नदियों के नाम पाती
हमारी जीवनदायिनी नदियां,
आज विश्व नदी दिवस है—सितंबर का वह चौथा रविवार, जब पूरी दुनिया तुम्हारे नाम को समर्पित होती है। हम यह पत्र तुम्हारे नाम लिख रहे हैं, क्योंकि तुम इस मानवीय सभ्यता की पहली किरदार और आखिरी कड़ी हो। तुम्हारे बिना न कोई गाँव बसता, न कोई नगर आकार लेता और न ही किसी भाषा का जन्म होता। जिस दिन पहला मनुष्य तुम्हारे तट पर बैठा, उसी दिन सभ्यता का पहला अध्याय लिखा गया।
आग भले ही तुमने नहीं दी, पर आग जलाने वाले हाथों को जीवनदायी जल तुम ही ने दिया। बीज भले ही तुमने नहीं बोए, पर उन्हें अंकुरित होने की शक्ति तुम्हीं से मिली। इसलिए, जब भी हम मानव सभ्यता की बात करते हैं, तो असल में हम तुम्हारी ही जीवनी पढ़ रहे होते हैं। बस हम यह भूल जाते हैं कि इसकी लेखिका भी तुम ही हो, हम नहीं।
हमें आज भी बचपन की वे कहानियाँ याद हैं, जब गाँव की बुजुर्ग महिलाएँ तुम्हारी कथाएँ सुनाती थीं। जब तुम उफान पर आकर अपने तटों को छूती और खेतों को सींचती थीं, तो वह क्षण ऐसा लगता था मानो कोई ब्याहता बेटी साल भर बाद अपने मायके आई हो। हम भी तुम्हें एक बेटी की तरह ही विदा करते थे—नाविकों के लिए आटे की लोइयाँ नदी में डालते और ब्याहता बेटियों के लिए श्रृंगार व वस्त्र भेंट करते।
त्योहारों और मेलों में लाखों की संख्या में तुम्हारी पूजा करना, दीप जलाना और चुनरी चढ़ाना केवल रस्में नहीं थीं; यह इस बात की स्वीकृति थी कि तुम केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारे परिवार और समाज का अभिन्न हिस्सा हो।
हर क्षेत्र में तुम्हें लेकर अलग-अलग पावन कथाएँ प्रचलित हैं। गंगा का शिव की जटाओं से संयमित होकर धरती पर उतरना हो, या नर्मदा की वह कठिन परिक्रमा जहाँ श्रद्धालु महीनों तुम्हारे तटों पर चलकर तुम्हारी हर लहर को महसूस करते हैं।
कावेरी और गोदावरी को दक्षिण की गंगा के रूप में पूजा गया, तो वहीं सुवर्णरेखा और हरमू जैसी छोटी नदियाँ भी बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के, निस्वार्थ भाव से झारखंड के गाँवों का पेट भरती रहीं।
हमने खुद छोटी नदियों को क़रीब से देखा है तियर को छौड़ादानों के पास बहते हुए, पसाह को भतनहिया गाँव को तीन तरफ से घेरते हुए। पर आज जब हम यह पत्र लिख रहे हैं, तो मन में एक गहरी बेचैनी भी है। क्योंकि हमारी पिछली कुछ पीढ़ियों ने तुम्हें बेटी कहा तो सही पर सहेजा नहीं। हमने तुम्हारे रास्ते बाँध दिए। तुम्हें सुरंगों में क़ैद कर दिया। तटबंधों से घेर दिया जैसे किसी बेटी के पंख काट दिए हों।
बड़े बांधों ने तुम्हारी धारा को टुकड़ों में बाँट दिया ऊपर की तुम, नीचे की तुम, दोनों के बीच एक दीवार, मानो एक ही परिवार को दो हिस्सों में बाँट दिया गया हो। जो गाद तुम अपने साथ ले जाकर मैदानों को उपजाऊ बनाती थीं, वह अब बांधों के पीछे जमा होती जाती है और मैदान धीरे-धीरे अपनी उर्वरता खोते जा रहे हैं।
तुम्हारा एक और दर्द है, जिसे शब्दों में उतारना कठिन है; तुम्हारे तल से रेत का निरंतर उठाव। वह रेत जो तुम्हारा फेफड़ा थी, जिससे तुम साँस लेती थीं, जिसमें भूजल टिकता था, कछुओं के अंडे सुरक्षित रहते थे, डॉल्फिन और घड़ियाल जीते थे उसे हमने मुनाफ़े के लालच में मशीनों से खींच निकाला।
हर ट्रक जो तुम्हारे तट से रेत भरकर लौटता है, तुम्हारी एक पसली तोड़कर ले जाता है। तुम्हारा तल नष्ट होता है, तुम्हारा भूजल से संबंध टूटता जाता है और तुम धीरे-धीरे उथली, बेदम, बेसाँस होती जाती हो जैसे किसी बेटी का शरीर नोच लिया गया हो, फिर भी उसे मुस्कुराने को कहा जा रहा हो।
