कोसी बाढ़ पीड़ितों का धरना, फोटो : महेंद्र यादव
कोसी बाढ़ पीड़ितों का धरना, फोटो : महेंद्र यादव

कोसी की बाढ़ का स्थायी समाधान कब? हाई डैम और कोसी-मेची परियोजना के बीच उठते सवाल

कोसी में हाई डैम की चर्चा, कोसी मेची नदी जोड़ के शुरू कार्यों के बीच लोगों की वैकल्पिक समाधान की मांग
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इन दिनों कोसी नदी की बाढ़ और उसके स्थायी समाधान को लेकर चर्चा तेज है। विगत 19 अगस्त को राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सुपौल जिले के बलवा बाजार स्थित दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के पैतृक गांव में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया। इसके बाद उन्होंने सीधे कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना के प्रथम चरण में चैनपुर में चल रहे कार्यों का स्थल निरीक्षण किया और परियोजना की समीक्षा की।

राजधानी लौटने के बाद मुख्यमंत्री 21 अगस्त को दिल्ली गए, जहां उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की। समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना के पहले चरण के लिए राशि आवंटित करने तथा दूसरे चरण की तकनीकी मंजूरी देने की मांग की। साथ ही कोसी पर हाई डैम के निर्माण का मुद्दा भी उठाया। इसके बाद वित्त मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि हाई डैम परियोजना के काम में तेजी लाई जाए और डीपीआर का निर्माण कार्य जल्द पूरा किया जाए।

कोसी तटबंध के भीतर के बाढ़ पीड़ितों का धरना

इधर, 20 अगस्त को सुपौल जिला पदाधिकारी के समक्ष कोसी नव निर्माण मंच के बैनर तले कोसी तटबंध के भीतर रहने वाले करीब दो सौ बाढ़ एवं कटाव पीड़ितों ने धरना दिया। धरना के बाद संगठन की ओर से 10 सूत्रीय मांग पत्र डीएम को सौंपा गया और वार्ता भी हुई।

संगठन का कहना है कि कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना से कोसी की बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं होगा। इसलिए वैकल्पिक समाधान पर भी काम किया जाना चाहिए। संगठन ने मांग की है कि कोसी की 14 पुरानी छाड़न धाराओं को पुनर्जीवित कर उनमें नियंत्रित तरीके से पानी डायवर्ट किया जाए। इससे कोसी की बाढ़ की समस्या का काफी हद तक समाधान हो सकता है। संगठन का यह भी कहना है कि कोसी समस्या का समाधान लोक भागीदारी और विज्ञानसम्मत तरीके से किया जाना चाहिए।

धरना के दौरान इस मुद्दे पर कोसी तटबंध के भीतर स्थित खोखनहा गांव के एक बुजुर्ग वक्ता ने अपने देशी अंदाज में कहा कि जिस तरह गांव में आने वाला जादूगर प्लेट में मिठाई बनाता है और लोग अचरज से उसे देखते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद वही मिठाई आंखों के सामने गायब हो जाती है, उसी तरह कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना भी है।

एक अन्य वक्ता ने कहा कि सरकार इतनी राशि खर्च कर जिस समाधान की बात कर रही है, वह नदी से पांच बाल्टी पानी निकालने जैसा है। इसके बावजूद लोगों को हर साल कोसी की बाढ़ झेलने के लिए विवश होना पड़ेगा। इसलिए व्यवहारिक समाधान पर विचार होना चाहिए और कोसी के पानी को पुराने धारों में भी नियंत्रित तरीके से छोड़ा जाना चाहिए।

पुनर्वास और बुनियादी सुविधाओं की भी मांग

धरना में शामिल लोगों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि कोसी की बाढ़ और कटाव में जिन लोगों के घर नदी की धारा में समा रहे हैं और जिनके पास तटबंध के बाहर बसने के लिए जमीन या पुनर्वास की व्यवस्था नहीं है, उन्हें सरकारी जमीन अथवा पुनर्वास स्थल पर बसाया जाना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों के बीच हिमालय पर पड़ने वाले प्रभावों का असर कोसी तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों पर भी पड़ने की आशंका है। इसलिए तटबंध के भीतर रह रहे लोगों का सर्वे कराया जाना चाहिए।

