गुवाहाटी: कभी जीवनरेखा रही भरालु नदी अब खुले सीवर में बदली
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) के दिन साक्षात् गंगा नदी में स्नान करना संभव न हो, तो किसी भी अन्य पवित्र नदी जैसे ब्रह्मपुत्र में स्नान करने से समान पुण्य और फल की प्राप्ति होती है। ब्रह्मपुत्र नदी (जिसे 'लोहित्य' भी कहा जाता है) को हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है।
धार्मिक दृष्टिकोण से इन पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसी पवित्र नदी में मिल जाने वाली छोटी सी नदी कभी गंगा-दशहरा के दिन लोगों को अपने जल में डुबकी लगाने के लिए आमंत्रित करती थी, आज खुद ही वह नदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। जिसकी कथा बड़ी ही दारुण है।
एक समय था जब गुवाहाटी के हृदय में एक पतली, शांत और स्वच्छ नदी बहती थी नाम था “भरालु”। वह न गंगा नदी जैसी विशाल थी, न यमुना नदी जैसी प्रसिद्ध और न ही ब्रह्मपुत्र नदी जैसी विराट। फिर भी इस छोटी-सी नदी की गोद में एक पूरे शहर की स्मृतियां पलती थीं। बच्चों की किलकारियाँ, स्त्रियों के लोकगीत, मछुआरों की आजीविका, किसानों की आशाएँ और प्रकृति की नमी से भरी हुई एक शांत जीवन-धारा बहती थी।
भरालु तो आज भी गुवाहाटी के बीचों-बीच बहती तो है, पर जीवित नदी की तरह नहीं, बल्कि एक घायल देह की तरह जिसकी सांसें चल रही हैं, पर जिसका जीवन भीतर से लगभग समाप्त हो चुका है। अब नदी बस एक पसरते आधुनिक होते शहर के गंदे पानी और कूड़े-कचरे के लिए बस एक निस्तारण का चैनल है।
गुवाहाटी के पुराने लोगों की स्मृतियों में भरालू कभी स्वच्छ, मछलियों से भरी और जीवनदायिनी नदी थी। आज जिस “मरा भरालू” का नाम सुनाई देता है, वह भी इसी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है, जैसे नदी केवल भौतिक रूप से नहीं, सांस्कृतिक रूप से भी “मर” गई हो। मरा भराली की कथा नदी के किसी पौराणिक आख्यान की नहीं, बल्कि आधुनिक शहरों द्वारा अपनी ही नदियों की हत्या की कहानी है।
भराली की नदी संस्कृति
असम के नदी-लोकजीवन में ऐसी मान्यताएँ व्यापक रूप से दिखाई देती हैं। कई समुदाय मानते थे कि नदी केवल पानी नहीं, बल्कि चेतना और स्मृति से भरी हुई सत्ता है, जिसका सम्मान करना आवश्यक है। इसलिए नदी किनारे दीप जलाना, जल को प्रणाम करना या कुछ विशेष दिनों में स्नान से परहेज़ करना जैसी परंपराएं विकसित हुईं।
नदी केवल जल का स्रोत नहीं थी; वह समुदाय की धड़कन थी। उसका पानी इतना निर्मल था कि उसमें झुककर देखने पर आकाश स्वयं को देख सकता था। पहाड़ों से उतरते हुए नदी जैसे ही असम की धरती पर पहुंचती जहां लोग उसे पहले ‘बहिनी’ और फिर गुवाहाटी शहर के बीचोंबीच ‘भरालू’ के नाम से पुकारते। अंततः वह भारालुमुख पर जाकर अपनी माँ ब्रह्मपुत्र नदी की विशाल धारा में समा जाती थी।
पहले, जब गुवाहाटी आज की तरह फैला हुआ महानगर नहीं था, तब भरालु मेघालय की दक्षिण खासी पहाड़ियों की वर्षा-भीगी ढलानों से उतरती थी। उसके साथ पहाड़ों की ठंडी हवा, काई लगी चट्टानों की गंध और बादलों की फुसफुसाहट भी आती थी।
नदी के किनारे बांस और लकड़ी के छोटे-छोटे घर थे। सुबह महिलाएँ नदी से पानी भरतीं, कपड़े धोतीं और लोकगीत गातीं। बच्चे उथली धारा में कंकड़ उछालते और दोपहर की धूप में तैरना सीखते। बुज़ुर्ग लोग किनारे बैठकर मौसम और खेती की बातें करते।
