कश्मीर में झेलम नदी के घटते जलस्तर ने बढ़ाई किसानों की चिंता

5 मार्च, 2026 को संगम में नदी का स्तर –0.86 फीट तक गिर गया
कौसरनाग से निकलकर संगम पर झेलम में मिलने वाली विशव धारा कुलगाम जिले को रोजाना 60 लाख गैलन से अधिक पेयजल उपलब्ध कराती है। फोटो: @POSHN0OL/एक्स (ट्विटर)
कौसरनाग से निकलकर संगम पर झेलम में मिलने वाली विशव धारा कुलगाम जिले को रोजाना 60 लाख गैलन से अधिक पेयजल उपलब्ध कराती है। फोटो: @POSHN0OL/एक्स (ट्विटर)
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अनियमित और अप्रत्याशित होते मौसम की मार हिमालयी राज्यों में साफ देखी जा सकती है।आम तौर पर मार्च में हिमालय की बर्फ पिघलने से कश्मीर के श्रीनगर में झेलम नदी का जल स्तर बढ़ जाता था, लेकिन इस साल नदी में पानी की मात्रा काफी कम हो गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 5 मार्च, 2026 को संगम में नदी का स्तर –0.86 फीट तक गिर गया। कश्मीर में इसी समय तापमान भी असामान्य रूप से बढ़ गया है।

गुलमर्ग में तापमान 17 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो मार्च में अब तक का सबसे अधिक दर्ज किया गया तापमान है।

मौसम विज्ञानी फैजान आरिफ के अनुसार, पहले सर्दियों या वसंत में गर्मी आने पर बर्फ के पिघलने से झेलम नदी का जल स्तर 5 से 8 फीट तक बढ़ जाता था लेकिन इस साल नदी का जलस्तर काफी कम हो गया है।

इस साल गर्म मौसम, कम बर्फ और लगातार सूखे ने झेलम नदी में पानी की कमी को और बढ़ा दिया है।

मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर से फरवरी तक कश्मीर में केवल 100 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि आम तौर पर 285 मिलीमीटर होना चाहिए था। यानी 65 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई।

फरवरी महीने में श्रीनगर में बहुत कम बारिश हुई, जो पिछले 100 वर्षों में सबसे शुष्क महीनों में से एक रहा।

नदी के जलस्तर ने किसानों की चिंताओं को भी चारगुना बढ़ा दिया है। दरअसल, झेलम से पानी लाने वाली नहरें सूख रही हैं, जिससे दूर के खेतों तक सिंचाई मुश्किल हो गई है। इसे ध्यान रखते हुए कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वह मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए मल्च का इस्तेमाल करें, कम उर्वरक डालें और ठंडे समय में सिंचाई करें।

यदि जलसंकट की स्थिति लंबी अवधि तक चलती है तो पानी की कमी के कारण धान जैसी पानी मांगने वाली फसल छोड़कर किसानों को मक्का और दाल जैसी फसलें उगानी पड़ सकती हैं।

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च के मध्य के बाद तापमान बढ़ने के आसार हैं और इससे बर्फ पिघल सकती है और स्थिति में सुधार हो सकता है। हालांकि, पिछले दो दशकों में कश्मीर की सर्दियां पहले जैसी नहीं रहीं हैं। कम होते हिमपात के कारण अब ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, जिससे नदियों में पानी की उपलब्धता पर गहरा असर पड़ रहा है।

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