

उत्तराखंड में हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजनाओं (एचईपी) को लेकर चल रहे सुप्रीम कोर्ट के एक मामले में केंद्र सरकार ने अपना अंतिम रुख स्पष्ट कर दिया है। मिनिस्ट्री ऑफ एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट एंड क्लाइमेट चेंज ने 19 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी एफिडेविट में कहा है कि अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन में अब कोई नया बांध नहीं बनेगा।
इस मामले में अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी लिमिटेड अपीलकर्ता और अनुज जोशी व अन्य प्रतिवादी हैं। जून 2013 की केदारनाथ त्रासदी की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त 2013 को अपने ऐतिहासिक फैसले में उत्तराखंड में किसी भी हाइड्रो प्रोजेक्ट को पर्यावरण या वन मंजूरी देने पर रोक लगा दी थी और पर्यावरण मंत्रालय को एक्सपर्ट बॉडी गठित करने का निर्देश दिया था। इसके बाद कोर्ट के निर्देश पर एक्सपर्ट बॉडी-I और फिर एक्सपर्ट बॉडी-II बनाई गई।
मामले से जुड़े पर्यावरणविद् हेमंत ध्यानी ने कहा, “केंद्र सरकार ने उत्तराखंड की बड़ी बांध परियोजनाओं, जिनमें बोवाला नंदप्रयाग और देवसारी बांध शामिल हैं, को खारिज कर दिया। उसने 2014 में रवि चोपड़ा समिति (ईबी-1) द्वारा बताई गई उच्च हिमालयी क्षेत्रों की आपदा संवेदनशीलता को स्वीकार किया है।”
एक्सपर्ट बॉडी- II ने मार्च 2020 में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें 70 जल विद्युत परियोजनाओं की जांच कर 26 को मंजूरी की सिफारिश की। सरकार ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सिर्फ सात परियोजनाओं को अनुमति दी। इसके बाद 8 अगस्त 2024 को कोर्ट ने कैबिनेट सेक्रेटरी की अध्यक्षता में एक नई उच्चस्तरीय समिति ( सीएबीएसईसी) गठित की जिसमें केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, जलशक्ति मंत्रालय के सचिव और उत्तराखंड के मुख्य सचिव शामिल थे। 20 जनवरी 2026 को कोर्ट ने सरकार को तीन महीने का समय देकर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने को कहा। इसी आदेश के अनुपालन में यह एफिडेविट दाखिल किया गया है।
एफिडेविट में कहा गया कि यह तीनों मंत्रालय की सामूहिक और सर्वसम्मत स्थिति है।
एफिडेविट में स्पष्ट किया गया है "केवल सात जल विद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति दी जा सकती है, जिनमें से चार पहले से चालू हैं और तीन ने पर्याप्त भौतिक एवं वित्तीय प्रगति कर ली है और उत्तराखंड में गंगा नदी के ऊपरी क्षेत्रों में कोई अन्य नई जल विद्युत परियोजना नहीं की जाएगी।"
जिन परियोजनाओं को हरी झंडी दी गई है, उनमें टिहरी पीएसपी (भागीरथी, 1000 मेगावाट, चालू), तपोवन विष्णुगढ़ (धौलीगंगा, 520 मेगावाट, 75% निर्माण), विष्णुगढ़ पिपलकोटी (अलकनंदा, 444 मेगावाट, 80% निर्माण), सिंगोली भटवारी (मंदाकिनी, 99 मेगावॉट, चालू), फाटा ब्यूंग (मंदाकिनी, 76 मेगावॉट, 74% निर्माण), मध्यमहेश्वर (मध्यमहेश्वर गंगा, 15 मेगावॉट, चालू) और कैलगंगा-II (कालीगंगा, 4.5 मेगावॉट, चालू) है।
सीएबीएसईसी समिति ने 6 नवंबर 2024 को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। एफिडेविट के अनुसार समिति ने 21 परियोजनाओं में से सिर्फ पांच की सिफारिश की थी। इनमें बोवाला नंदप्रयाग, देवसारी, भ्युंदर गंगा, झलकोटी और उर्गम-II शामिल थी। हालांकि समिति ने सात परियोजनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के खतरनाक रास्ते पर होने के कारण अनुचित माना। इनमें अलकनंदा, तमक लाता, लाता तपोवन, जेलम तमक, भिलंगना-IIए, भिलंगना-IIबी और भिलंगना-IIसी शामिल थे।
जल शक्ति मंत्रालय की आपत्तियां
जलशक्ति मंत्रालय ने 22 अगस्त 2025 के अपने ऑफिस मेमोरेंडम में कमेटी द्वारा सुझाई पांच परियोजनाओं पर भी गंभीर आपत्तियां जताईं। एफिडेविट के मुताबिक, "ईबी-II रिपोर्ट ने हाइड्रोपावर परियोजनाओं के संचयी प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज किया। यदि सभी नई परियोजनाएं लागू की जाएं तो नदी के मुक्त प्रवाह पर भारी असर पड़ेगा।" मंत्रालय ने यह भी कहा कि, "नदी के स्वास्थ्य सहित पर्यावरण को होने वाला जोखिम और नुकसान इस मात्रा की जल विद्युत के वित्तीय और आर्थिक लाभों से कहीं अधिक है।"
एफिडेविट में इस क्षेत्र को देश के किसी भी अन्य नदी बेसिन से अलग बताते हुए पांच विशेषताएं भी गिनाईं गई हैं। कहा गया है, "अलकनंदा-भागीरथी बेसिन देश की सबसे बड़ी नदी गंगा की प्रमुख मूल धारा है, जो देश की लगभग आधी आबादी को सहारा देती है।"
वहीं, न्यूनतम 1000 क्यूसेक प्रवाह नीति का जिक्र भी किया गया है। 1916 के हरिद्वार समझौते की भावना का हवाला देते हुए एफिडेविट में कहा गया कि अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी में हर संरचना के डिजाइन में न्यूनतम 1000 क्यूसेक का अखंड प्रवाह सुनिश्चित करना होगा।
अलकनंदा-भागीरथी बेसिन राष्ट्र की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान में उस तरह समाई हुई है जो किसी अन्य नदी बेसिन से तुलनीय नहीं है। इस बेसिन में पांचों प्रयाग और चारों धाम स्थित हैं।
एफिडेविट में केदारनाथ (2013), चमोली भूकंप (1999), जोशीमठ भूस्खलन (2023), धारली फ्लैश फ्लड (अगस्त 2025) सहित दर्जनों आपदाओं का हवाला देते हुए कहा गया कि यह क्षेत्र स्थायी और बार-बार आने वाली आपदाओं से ग्रस्त है। साथ ही नंदा देवी नेशनल पार्क, वैली ऑफ फ्लावर्स, गंगोत्री नेशनल पार्क और केदारनाथ वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी का उल्लेख करते हुए इस क्षेत्र को अपरिहार्य जैव विविधता का केंद्र बताया गया है।
एफिडेविट में यह भी स्पष्ट किया गया कि सरकार हाइड्रोपावर की महत्ता को नकारती नहीं है। सरकारी हलफनामे में कहा गया है. "हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजनाएं सामान्यतः स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत हैं जो ऊर्जा सुरक्षा, सतत विकास और जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को समर्थन देती हैं।" लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा है कि "लेकिन हाइड्रो परियोजनाओं का विकास सभी नदी प्रणालियों और भूभागों पर एकसमान कसौटी से नहीं हो सकता।"
मामला अब 20 मई 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है जहां सुप्रीम कोर्ट इस एफिडेविट पर विचार करेगा।