एक समय था जब यह नदी गुवाहाटी की जीवनरेखा थी। जल इतना स्वच्छ था कि लोग इसे घरेलू उपयोग में लाते थे। बच्चे नदी के पानी में तैरते थे, महिलाएं पारंपरिक ‘जकोई’ से मछलियाँ पकड़ती थीं और छोटी नावें रास्ते से सामान ढोती थीं। नदी के किनारे पर बसे तारुण नगर, अनिल नगर, भंगागढ़, उलूबाड़ी और कुमारपारा जैसे मोहल्ले साथ साँस लेते थे।
भरालु नदी केवल जलधारा नहीं थी; इस शहर की स्मृतियों, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का हिस्सा थी। असम में नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवित शक्ति माना जाता रहा है। ब्रह्मपुत्र, लुइत, दिहिंग जैसी नदियों की तरह भरालू के किनारे भी लोककथाएँ प्रचलित रही हैं। विशेषकर जल-आत्माओं और “बाआक” नामक जल-प्रेत की कथाएँ, जो नदी-तालाबों के पास रहने वाला रूप बदलने वाला प्राणी माना जाता है।
नदी का बचपन
बशिष्ठ आश्रम के शांत वनांचल में, जहां गुवाहाटी की दक्षिणी सीमा मेघालय की पहाड़ियों को छूती है, एक ऐसा स्थान है जहाँ प्रकृति, अध्यात्म और जल एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। यहाँ जलप्रपात की गूंज के बीच स्थित प्राचीन आश्रम में यह विश्वास आज भी जीवित है कि वशिष्ठ ऋषि ने यहीं तप किया था।
अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अहोम राजा द्वारा निर्मित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक नदी की जन्मस्थली का सांस्कृतिक स्मारक है। लोकमान्यता के अनुसार मेघालय की पहाड़ियों से उतरने वाली तीन पवित्र धाराएं संध्या, ललिता और कांता यहीं आकर संगम बनाती हैं। इन तीनों धाराओं के मिलन से उत्पन्न जलधारा पहले वशिष्ठ नदी कहलाती है, आगे चलकर बाहिनी के नाम से बहती है और अंततः वही शहर के मध्य में प्रवेश कर भरालु नदी बन जाती है।
भरालू नदी के नाम और उससे जुड़ी लोकमान्यताएँ असम की बहुस्तरीय सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ी हैं। “भरालू” अथवा “भराली” नामकरण की जड़ें बोडो लोकपरंपरा में मिलती हैं, जहाँ “भोल्लोब्री” नामक एक देवी या स्त्री-दैवी सत्ता का उल्लेख मिलता है। समय के साथ भाषाई परिवर्तन, स्थानीय उच्चारण और लोकप्रयोगों के कारण “भोल्लोब्री” से “भराली” और फिर “भरालू” नाम विकसित हुआ माना जाता है। यह केवल भाषाई परिवर्तन नहीं, बल्कि यह भी संकेत है कि नदी को कभी एक जीवित, स्त्री-सत्तात्मक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में देखा जाता था।
शहर का विस्तार और मरा भराली
कभी गुवाहाटी की जीवनरेखा मानी जाने वाली भरालू नदी आज शहर के सबसे प्रदूषित जलस्रोतों में गिनी जाती है। पुराने लोगों की स्मृतियों में यह नदी कभी इतनी स्वच्छ थी कि इसमें स्नान, तैराकी और मछली पकड़ना सामान्य बात थी, लेकिन तेज शहरीकरण, अनियोजित निर्माण और दशकों के अतिक्रमण ने इसकी प्रकृति बदल दी। 1980 के दशक के बाद शहर के फैलाव के साथ नदी के किनारे बस्तियाँ और बाजार बढ़ते गए तथा घरेलू कचरा, प्लास्टिक और नालों का गंदा पानी सीधे नदी में गिरने लगा।
धीरे-धीरे शहर ने अपने घरों और बाजारों का सारा कचरा भरालु की ओर मोड़ दिया। सीवेज, प्लास्टिक, पॉलिथीन, रसोई का अपशिष्ट, धरेलू रसायनिक अपशिष्ट और औद्योगिक अवशेष नदी में घुलने लगे। जो नदी कभी पहाड़ों की सुगंध लेकर आती थी, वह अब दुर्गंध से भर उठी। ठोस कचरे ने नदी की दशा और खराब कर दी।
