच्छ जल और ऊर्जा का स्रोत भी बन सकता है।

  • बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तीन-चरणीय तकनीक विकसित की है, जो बिना रसायनों और अत्यधिक भाप के उपयोग के इस खतरनाक अपशिष्ट जल को सुरक्षित बनाकर दोबारा उपयोग योग्य पानी और मीथेन युक्त बायो-गैस में बदल सकती है।

  • यह प्रणाली पल्स्ड इलेक्ट्रिक फील्ड तकनीक से 99.9999 प्रतिशत तक बैक्टीरिया को निष्क्रिय करती है, इसके बाद जैविक उपचार और मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन से पानी को साफ किया जाता है, जबकि बची हुई कीचड़ से पेटेंट प्राप्त iSTAR® रिएक्टर के जरिए बायो-गैस तैयार होती है।

  • इससे उपचार संयंत्र की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी पूरा किया जा सकता है।

  • प्रयोगशाला स्तर पर सफल साबित हो चुकी इस तकनीक को अब हैदराबाद की वैक्सीन निर्माता कंपनी बायोलॉजिकल ई लिमिटेड के साथ औद्योगिक स्तर पर लागू करने की तैयारी चल रही है।

  • यह नवाचार न केवल प्रदूषण और ऊर्जा लागत घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि 'कचरे से संसाधन' और जल संरक्षण आधारित सतत औद्योगिक विकास का भी नया मॉडल प्रस्तुत करता है।

बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स) पिलानी से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो बायोफार्मा (जैविक दवा) उद्योग से निकलने वाले बेहद जटिल और खतरनाक गंदे पानी (वेस्टवाटर) को साफ करने में मददगार साबित होगी।

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह तकनीक न केवल गंदे पानी को फिर से इस्तेमाल योग्य बनाती है, बल्कि साथ ही इससे बायोगैस जैसी स्वच्छ ऊर्जा भी प्राप्त की जा सकती है।

गौरतलब है कि बायोफार्मास्युटिकल फर्मेंटेशन से निकलने वाला गन्दा पानी औद्योगिक अपशिष्टों में सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है।

क्यों चुनौतीपूर्ण है बायो-फार्मा के गंदे पानी का इलाज?

इस पानी में लाखों जीवित सूक्ष्मजीव, एंटीबायोटिक दवाओं के अवशेष और एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन मौजूद होते हैं। जैव सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को देखते हुए इन्हें नष्ट करने के लिए फिलहाल कंपनियों को भाप आधारित ऑटोक्लेव प्रणाली और रसायनों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिसमें बहुत अधिक बिजली और पैसा खर्च होता है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, हैदराबाद से जुड़े शोधकर्ताओं ने यह तीन-चरणीय एकीकृत प्रणाली विकसित की है, जो बिजली की मदद से दूषित जल को कीटाणुरहित करती है, जैविक उपचार करती है और साथ ही ऊर्जा भी दोबारा प्राप्त (एनर्जी रिकवरी) करती है।

नई तकनीक कैसे करती है कमाल?

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह प्रणाली तीन चरणों में काम करती है। इसके पहले चरण में पल्स्ड इलेक्ट्रिक फील्ड (पीईएफ) तकनीक का उपयोग किया जाता है। इस दौरान बिजली के हाई-वोल्टेज लेकिन छोटे झटके देकर बैक्टीरिया की कोशिकाओं को स्थाई रूप से नष्ट कर दिया जाता है।

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इस प्रक्रिया में न तो रसायनों और न ही गर्मी पानी की जरुरत होती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया है कि यह तकनीक बायोफार्मा उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट जल में मौजूद 99.9999 फीसदी तक बैक्टीरिया को नष्ट कर देती है। यह क्षमता पारंपरिक ऑटोक्लेव तकनीक जैसी है, लेकिन इसमें ऊर्जा की खपत काफी कम होती है।

वहीं दूसरे चरण में दूषित पानी को 'सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर' में भेजा जाता है, जहां प्राकृतिक सूक्ष्मजीव 90 फीसदी से अधिक कार्बनिक कचरे को साफ कर देते हैं। इसके बाद मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन से पानी की गुणवत्ता करीब-करीब दोबारा उपयोग योग्य हो जाती है।

इसके बाद आखिरी चरण में बचे हुए कीचड़ (स्लज) को पेटेंट प्राप्त इंटेलिजेंटली स्टर्ड थर्मोफिलिक एनेरोबिक रिएक्टर ‘iSTAR®’ में भेजा जाता है। इस तकनीक के जरिए मीथेन से भरपूर बायो-गैस तैयार होती है, जिसका उपयोग ट्रीटमेंट प्लांट की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने में किया जा सकता है।

गंदे पानी से मिलेगी स्वच्छ ऊर्जा और साफ जल

वहीं शुद्ध किया पानी दोबारा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हो जाता है। इससे उद्योग जीरो लिक्विड डिस्चार्ज और पानी के बेहतर और पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

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शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफल परीक्षण कर लिया है। अब वे हैदराबाद स्थित भारत की प्रमुख वैक्सीन निर्माता कंपनी बायोलॉजिकल ई लिमिटेड के साथ मिलकर इसे औद्योगिक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

इस तकनीक से जुड़े अध्ययन का नेतृत्व बिट्स पिलानी के जैव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शंकर गणेश पलानी ने किया है, जिसमें प्रोफेसर मिथुन मंडल और रिसर्च स्कॉलर रविंद्र ज्ञानाबा कुलाल ने भी सहयोग दिया है। प्रेस को साझा जानकारी से पता चला है कि शोधकर्ताओं ने 'वोल्टेज-असिस्टेड इनएक्टिवेशन ऑफ बैक्टीरिया इन वेस्टवाटर (VAIBaW) नाम से इस तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट भी फाइल किया है।

पेटेंट से उद्योग तक का सफर

इस तकनीक की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर शंकर गणेश पलानी ने प्रेस को बताया कि, “वर्तमान में बायोफार्मा उद्योग के गंदे पानी को सुरक्षित बनाने के लिए बड़ी मात्रा में रसायनों और भाप का उपयोग किया जाता है, जिससे ऊर्जा की खपत और लागत दोनों बढ़ जाती हैं।“

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“वहीं दूसरी ओर इस नई तकनीक में बिजली के झटकों (इलेक्ट्रिक पल्स) की मदद से इस जहरीले पानी को पूरी तरह सुरक्षित और कीटाणुरहित बनाया जाता है। इससे न केवल पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम क्या जा सकता है, साथ ही उद्योगों को फिर से इस्तेमाल करने लायक साफ पानी और बायो-गैस के रूप में स्वच्छ ऊर्जा भी मिल सकती है।“

देखा जाए तो यह अध्ययन इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक नवाचार केवल प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कचरे को संसाधन में बदलने वाली ऐसी तकनीकों का मार्ग भी प्रशस्त कर रहे हैं, जो पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन स्थापित कर सकती हैं।

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