तुम्हारी नैसर्गिकता को हमने कानून की तराजू में तौल दिया है। आज सरकारें अदालतों में हलफनामे देती हैं कि तुम्हारे बाढ़ क्षेत्रों (फ्लडप्लेन) का दायरा कितना पुराना माना जाए—पिछले 100 साल का फैलाव, 1977 या 2013 की बाढ़, या सिर्फ पिछले 5 वर्षों का रिकॉर्ड? मानो तुम्हारा इतिहास और स्मृति भी कोर्ट के दस्तावेजों से तय होगी।
जिस ज़मीन पर तुम कभी पूरे वेग से बहकर मिट्टी को नया जीवन देती थीं, वहाँ अब कंक्रीट की दीवारें, कॉलोनियाँ, मॉल और अपार्टमेंट बन रहे हैं। हम यह भूल गए कि जो घर नदी के रास्ते में बनेगा, वह एक दिन बाढ़ की चपेट में ज़रूर आएगा।
मुंबई की मीठी नदी इसका बड़ा उदाहरण है, जो कभी जीवंत जलधारा थी और आज एक नाले में बदल चुकी है। गुवाहाटी की भराली, पुणे की मूला-मुठा, भुवनेश्वर की गंगुआ-गंधवती और दिल्ली की यमुना का भी यही हाल है।
शहर बढ़ते गए और तुम सिकुड़ती गईं। हमने तुम्हारे ऊपर सड़कें और हवाई जहाज के रनवे बना दिए, यहाँ तक कि तुम्हें भूमिगत कर दिया। अब हम तुम्हें सिर्फ तब याद करते हैं, जब बारिश में हमारे वीआईपी एयरपोर्ट और मोहल्ले जलमग्न हो जाते हैं। यह सिर्फ अतिक्रमण नहीं, बल्कि प्रदूषण की भी क्रूर कहानी है। हम तुमसे तुम्हारा सारा स्वच्छ जल छीन लेते हैं और कारखानों, खेतों व घरों में इस्तेमाल के बाद रसायनों, सीवेज और प्लास्टिक से सना ज़हरीला पानी वापस तुम्हारी गोद में उड़ेल देते हैं।
हमने यह भी देखा है कि सूखा और बाढ़ अब एक ही मौसम में एक ही राज्य के भीतर, कुछ ही सप्ताह के अंतराल पर देखने को मिल जाते हैं मानो प्रकृति खुद हमें चेतावनी दे रही हो कि संतुलन बिगड़ चुका है। एक ओर बुंदेलखंड जैसे इलाके वर्षों तक सूखे की मार झेलते हैं, कुएँ सूखते जाते हैं, महिलाएँ मीलों चलकर पानी लाती हैं तो दूसरी ओर असम और बिहार के मैदान हर वर्ष विनाशकारी बाढ़ में डूब जाते हैं, फसलें बह जाती हैं, घर उजड़ जाते हैं।
इतिहास में झाँका तो हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यताएँ तुम्हारे ही तटों पर पली-बढ़ीं, और जब सिन्धु-सरस्वती नदियों में व्यापक बदलाव आया तो वे सभ्यताएँ भी विलीन हो गईं; यह पहला प्रमाण था कि सभ्यता का भाग्य तुम्हारे प्रवाह से बंधा है। वैदिक ऋचाओं में नदियों की स्तुति मिलती है, सप्तसिंधु की गाथा मिलती है, जहाँ सात नदियाँ मिलकर एक भूभाग को उपजाऊ बनाती थीं।
इतिहास में जब नगर बसे, पाटलिपुत्र गंगा के किनारे, विजयनगर तुंगभद्रा के किनारे, आगरा और दिल्ली यमुना के किनारे तो यह कोई संयोग नहीं था। हर शासक जानता था कि सत्ता की नींव जल के बिना नहीं रखी जा सकती। पर यही ज्ञान, जो कभी शासन की बुनियाद था, आज नीति-निर्माण से लगभग गायब हो चुका है। हमारे आधुनिक नगर नियोजन में ना नदियों के लिए कोई जगह है ना तालाब के लिए कोई जमीन।
औपनिवेशिक काल में तुम्हारे साथ रिश्ता और भी औज़ारी हो गया। अंग्रेज़ों ने नहरें खोदीं, बांध बनाए, तुम्हें राजस्व वसूली का माध्यम बनाया। तुम्हारी धाराओं को सिंचाई विभाग की फाइलों में दर्ज संख्याएँ बना दिया गया मसलन क्यूसेक, एकड़-फुट, जल-बंटवारे के समझौते आदि।
अब तुम्हारा मूल्यांकन जल-विद्युत क्षमता में होता है, सिंचाई क्षमता में होता है, पर्यटन राजस्व में होता है पर शायद ही कभी इस बात में कि तुम कितनी प्रजातियों को जीवन देती हो, कितने भूजल स्रोतों को पुनर्भरण करती हो, कितनी संस्कृतियों को अपने भीतर सहेजे रखती हो।