प्रतिदिन सैकड़ों टन कूड़े में से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, निर्माण मलबा और घरेलू अपशिष्ट नदी के किनारे और तल में जमा होता रहा। इसके साथ-साथ अतिक्रमण ने नदी की चौड़ाई को लगातार कम किया। जहाँ कभी नदी स्वतंत्र रूप से बहती थी, आज कई स्थानों पर मात्र दस से बीस मीटर चौड़ी संकरी धारा रह गई है। वैज्ञानिक अध्ययनों में नदी जल में लोहा, पारा, कैडमियम, सीसा और जस्ता जैसी भारी धातुओं की उपस्थिति दर्ज की गई है।
आज स्थिति यह है कि कई हिस्सों में भरालू एक खुले सीवर जैसी दिखाई देती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी इसे देश के अत्यधिक प्रदूषित नदी-खंडों में शामिल किया है। हाल के अध्ययनों में नदी के जल में घुलित ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग बीओडी और प्रदूषण-सहिष्णु शैवालों की बढ़ती उपस्थिति दर्ज की गई है, जो इसके गंभीर पारिस्थितिक संकट का संकेत है।
भरालू के प्रदूषण के मुख्य स्रोतों में बिना शोधन के छोड़ा जाने वाला घरेलू सीवेज, बाजारों और बस्तियों से आने वाला ठोस कचरा, प्लास्टिक अपशिष्ट, नालों का गादयुक्त पानी तथा नदी तटों पर लगातार बढ़ता अतिक्रमण शामिल हैं। “मरा भरालू” की स्थिति पर प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया है कि नदी का जल कई स्थानों पर काला पड़ चुका है, जलकुंभी और कूड़े से इसका प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है और जलीय जीवन लगभग समाप्त हो गया है। पर्यावरणविदों ने चेताया है कि भरालू केवल एक नदी नहीं बल्कि गुवाहाटी की जलनिकासी व्यवस्था की धुरी है; इसके दम घुटने का सीधा असर शहर की बाढ़ और जलजमाव की समस्या पर पड़ रहा है।
एक मौन पीड़ा
नदियाँ रो नहीं सकतीं, पर उनका दुःख उनके जल में निश्चित ही दिखाई दे जाता है। पुराने स्थानीय विवरणों और सामुदायिक स्मृतियों में नदी में छोटी देशी मछलियों, झींगों, घोंघों तथा विविध जलीय जीवों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है, परंतु अब नदी का अधिकांश हिस्सा प्रदूषित जल में रह पाने वाले सूक्ष्मजीवों और शैवालों तक सीमित होता जा रहा है। हाल में प्रकाशित शोधों में पाया गया कि अत्यधिक सीवेज, भारी धातुओं और रासायनिक अपशिष्टों के कारण नदी की जल-गुणवत्ता इतनी बिगड़ चुकी है कि केवल प्रदूषण-सहिष्णु शैवाल प्रजातियाँ ही बड़ी संख्या में जीवित रह पा रही हैं।
2024 के एक अध्ययन में भरालू में 33 प्रकार के फाइटोप्लैंकटन और शैवाल दर्ज किए गए, जिनमें प्रदूषण-सहिष्णु जीव प्रमुख थे, जबकि स्वच्छ जल पर निर्भर जीवों और मछलियों की संख्या में भारी गिरावट देखी गई। अन्य शोधों में नदी की तलछट में सीसा, जस्ता और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे विषैले तत्वों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जो जलीय जीवों के प्रजनन, वृद्धि और अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
स्थानीय लोगों की स्मृतियां भी बताती हैं कि जिस नदी में कभी मछलियाँ स्पष्ट दिखाई देती थीं, वह आज काले, दुर्गंधयुक्त नाले में बदल चुकी है, जहाँ जलीय जीवन लगभग समाप्तप्राय हो गया है। भरालु की मछलियाँ एक-एक करके गायब हो गईं। झींगे, छोटी स्थानीय प्रजातियाँ और जलचर जो कभी इसकी धारा में खेलते थे, स्मृति बन गए।
