स्मृति: छोटी नदी, अदृश्य दुनिया
मदनपुर में सुबह मवेशियों के गले में बँधी घंटियों की आवाज़ से खुलती थी। चरवाहा गायों को लेकर निकलता तो घंटियाँ गलियों में बजती हुई नदी की तरफ़ बढ़ती जातीं। पीछे-पीछे औरतें घड़े लेकर निकलतीं, फिर बच्चे, जिन्हें नदी पर कोई काम नहीं होता था, लेकिन वहाँ जाना ज़रूरी लगता था।
घरों से निकली पगडंडियाँ एक-एक करके घाट पर आकर मिल जाती थीं। कोई पानी भरता, कोई नहाता, कोई मवेशियों को पानी पिलाता और कोई किनारे बैठा रहता। उस नदी का नाम 'सिंदूरी' है, 'नर्मदा' की एक छोटी सहायक नदी। 'नर्मदा' हमने बड़े होकर देखी, पुण्य कमाने के लिए। 'सिंदूरी' में हम बचपन से उतरते रहे, बिना किसी पुण्य के।
नदियों के बारे में हमारी कल्पना में कुछ बड़ी नदियाँ लगभग पूरी दुनिया घेर लेती हैं। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी और नर्मदा के किनारे बसे नगरों, सभ्यताओं, तीर्थों और साम्राज्यों के इतिहास हैं। साहित्य में उनके लिए जगह है, यात्राओं में उनके घाट हैं और पर्यावरण की चर्चाओं में उनके पानी का हिसाब है। उनके सूखने, बाढ़ आने या प्रदूषित होने की खबरें दूर तक जाती हैं। लेकिन उन नदियों के साथ बहने वाली छोटी धाराओं का क्या होता है, उनके किनारे बसी दुनिया किस तरह बदलती है, यह सब हमारी निगाह में बहुत कम आता है।
नक्शे पर छोटी नदी एक पतली लकीर होती है। कई बार उसका नाम भी ढूँढ़ना पड़ता है। लेकिन उसके किनारे रहने वालों के लिए वह किसी लकीर की तरह नहीं होती। उनके लिए वह रास्ता है, घाट है, पानी है, मवेशियों की जरूरत है और बचपन की एक जगह है। उसके आसपास खेतों का भूगोल है, काम करने के तरीके हैं, मौसम पहचानने के अपने ढंग हैं और ऐसी स्मृतियाँ हैं जिनका किसी सरकारी दस्तावेज़ में हिसाब नहीं मिलता। नदी छोटी हो सकती है, लेकिन उसके सहारे बने जीवन की दुनिया छोटी नहीं होती।
मदनपुर भी इसी दुनिया का हिस्सा था। लगभग एक हज़ार लोगों की बस्ती, जहाँ न डाकघर था, न पुलिस थाना, न तहसील और न कोई बड़ा बाज़ार। एक स्कूल था, खेत थे, बगीचे थे, पेड़ थे और घरों के सामने बने चबूतरे थे। गाँव का जीवन किसी एक पेशे या एक तरह की जरूरत से नहीं चलता था। लोहार, बढ़ई, कुम्हार, दर्जी, नाई, धोबी और बाँस का काम करने वाले लोग अपनी-अपनी जगह जरूरी थे। चरवाहे मवेशियों को लेकर निकलते थे। कई कामों का हिसाब पैसे के बजाय अनाज से होता था। एक परिवार की जरूरत दूसरे परिवार के काम से पूरी होती थी।
गाँव में बदलाव आते थे, लेकिन उनके आने की कोई घोषणा नहीं होती थी। कोई पुराना पेशा कम होने लगता, कोई वस्तु घरों से गायब होने लगती, कोई काम नई मशीन या बाजार के सामने टिक नहीं पाता। पहले लोग किसी चीज़ को बनाना जानते थे, फिर उसे बनवाने के लिए दूसरे गाँव या कस्बे तक जाना पड़ता और अंततः वह चीज़ बाजार से खरीदी जाने लगती। जीवन की सुविधा बढ़ने के साथ पुराने हुनर की जरूरत घट सकती थी। इस बदलाव का हिसाब आर्थिक आँकड़ों में मिलना मुश्किल है। वहाँ यह दर्ज नहीं होता कि किसी हुनर के साथ कितने लोगों की पहचान, कितने शब्दों का इस्तेमाल और कितनी पीढ़ियों का अनुभव भी पीछे छूट गया।
नदी के किनारे का जीवन भी इसी तरह बदलता है। जब नदी रोजमर्रा की जरूरतों का हिस्सा होती है, तब उसका होना अलग से महसूस नहीं किया जाता। लोग उसके पास जाते हैं, अपने काम करते हैं और लौट आते हैं। नदी उनके जीवन में इतनी सहजता से शामिल रहती है कि कोई उसके बारे में लिखने या उसका रिकॉर्ड रखने की जरूरत नहीं समझता। उसके बदलने का पता भी कई बार किसी एक बड़ी घटना से नहीं चलता। पानी कम होने लगता है, किसी जगह तक पहुँचना मुश्किल हो जाता है या किनारे का पुराना इस्तेमाल छूटने लगता है। लोग अपनी आदतें बदल लेते हैं और नदी के बदलने की बात धीरे-धीरे बातचीत से भी बाहर हो जाती है।
मैंने अपनी किताब 'नदी सिंदूरी' की कहानियों में इस दुनिया के कुछ हिस्सों को दर्ज करने की कोशिश की है। यह केवल नदी के पानी या उसके किनारे के दृश्य लिखने का काम नहीं था। वहाँ रहने वाले लोग, उनके रिश्ते, उनकी आजीविका और उनकी बोली भी उस जगह की पहचान थे। स्थानीय भाषा में ऐसे शब्द मिलते हैं जो किसी खास वस्तु, औजार, काम या अनुभव से जुड़े होते हैं। जब वह वस्तु इस्तेमाल से बाहर होती है, तो उससे जुड़ा शब्द भी धीरे-धीरे बोलचाल से हट सकता है। शब्द बचा रह जाए, तब भी उसे बोलने और उसका अर्थ अपने अनुभव से समझने वाले लोग कम हो सकते हैं।