हम जानते हैं कि यह पत्र केवल शिकायतों का पुलिंदा नहीं बनना चाहिए। क्योंकि हमने यह भी देखा है कि जहाँ लोगों ने तुम्हें फिर से अपनाने की कोशिश की, वहाँ तुम भी लौट आई। जिन गाँवों ने पारंपरिक जल-संरक्षण की विधियों को फिर से अपनाया; तालाबों को गहरा किया, पुराने कुओं को साफ किया, वर्षा जल संचयन को गंभीरता से लिया वहाँ भूजल का स्तर फिर ऊपर उठा।
जिन शहरों ने अपनी नदियों को नाला मानने के बजाय जीवनरेखा मानना शुरू किया, वहाँ सफाई अभियान शुरू हुए, किनारों को फिर से हरा-भरा किया गया, समुदायों ने खुद आगे बढ़कर तुम्हारी रक्षा का बीड़ा उठाया।
हमने अपने काम के दौरान भी यह अनुभव किया है कि जब समुदाय को साथ लिया जाए, तो तुम्हारी अविरल बहाव असंभव नहीं रह जाती। पर्यावरण जागरूकता के जो भी छोटे-छोटे प्रयास हमने गाँवों में, स्कूलों में देखे हैं, उनमें एक बात समान रही जब बच्चों को यह सिखाया गया कि नदी केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उनके गाँव की जीवनरेखा है तो उनके भीतर एक स्वाभाविक अपनापन जागा।
जिन विद्यालयों में विद्यार्थियों को निकटवर्ती नदी की सफाई अभियान में शामिल किया गया, जहाँ उन्हें जल-परीक्षण के सरल प्रयोग करवाए गए, वहाँ उन बच्चों ने नदी को अपनी संपत्ति नहीं, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी माना।
आज विश्व नदी दिवस पर तुम्हारे लिए मनाये जानेवाले उत्सव केवल रस्म नहीं होने चाहिए। यह उस बेटी से माफ़ी माँगने का दिन होना चाहिए, जिसे हमने पूजा तो बहुत पर सुना कम। हमने तुम्हारी आरती उतारी पर तुम्हारे तटों की सुरक्षा नहीं की।
हमने तुम्हें माँ कहा, बेटी कहा, देवी कहा पर व्यवहार में तुम्हें एक संसाधन से ज़्यादा कुछ नहीं समझा, जिसे जितना चाहो निचोड़ लो, जब तक वह बहना बंद न कर दे। यह दोहरापन अब हमें छोड़ना होगा। या तो हम तुम्हें सच में परिवार का हिस्सा मानें, जिसकी देखभाल हमारा कर्तव्य है, या फिर स्वीकार करें कि हमारी श्रद्धा केवल अंधभक्ति तक सीमित है।
फिर भी, हर साल जब हम तुम्हारा उत्सव मनाते हैं, तो उसमें एक आशा की किरण भी छिपी होती है। तुम आज भी लौटती हो अपने पुराने रास्तों की तलाश में, अपने तटों को पहचानने की कोशिश में, अपनी बाढ़ के मैदानों पर फिर से दावा जताने की उम्मीद में। शायद यही तुम्हारा धैर्य है या शायद यही हमारी आख़िरी उम्मीद कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।
हमें यह भी लगता है कि यह लड़ाई अकेले किसी सरकार या किसी संस्था की नहीं हो सकती। जिस दिन हर घर यह समझ लेगा कि नल से बहता पानी किसी न किसी नदी या भूजल स्रोत से आया है कि गटर में बहाया गया हर लीटर पानी अंततः किसी न किसी धारा में मिलता है, उस दिन शायद हमारी आदतें बदलने लगेंगी।
यह महती ज़िम्मेदारी नीति-निर्माताओं की तो हैं ही, पर हर उस व्यक्ति की भी है जो नल खुला छोड़ देता है, जो कचरा नदी किनारे फेंक देता है, जो पूजा की सामग्री प्लास्टिक में लपेटकर तुम्हारी धारा में प्रवाहित कर देता है।
हम यही कामना करते हैं कि तुम बहती रहो बाँधों के बावजूद, अतिक्रमण के बावजूद, हमारी असंख्य भूलों के बावजूद। तुम बहती रहो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी तुम्हारे किनारे बैठकर वही कहानियाँ सुन सकें जो हमने अपनी दादी-नानी से सुनी थीं कि नदियाँ बेटियाँ होती हैं और बेटियाँ कभी लौटना नहीं भूलतीं, बशर्ते उनके लिए घर के दरवाज़े खुले रहें।
तुम्हारी क्षमा-प्रार्थी,