“मरा भराली ” की घोषणा
एक दिन अखबारों ने उसे नया नाम दिया-“गुवाहाटी की मृत नदी: मरा भराली।”
यह शब्द किसी सरकारी रिपोर्ट का तकनीकी निष्कर्ष भर नहीं था; यह एक जीवित जलधारा का मृत्युलेख था। वैज्ञानिकों ने उसके पानी की जाँच की। पाया गया कि उसमें घुलित ऑक्सीजन, जो किसी भी पानी में फलते फूलते जीवन का प्रतीक है, लगभग समाप्त हो चुकी है, वही बीओडी, पानी में सड़ते अपशिष्ट का द्योतक है, खतरनाक स्तर तक और रोगजनक जीवाणुओं की संख्या खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है।
अब भरालु जीवन नहीं, बल्कि रोगों का प्रवाह बन चुकी थी; त्वचा संक्रमण, डायरिया, गैस्ट्रोएन्टराइटिस और मच्छरजनित बीमारियों का स्रोत बन गई थी। नदी ऐसी गन्दी हुई कि नदी के साथ तो स्थानीय जुड़ाव था वो कम होने लगा। बच्चों को चेतावनी दी जाने लगी-“उस नदी के पास मत जाना, वहाँ बदबू है, बीमारी है।” भरालु बहती रही, पर जैसे कोई घायल स्त्री अपने भीतर का दर्द छिपाकर घर का काम करती रहती है। शायद प्रदूषण रूपी ही वो “बाआक” नामक जल-प्रेत की कथाएँ थी जो अब सामने आ रही हैं।
भरालु नदी की दुर्दशा केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है; यह गुवाहाटी की शहरी आपदा का भी कारण बन गई है। पहले यह नदी वर्षा के अतिरिक्त जल को अपने भीतर समेटकर ब्रह्मपुत्र तक पहुँचा देती थी। यह नदी शहर की प्राकृतिक जलनिकासी प्रणाली थी। परंतु जब नदी मार्ग कचरे, गाद और अतिक्रमण से अवरुद्ध हो गया, तो वर्षा का पानी सड़कों और घरों में भरने लगा। आज गुवाहाटी में होने वाली शहरी बाढ़ के प्रमुख कारणों में भरालू नदी की अवरुद्ध धारा को माना जाता है।
दूषित जल और दुर्गंध के कारण हैजा, पीलिया, टाइफाइड, डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का प्रभाव बढ़ गया है। जो समुदाय कभी नदी से आजीविका प्राप्त करते थे, उन्हें अब स्वास्थ्य समस्याओं और अस्वच्छ वातावरण के बीच जीवन बिताना पड़ रहा है।
भरालु नदी की सबसे बड़ी व्यथा यह है कि अंततः नहीं चाहते हुए भी अपना सारा प्रदूषण ब्रह्मपुत्र में ले जाकर छोड़ती है। जिस महान नदी को लोग पवित्र मानते हैं, उसी में दूषित जल मिलकर प्रदूषण का भार बढ़ाता है। इस प्रकार भरालु की यह पीड़ा केवल उस तक सीमित नहीं रहती; वह पूरे नदी तंत्र को प्रभावित करती है।
सरकारी संरक्षण
भरालू नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए पिछले कुछ वर्षों में सरकार, नगर निकायों और नागरिक समूहों द्वारा स्मार्ट सिटी और जीएमडीए जैसे प्रकल्पो के अंतर्गत अनेक प्रयास किए गए हैं, जैसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजनाएं, “मरा भरालू” के डी-सिल्टिंग अभियान, अपशिष्ट अवरोधक जाल, जलनिकासी सुधार परियोजनाएँ तथा नागरिक सफाई अभियान।
जेसीबी मशीनें आईं, कचरा निकाला गया, योजनाओं की घोषणाएं हुईं, प्रेस विज्ञप्तियां जारी हुईं। “पुनर्जीवन”, “जैव-उपचार”, “शहरी जल संरक्षण” जैसे शब्द सरकारी दस्तावेजों में चमकते रहे। कुछ स्थानों पर बायोरिमेडिएशन तकनीक अपनाई गई।
परंतु इन प्रयासों की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि अधिकांश योजनाएँ कागज़ों और आंशिक निर्माणों तक सीमित रहीं, जबकि नदी में बिना उपचार के गन्दा पानी, प्लास्टिक और ठोस कचरे का प्रवाह लगातार जारी रहा। कई अध्ययनों और स्थानीय रिपोर्टों ने स्पष्ट किया है कि भरालू को केवल “सफाई अभियान” से नहीं बचाया जा सकता, क्योंकि समस्या की जड़ अनियोजित शहरीकरण, अतिक्रमण, कमजोर सीवेज व्यवस्था और प्रशासनिक समन्वय की कमी में है।