जिन लोगों के पास अब तक पुनर्वास की व्यवस्था नहीं है, जिनके पुनर्वास की जमीन पर दूसरे लोगों ने कब्जा कर लिया है और कब्जा हटाना उनके लिए संभव नहीं है, उन्हें पुनर्वास उपलब्ध कराया जाए। इसी तरह जिनके घर कटने के बाद तटबंध, स्पर या अन्य स्थानों पर अस्थायी रूप से बसे हुए हैं, उन्हें भी पुनर्वासित किया जाए।

जिन पुनर्वास स्थलों पर घर तो हैं, लेकिन परिवार की जनसंख्या बढ़ जाने के कारण वहां रहने की पर्याप्त क्षमता नहीं रह गई है, ऐसे परिवारों के लिए भी पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए।

जब तक स्थायी पुनर्वास नहीं होता, तब तक तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, नावों की व्यवस्था और ऊंचे टीले जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

कोसी तटबंध के भीतर के लोगों के लिए गठित कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार को फिर से सक्रिय और प्रभावकारी बनाने की मांग भी की गई है। खेतों को लगान से मुक्त करने तथा लगान माफी के बावजूद वसूली जाने वाली राशि पर रोक लगाने और वसूली गई राशि को ब्याज सहित वापस करने की मांग भी उठाई गई।

धरना में शामिल लोगों की मांगें गंभीर हैं। मुख्यमंत्री कोसी से जुड़ी परियोजनाओं में रुचि दिखा रहे हैं तो उन्हें कोसी तटबंध के भीतर रहने वाले पीड़ितों की बातें भी गंभीरता से सुननी चाहिए।

आखिर कितना कोसी का पानी कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना में जाएगा?

नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी की वेबसाइट पर उपलब्ध कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना के संशोधित डीपीआर में उल्लेख है कि कोसी मुख्य नहर के 0.0 आरडी पर पुरानी नहर की क्षमता 15,000 क्यूसेक थी, जिसे रीमॉडलिंग के बाद 20,247 क्यूसेक किया जाएगा। यानी 5,247 क्यूसेक अतिरिक्त पानी का डिस्चार्ज होगा।

कोसी नदी पर स्थित भीमनगर बैराज की क्षमता 9,50,000 क्यूसेक बताई गई है। इस आधार पर देखा जाए तो कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना के जरिए लगभग 0.55 प्रतिशत पानी डायवर्ट होगा।

यदि हाल में आई बाढ़ के आंकड़ों के आधार पर भी देखें तो 28-29 सितंबर 2024 को कोसी में आई बाढ़ के दौरान बैराज से कोसी नदी का पानी लगभग 6,81,000 क्यूसेक डिस्चार्ज हुआ था। उसके अनुपात में देखें तो उस बाढ़ के पानी का लगभग 0.77 प्रतिशत अतिरिक्त बहाव ही परियोजना के जरिए डायवर्ट होगा।

इन आंकड़ों के आधार पर सवाल उठता है कि क्या इतनी मात्रा में पानी डायवर्ट करने से कोसी की बाढ़ की समस्या का प्रभावी समाधान संभव है?

हाई डैम का पुराना सवाल

आजादी के समय से ही जब भी कोसी की समस्या के समाधान की बात होती है, कोसी में हाई डैम की चर्चा सामने आती रही है। प्रस्तावित हाई डैम नेपाल के बराह क्षेत्र में है। इसके कारण मामला दो देशों से जुड़ता है और नेपाल में बड़े पैमाने पर विस्थापन की आशंका भी है। सवाल है कि क्या नेपाल इसके लिए तैयार होगा?

