भारतीय वैज्ञानिकों ने एआई से 100 साल पुराने रिकॉर्ड का विश्लेषण कर सूर्य में बदलाव का लगाया पता

इस अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि पिछले 100 वर्षों में सूर्य की गतिविधियों में क्या बदलाव आए हैं। इससे भविष्य में अंतरिक्ष मौसम की बेहतर भविष्यवाणी भी की जा सकेगी।
एआई ने कोडईकनाल वेधशाला के 100 वर्ष पुराने सूर्य चित्रों को डिजिटल डेटा में बदलकर सौर गतिविधियों का अध्ययन आसान बनाया।
एआई ने कोडईकनाल वेधशाला के 100 वर्ष पुराने सूर्य चित्रों को डिजिटल डेटा में बदलकर सौर गतिविधियों का अध्ययन आसान बनाया।फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स, मार्कस334
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सारांश
  • एआई ने कोडईकनाल वेधशाला के 100 वर्ष पुराने सूर्य चित्रों को डिजिटल डेटा में बदलकर सौर गतिविधियों का अध्ययन आसान बनाया।

  • शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग से सूर्य के प्लेग्स पहचानकर 1916 से 2007 तक सौर चक्रों का विस्तृत विश्लेषण किया।

  • पुराने हाथ से बने सूर्य रिकॉर्ड अब आधुनिक एआई तकनीक से वैज्ञानिक रूप से सटीक और उपयोगी साबित हो रहे हैं।

  • अध्ययन से “बटरफ्लाई डायग्राम” तैयार हुआ, जिसमें सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का समय और स्थान आधारित पैटर्न दिखा।

  • एआई आधारित शोध से अंतरिक्ष मौसम समझने और भविष्य की सौर गतिविधियों की बेहतर भविष्यवाणी में मदद मिलेगी।

भारत के तमिलनाडु स्थित कोडईकनाल सोलर ऑब्जर्वेटरी (केओएसओ) में पिछले 100 से अधिक वर्षों से सूर्य की गतिविधियों का बहुत अनोखा रिकॉर्ड रखा गया है। यहां वैज्ञानिकों ने 1904 से लेकर 2022 तक रोजाना सूर्य के हाथ से बनाए गए चित्र (संचार्ट या सन्चार्ट) सुरक्षित रखे हैं। इन चित्रों में सूर्य पर दिखने वाले धब्बे, चमकीले क्षेत्र (प्लेग), और अन्य गतिविधियों को सावधानी से दर्शाया गया है।

ये रिकॉर्ड उस समय बनाए गए थे जब डिजिटल कैमरा या आधुनिक उपकरण नहीं थे। इसलिए वैज्ञानिक हाथ से ही सूर्य को देखकर चित्र बनाते थे। यही कारण है कि ये पुराने रिकॉर्ड आज वैज्ञानिकों के लिए बहुत मूल्यवान बन गए हैं।

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एआई ने कोडईकनाल वेधशाला के 100 वर्ष पुराने सूर्य चित्रों को डिजिटल डेटा में बदलकर सौर गतिविधियों का अध्ययन आसान बनाया।

पुरानी जानकारी को समझने की चुनौती

हालांकि ये ऐतिहासिक रिकॉर्ड बहुत उपयोगी हैं, लेकिन इन्हें समझना आसान नहीं है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग वैज्ञानिकों ने चित्र बनाए, जिससे शैली में अंतर आ गया। कई कागज़ पुराने होने के कारण खराब भी हो चुके हैं। स्कैनिंग की गुणवत्ता भी हर बार समान नहीं रही।

इन कारणों से इन चित्रों से एक समान और साफ वैज्ञानिक डेटा निकालना मुश्किल था। इसी समस्या को हल करने के लिए आधुनिक तकनीक की जरूरत पड़ी।

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग

इस नई स्टडी में शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग तकनीक का उपयोग किया। यह शोध आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईईएस) के शोधकर्ताओं की अगुवाई में किया गया। इसमें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईआईएसटी) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए)के वैज्ञानिक भी शामिल थे।

शोध में एक खास मशीन लर्निंग मॉडल जिसे यू-नेट कहा जाता है, का उपयोग किया गया। इस मॉडल ने दो मुख्य काम किए। पहला, इसने हर चित्र में सूर्य की सही स्थिति, आकार और झुकाव को पहचाना। इससे सभी चित्र एक समान ढांचे में आ गए।

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दूसरा काम था सूर्य पर मौजूद प्लेग (चुंबकीय रूप से सक्रिय पैच) को पहचानना और उन्हें अलग करना। ये प्लेग सूर्य की चुंबकीय गतिविधि को समझने में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

सूर्य की गतिविधियों का “बटरफ्लाई डायग्राम”

जब एआई ने सभी पुराने चित्रों को आंकड़ों में बदला, तो वैज्ञानिकों ने लगभग 1916 से 2007 तक के नौ सौर चक्रों का अध्ययन किया। इसके आधार पर एक “बटरफ्लाई डायग्राम” तैयार किया गया। यह डायग्राम दिखाता है कि सूर्य की गतिविधियाँ समय के साथ कैसे ऊपर-नीचे होती हैं और सूर्य की सतह पर उनकी स्थिति कैसे बदलती है। यह पैटर्न सूर्य के 11 साल के चक्र को समझने में मदद करता है।

अध्ययन से “बटरफ्लाई डायग्राम” तैयार हुआ, जिसमें सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का समय और स्थान आधारित पैटर्न दिखा।
अध्ययन से “बटरफ्लाई डायग्राम” तैयार हुआ, जिसमें सूर्य की चुंबकीय गतिविधियों का समय और स्थान आधारित पैटर्न दिखा।साभार: द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल

परिणाम और वैज्ञानिक महत्व

शोध में यह भी पाया गया कि एआई से निकाले गए आंकड़ों की तुलना कोडईकनाल की आधुनिक सीए सेकंड के फुल-डिस्क ऑब्जर्वेशन से अच्छी तरह मेल खाती है। इसका मतलब है कि पुराने हाथ से बने चित्र भी वैज्ञानिक रूप से बहुत भरोसेमंद साबित हो सकते हैं, अगर उन्हें सही तरीके से प्रोसेस किया जाए।

यह खोज बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि सूर्य की गतिविधियां सीधे पृथ्वी को प्रभावित करती हैं। इससे सैटेलाइट, संचार प्रणाली, जीपीएस और बिजली ग्रिड तक प्रभावित हो सकते हैं।

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भविष्य के लिए महत्व

इस अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि पिछले 100 वर्षों में सूर्य की गतिविधियों में क्या बदलाव आए हैं। इससे भविष्य में अंतरिक्ष मौसम की बेहतर भविष्यवाणी भी की जा सकेगी।

यह शोध यह भी दिखाता है कि पुराने और खराब हालत वाले वैज्ञानिक रिकॉर्ड भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से नए और उपयोगी आंकड़ों में बदले जा सकते हैं। यह विज्ञान और तकनीक के मेल का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिससे भविष्य में कई और ऐतिहासिक डाटा सेट को भी फिर से जीवित किया जा सकता है।

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