वापस लौटने की आस
असल में ये सफाई प्रकल्प नदी संरक्षण का हिस्सा ना होकर शहर की जरुरत के मुताबिक नदी को अच्छे तरीके से इस्तेमाल करने लायक तैयार करने का प्रयास है जो भारत की हर शहरी नदियों के साथ हो रहा है। नदी जानती हैं कि केवल सफाई पर्याप्त नहीं है।
जब तक शहर अपनी आदतें नहीं बदलता, जब तक सीवेज सीधे नदी में गिरता रहेगा, जब तक शहरी शब्दावली नदियों को गंदे पानी की निकासी वाला नाली समझते रहेंगे, तब तक उपचार केवल घाव पर अस्थायी पट्टी रहेगा। आधुनिक जीवन ने मनुष्य को प्रकृति से इतना अलग कर दिया कि वह अपने ही जलस्रोत को पहचानना भूल गया।
जब किसी समाज की स्मृति से नदी का सम्मान मिट जाता है, तब नदी की मृत्यु लगभग निश्चित हो जाती है। सबसे बड़ी त्रासदी केवल प्रदूषण नहीं थी; नदी और नागरिकों के बीच संबंध का टूट जाना था। जो लोग कभी नदी को माँ कहते थे, वे अब उसे घृणा से देखने लगे। नदी से दूरी बढ़ती गई।
फिर भी भरालु पूरी तरह मरी नहीं है। उसका जल अभी भी बह रहा है। यह बहाव एक संदेश है कि प्रकृति अंतिम क्षण तक जीवन का अवसर देती है।यदि शहर अपने कचरे को रोकना सीखे, सीवेज उपचार संयंत्र प्रभावी हों, अतिक्रमण हटे, वर्षाजल संचयन को बढ़ावा मिले और नागरिक नदी को फिर से अपनी सांस्कृतिक धरोहर समझें, तो भरालु पुनर्जीवित हो सकती है। नदियाँ क्षमा करना जानती हैं उन्हें केवल अवसर चाहिए।
नदी की अंतिम पुकार
बरसात की एक शांत रात में, जब शहर की आवाज़ें थम जाती हैं, भरालु अब भी बहते हुए मानो कहती है-
“मैं अभी समाप्त नहीं हुई हूँ। मेरे जल में जीवन की स्मृति शेष है। यदि तुमने मुझे फिर से माँ की तरह याद किया, तो मैं तुम्हें एक बार फिर मछलियाँ, हरियाली, ठंडी हवा और स्वच्छ जल लौटा दूँगी। पर यदि तुमने मुझे केवल नाली समझा, तो तुम्हारी अगली नदी भी मेरी तरह एक दिन मृत्यु का पर्याय बन जाएगी।”
भरालु की कहानी केवल गुवाहाटी की नहीं है। यह भारत के हर उस शहर की कहानी है जहाँ नदियों को विकास की कीमत पर त्याग दिया गया है। यह कथा हमें चेतावनी देती है कि नदी की मृत्यु अंततः सभ्यता की स्मृति, स्वास्थ्य और भविष्य की मृत्यु है। लेकिन यह कहानी निराशा पर समाप्त नहीं होती। जब तक जल बह रहा है, तब तक पुनर्जीवन संभव है। जब तक स्मृतियाँ जीवित हैं, तब तक संबंध लौट सकते हैं। जब तक मनुष्य अपनी भूल स्वीकार करने को तैयार है, तब तक हर “मृत नदी” फिर से जीवित हो सकती है।
आज भी यदि कोई वशिष्ठ आश्रम के पास खड़ा होकर संध्या, ललिता और कांता की संयुक्त धारा को देखे, तो उसे विश्वास होगा कि भरालु पूरी तरह मरी नहीं है। उसका स्रोत अब भी शुद्ध है। उसके भीतर जीवन की स्मृति अब भी बह रही है। आवश्यकता केवल इतनी है कि शहर अपनी भूल स्वीकार करे और उस नदी को फिर से उसी सम्मान से देखे, जिस सम्मान से उसके उद्गम पर लोग आज भी माथा टेकते हैं।
भरालु की दारुण कथा अंततः कहती है नदी का उद्धार केवल तकनीक से नहीं होगा, बल्कि स्मृति, श्रद्धा और जिम्मेदारी के पुनर्जागरण से होगा। जिस दिन गुवाहाटी वशिष्ठ आश्रम की पवित्रता को शहर की जीवनशैली से जोड़ देगा, उसी दिन भरालु फिर से नाले से नदी बनने की यात्रा शुरू कर देगी।