इस तरह छोटी नदी के आसपास की दुनिया का लोप केवल पर्यावरण की कहानी नहीं है। यह रोजमर्रा के ज्ञान, भाषा और स्मृति की कहानी भी है। किसी बड़े शहर के पुराने भवन पर लेख लिखा जा सकता है, किसी ऐतिहासिक नगर की संस्कृति का दस्तावेज़ तैयार किया जा सकता है। लेकिन छोटे गाँव में किसी साधारण-सी वस्तु का महत्व समझने के लिए उसके इस्तेमाल को जानना पड़ता है। वह किसने बनाई, किस काम आती थी, उसके लिए कौन-सा स्थानीय शब्द बोला जाता था और उसके बिना काम कैसे चलता था। इसी तरह नदी के बारे में जानने के लिए सिर्फ उसका नाम और लंबाई पर्याप्त नहीं हैं। यह भी देखना पड़ता है कि उसके पानी के साथ लोगों का जीवन कैसे जुड़ा था।
मध्य भारत की छोटी नदियों का जीवन वर्षा, भूजल और उनके जलग्रहण क्षेत्र से गहरे जुड़ा है। पहाड़ियाँ, जंगल, मिट्टी और छोटे जलस्रोत उस पूरे तंत्र का हिस्सा हैं जो नदी को पानी देता है। बारिश का पानी जमीन में कितना समाता है, कितना तेजी से बहकर निकल जाता है और कितनी देर तक नदी में प्रवाह बना रहता है, इन सबका असर पड़ता है। जंगलों की कटाई, पहाड़ियों की खुदाई, खनन और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव इस व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। नदी का जीवन केवल उसके तल में बहते पानी तक सीमित नहीं होता। वह उस भूभाग से भी बनता है जो उसे पानी देता है।
नरसिंहपुर और नर्मदा क्षेत्र की नदियों पर हुए अध्ययनों में रेत खनन, नदी के प्रवाह और पानी की उपलब्धता से जुड़े सवाल सामने आए हैं। इस क्षेत्र की कुछ छोटी नदियों और धाराओं में सर्दियों के बाद पानी सूखने की स्थितियों का उल्लेख मिलता है। 'दूधी' जैसी सहायक नदी का सूखना भी इस व्यापक चिंता का हिस्सा है। रेत खनन और नदी के तल में बदलाव का असर उसके आसपास के पर्यावरण और उन लोगों पर भी पड़ सकता है जिनकी आजीविका नदी से जुड़ी है। मछुआरे, नदी की रेत से काम चलाने वाले लोग और आसपास की जमीन पर निर्भर परिवार इन बदलावों को अपने जीवन में महसूस करते हैं।
बड़ी नदियों की तुलना में छोटी नदियों का संकट अक्सर अलग से दिखाई नहीं देता। बड़ी नदी में बाढ़ आए तो बड़े इलाके प्रभावित होते हैं, पुल और सड़कें चर्चा में आते हैं और प्रशासनिक तंत्र सक्रिय होता है। छोटी नदी में पानी कम हो जाए तो उसका असर सीमित भूभाग में फैले लोगों पर पड़ सकता है। उनकी परेशानी भी उसी भूगोल तक सीमित समझी जाती है। नदी के सूखने की खबर नहीं बनती, क्योंकि उसे महत्वपूर्ण खबर मानने के लिए जरूरी पैमाना ही अक्सर उसके पास नहीं होता।
इस जून उज्जैन से ख़बर आई कि क्षिप्रा की बाईस सहायक धाराओं में से ज़्यादातर सूख चुकी हैं या नालों में बदल गई हैं। पानी बनाए रखने के लिए अब नर्मदा का सहारा लेना पड़ रहा है। यह पढ़ते हुए सिंदूरी याद आती है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि क्षिप्रा का संकट चर्चा में आता है, मदनपुर में सिंदूरी के किनारे घटती पानी की जगह की ख़बर गाँव से बाहर नहीं जाती।
एक छोटे गाँव के लिए उसकी नदी उतनी ही वास्तविक है जितनी किसी बड़े नगर के लिए उसके किनारे बहने वाली नदी। फर्क इतना है कि बड़े नगरों के जीवन का रिकॉर्ड अधिक मिलता है। वहाँ का बदलाव तस्वीरों, खबरों और दस्तावेज़ों में आ जाता है। छोटे गाँवों में बहुत कुछ लोगों की स्मृति पर निर्भर रहता है। जब वह स्मृति अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचती, तो बदलाव का एक पूरा इतिहास भी खो जाता है।
'सिंदूरी' को याद करते हुए मदनपुर की वह दुनिया लौटती है, जिसमें नदी के किनारे लोगों के काम चलते थे, मवेशी पानी पीते थे और बच्चे घाट तक जाते थे। उस दुनिया में नदी का होना इतना सामान्य था कि उसके बारे में अलग से सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी।
शिरीष खरे लेखक और स्वतंत्र पत्रकार हैं। दो दशकों से अधिक समय से ग्रामीण भारत, सामाजिक जीवन, आजीविका और पर्यावरण के सवालों पर लिख रहे हैं। उनकी पुस्तकों में 'एक देश बारह दुनिया' और 'नदी सिंदूरी' शामिल हैं।


