नहीं मिल रहा बूढ़ी गंगा का उद्गम, एनजीटी ने एनएमसीजी से मांगा दस्तावेज

बाढ़ सीमांकन को लेकर हो रही देरी पर भी एनजीटी ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है
नहीं मिल रहा बूढ़ी गंगा का उद्गम, एनजीटी ने एनएमसीजी से मांगा दस्तावेज
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उत्तर प्रदेश में बूढ़ी गंगा नदी के फ्लडप्लेन की सीमा निर्धारण में हो रही देरी और नदी के वास्तविक उद्गम को लेकर उठे सवालों के बीच राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने यूपी सरकार को सीमा निर्धारण का काम जल्द पूरा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अधिकरण ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) को बूढ़ी गंगा के वास्तविक उद्गम स्थल और उसके पूरे प्राकृतिक प्रवाह की वैज्ञानिक जांच करने का भी आदेश दिया है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण की प्रधान पीठ ने 3 अगस्त 2026 को प्रियंक भारती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य और इससे संबद्ध मामलों की संयुक्त सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई एनजीटी अध्यक्ष और जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद की पीठ कर रही है।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग ने अधिकरण के समक्ष अपनी प्रगति रिपोर्ट पेश की। राज्य सरकार ने बताया कि राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), रुड़की की रिपोर्ट और गंगा पुनर्जीवन आदेश, 2016 के अनुरूप बूढ़ी गंगा नदी के फ्लडप्लेन की भौतिक सीमा निर्धारित करने और वहां सीमा स्तंभ लगाने का काम चल रहा है।

राज्य सरकार के मुताबिक 100 वर्ष की पुनरावृत्ति अवधि वाले बाढ़ क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने के लिए कुल 1,157 सीमा स्तंभ स्थापित किए जाने हैं। इनमें से मुजफ्फरनगर जिले में 277 सीमा स्तंभ लगाए जा चुके हैं, जबकि मेरठ और हापुड़ जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक काम पूरा हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने एनजीटी को बताया कि सीमा निर्धारण का पूरा काम 30 अगस्त 2026 तक पूरा कर लिया जाएगा।

अधिकरण ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई से कम-से-कम एक सप्ताह पहले अद्यतन प्रगति रिपोर्ट दाखिल की जाए। रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से बताया जाए कि बूढ़ी गंगा के फ्लडपेन की सीमा निर्धारित करने का काम पूरा हुआ है या नहीं।

कहां से निकलती है बूढ़ी गंगा?

मामले की सुनवाई के दौरान नदी के फ्लडपेन के साथ-साथ उसके वास्तविक उद्गम स्थल को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल सामने आया। याचिकाकर्ता प्रियंक भारती ने अधिकरण को बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने बूढ़ी गंगा नदी के उद्गम स्थल का गलत निर्धारण किया है।

भारती ने कहा कि उनके पास करीब 200 वर्ष पुराना एक प्रामाणिक मानचित्र है, जिसमें बूढ़ी गंगा के वास्तविक उद्गम स्थल को दर्शाया गया है। उन्होंने इस मानचित्र को नदी के उद्गम से संबंधित मौजूदा सरकारी दावे के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया।

एनजीटी ने याचिकाकर्ता को यह ऐतिहासिक मानचित्र और इससे संबंधित अन्य दस्तावेज एक सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) को उपलब्ध कराने की अनुमति दी है।

इसके बाद पीठ ने एनएमसीजी के महानिदेशक को इन दस्तावेजों की जांच करने का निर्देश दिया। अधिकरण ने कहा कि एनएमसीजी प्रस्तुत किए गए ऐतिहासिक मानचित्र समेत उपलब्ध सभी अभिलेखों का परीक्षण करे और शपथपत्र के माध्यम से यह बताए कि बूढ़ी गंगा नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कहां है और वहां से गंगा या उसकी किसी सहायक नदी में मिलने तक उसका पूरा प्राकृतिक प्रवाह किस मार्ग से होता है।

इस तरह मामले में अब केवल नदी के बाढ़ क्षेत्र की सीमा निर्धारित करने का सवाल नहीं है, बल्कि नदी की पहचान, उसके वास्तविक उद्गम और उसके प्राकृतिक प्रवाह को लेकर भी वैज्ञानिक जांच की प्रक्रिया शुरू होगी।

एनजीटी ने राज्य सरकार को फ्लडपेन सीमा निर्धारण की प्रगति और एनएमसीजी को बूढ़ी गंगा के उद्गम तथा प्राकृतिक प्रवाह से संबंधित जांच की जानकारी अगली सुनवाई में रखने के लिए कहा है।

मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर 2026 को होगी।

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