इसके साथ ही कोसी नदी की सिल्ट और गाद लाने की प्रकृति भी एक बड़ी चुनौती है, जो विकास कार्यों को प्रभावित करती रही है। यदि प्रस्तावित डैम में बड़ी मात्रा में सिल्ट जमा होती है तो उसे हटाने की व्यवस्था क्या होगी, यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है।

सामरिक दृष्टि से भी दो देशों के बीच बड़े बांधों की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र अत्यधिक भूकंपीय संवेदनशीलता वाला है।

भारत में भी हाई डैम की अवधारणा लंबे समय से विकास परियोजनाओं का हिस्सा रही है। दूसरी ओर, दुनिया के कई देशों में पुराने बांधों को हटाकर नदियों को प्राकृतिक प्रवाह देने की दिशा में काम किया जा रहा है। ऐसे में सवाल है कि भारत और बिहार इन अनुभवों से क्या सीख लेते हैं और भविष्य की नदी नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

कोसी-मेची नदी जोड़ की जगह कोसी मुख्य नहर विस्तारित परियोजना नाम क्यों नहीं?

कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना को यदि कोसी पूर्वी मुख्य नहर विस्तारित परियोजना का नाम दिया जाता तो शायद यह उसके वास्तविक स्वरूप के अधिक अनुरूप होता। लेकिन इस नहर परियोजना के विस्तारित स्वरूप की बात होने पर उसकी सिंचाई संबंधी विफलताओं का पुराना इतिहास भी सामने आता है।

कोसी पूर्वी मुख्य नहर परियोजना अपने निर्धारित सिंचाई लक्ष्यों का 20 प्रतिशत भी पूरा नहीं कर पा रही थी और बाद में उसके लक्ष्यों को ही घटा दिया गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या पुराने इतिहास से अलग पहचान बनाने के लिए परियोजना को नया नाम दिया गया है?

नहर के कमांड एरिया से कोसी का अतिरिक्त पानी मेची नदी में जाएगा। हालांकि पहले भी कोसी पूर्वी मुख्य नहर का पानी परमान नदी में जाता था। उस समय सरकार इस परियोजना का नाम कोसी-परमान नदी जोड़ परियोजना भी रख सकती थी, लेकिन उसके स्वरूप के अनुरूप इसका नाम कोसी पूर्वी मुख्य नहर परियोजना ही रखा गया था।

महानंदा बेसिन में कितना और कब मिलेगा पानी?

परियोजना के डीपीआर में उल्लेख है कि महानंदा बेसिन के अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार जिलों में 2.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। यह सिंचाई मानसून सीजन में खरीफ की फसल के समय दी जाएगी।

खरीफ की फसल के दौरान उस क्षेत्र में औसतन 55 दिन वर्षा होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस अवधि में प्राकृतिक रूप से वर्षा होती है, उसी दौरान सिंचाई के लिए परियोजना के पानी की वास्तविक उपयोगिता कितनी होगी?

रबी की फसल के संबंध में डीपीआर में उल्लेख है कि नेपाल में हाई डैम बनने के बाद सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यानी जब किसानों को रबी के समय पानी की सबसे अधिक जरूरत होगी, उस समय भी हाई डैम के निर्माण पर निर्भरता बनी रहेगी।

मानसून सीजन में यदि क्षेत्र में सूखे की स्थिति बनती है तो कोसी पूर्वी मुख्य नहर के कमांड एरिया के किसानों और महानंदा बेसिन के नए कमांड एरिया के किसानों के बीच पानी के उपयोग को लेकर हितों का टकराव भी पैदा हो सकता है।

स्थायी समाधान पर हो गंभीर विचार

इन तमाम सवालों के बीच कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना के सिंचाई और कोसी बाढ़ नियंत्रण संबंधी दावों पर सवाल उठ रहे हैं।

आजादी के बाद से कोसी में हाई डैम के जरिए समस्या के समाधान का सपना दिखाया जाता रहा है। लेकिन कोसी तटबंध के भीतर हर साल नारकीय जीवन जीने को विवश लोगों की समस्याओं और उनके अनुभवों को भी संवेदनशीलता के साथ सुना जाना चाहिए।

इन लोगों द्वारा उठाई जा रही कोसी की छाड़न धाराओं को पुनर्जीवित कर उनमें नियंत्रित तरीके से पानी छोड़ने की मांग व्यवहारिक और प्रभावी विकल्प हो सकती है। इसके साथ ही बाढ़ प्रबंधन, पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं को भी समाधान का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

सरकार में बैठे लोगों को इन व्यवहारिक सवालों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि कम खर्च में प्रभावी और टिकाऊ समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सके और कोसी के पीड़ित लोगों के दुख-दर्द को कम किया जा सके।

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