पुस्तक अंश: बहे सो गंगा, डार्क जोन में बदलता उत्तर भारत

पुस्तक अंश: बहे सो गंगा, डार्क जोन में बदलता उत्तर भारत

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मंजीत ठाकुर की पुस्तक के अंश पढ़ें
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नदियां सूख रही हैं, विलुप्त हो रही हैं, उनका रास्ता बदल रहा है और बहुत सारी नदियों का पानी और प्रवाह कम हो रहा है। नदियों-पोखरों-तालाबों की बेशक़ीमती परम्परा का देश जमीन का सीना चीरकर पानी निकाल रहा है, कहीं जरूरत की वजह से, तो कहीं इसका कारण महज लापरवाही है।

हम नदियों को लेकर इतने लापरवाह हैं कि हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि हमारे आसपास की नदियों के साथ क्या कुछ घट रहा है। देश के किसी एक हिस्से की बात नहीं है। पूर्वोत्तर चलिए तो गुवाहाटी में भरलु और बहिनी नदियां, वाराणसी आइए तो वरुणा और असि नदियां और महाराष्ट्र में पुणे चलें तो मूला और मूथा नदियां नालों में बदलकर तक़रीबन गायब हो चुकी हैं। यही हाल कोलकाता में आदिगंगा का है।

नदियों के इस हाल का सीधा सम्बन्ध अनियंत्रित और अबाधित शहरीकरण से तो है ही, अन्धाधुंध विकास गतिविधियों से भी हैं। इन सभी नदियों के पेटे में अतिक्रमण का नतीजा है कि इन नदियों की चौड़ाई सिकुड़ती चली जा रही है। नदियों के पाट में पहले शहरी कचरा जमा होता है और फिर बाद में कच्चे-पक्के मकान कुकुरमुत्ते की तरह उगते चले जाते हैं। नतीजतन, थोड़ी-सी वर्षा से भी यदि नदियों में प्रवाह बढ़ता है तो टीवी वालों से लेकर ट्विटरबाज तक बाढ़-बाढ़ चिल्लाने लगते हैं।

नदियों की इस दशा का बुरा असर न सिर्फ़ उसके तट पर बसे शहरों पर पड़ेगा, बल्कि कई अन्य मुख़्तलिफ़ चुनौतियां भी दरपेश होंगी। छोटी नदियों की समस्या इसलिए भी बुरी है क्योंकि प्रदूषण पर लगाम लगाने की केन्द्रीय और राज्य सरकार की अधिकतर योजनाएँ बड़ी नदियों के इर्द-गिर्द तैयार की जाती हैं जिसमें छोटी नदियां नजरअन्दाज ही रह जाती हैं और धीरे-धीरे वह छोटे और गन्दे नालों में बदल जाती हैं।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बह रही यमुना नदी औद्योगिक कचरे और शहरी गन्दगी के कारण अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुँच ही चुकी है। शहर के कचरे और सीवर के पानी को ढोकर यमुना नदी में पहुँचाने वाला ‘नजफगढ़ नाला’ आज दिल्लीवासियों के लिए गन्दा नाला है और उसे पूरी दिल्ली गन्दे नाले के रूप में ही जानती है। किन्तु यह तो शायद ही किसी के संज्ञान में होगा कि इस नाले का स्रोत कभी नजफगढ़ झील हुआ करती थी, जो ‘साहिबी नदी’ से जुड़ी थी। किन्तु समय के प्रवाह में अब साहिबी नदी और झील दोनों का ही अस्तित्व समाप्त हो चुका है और बचा है केवल नजफगढ़ का नाला।

इसी तरह पंजाब में लुधियाना का ‘बूढ़ा नाला’ भी इसकी एक मिसाल है जो एक पीढ़ी पहले तक साफ़ पानी की ठीक-ठाक सेहत वाली ‘बूढ़ी नदी’ के रूप में बहता था। लेकिन अब वह भी एक गन्दे नाले में बदल चुका है। हर वर्ष वर्षा के मौसम में मुम्बई का जो हाल होता है, वह कोई नई बात नहीं है। कभी मुम्बई की जीवनरेखा के रूप में जानी जाने वाली ‘मीठी नदी’ का अस्तित्व भी अब मिट चुका है और यह नाले में बदल चुकी है।1

नदियों-नालों की इन बातों को क्या हम ख़ुद के लिए कोई चेतावनी मान सकते हैं? बेशक। चेतावनी कड़ी और बड़ी है—भीषण जल संकट आसन्न है, आबादी बढ़ रही है, सदानीरा नदियां मौसमी नदियों में तब्दील हो रही हैं।

आखिर, जिस देश ने अपने शहर नदियों के किनारे बसाए, जिस देश ने अपने पूजा-संस्कार की विधियां नदियों के किनारे और नदियों को लेकर विकसित कीं, नदियां देवी मानी गईं, वहाँ यह सूत्र गायब कैसे हो गया? नदियों को पूजने, उसके जल से आचमन करने और उसको पार कर बैकुंठ तक पहुँचने के आख्यानों वाले हमारे समाज को क्या हो गया कि हमने नदियों और झील-तालाबों को कूड़ेदान समझ लिया?

उन्हें सुखा देने की साज़िश करने लगे? नदियों को पाटकर, पोखरों को सुखाकर मकान-दुकान-खेत बना लेना आज के समाज में दबंगई का सुबूत है, पर एक समाज के तौर पर यह हमारी सामूहिक प्राथमिकता में कैसे तब्दील हो गया? हमारे देश की हर नदी के साथ लोकगीत जुड़े हैं, उनसे जुड़ी लोककथाएँ हैं। थोड़ा इतिहास भी है और थोड़ा विज्ञान भी। परम्परा और रीति-रिवाज तो ख़ैर हैं ही। ऐसे में नदियों को लेकर हम अब क्या सोचते हैं?

इंस्टा की रील में उलझकर क्या समाज रियल समस्याओं से दूर हो गया है? नदियों के किनारे खड़े, और पले-बढ़े समाज को अपने जलाशयों, तालाबों, पोखरों, डबरों, बावड़ियों और नालों-जोहड़ों की याद क्यों नहीं आ रही है? 

नरेन्द्र मोदी ने गंगा को बेशक राष्ट्रीय कार्यक्रम की तरह रखा और उनके पहले कार्यकाल की शुरुआत में ही ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम शुरू किया गया, लेकिन नीतिगत स्तर पर या अन्य पार्टियों के राजनीतिक एजेंडे में नदियों के न होने के साथ ही, एक नया तथ्य यह भी है कि हमारे देश में नदियों को लेकर मिडिओकर विशेषज्ञों का बाहुल्य है। और इन तथाकथित विशेषज्ञों की दक्षता और विचार इतने उथले हैं कि उन पर सवालिया निशान खड़े होते हैं। हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिन इंजीनियरों की बदौलत कई-कई योजनाएँ और एक्शन प्लान बनाकर लागू करने की कोशिश की गई, दरअसल, उनके विचारों में ही पोलापन था।

कई विशेषज्ञों ने व्यावहारिक रूप से साबित कर दिया है कि नदी विज्ञान को लेकर विश्वविद्यालयों में होने वाली पढ़ाई का घोर अभाव है, वहीं मेधावी लोग और छात्र सरकारी तंत्र का अंग नहीं हैं या नहीं बनाए जाते हैं। नतीजतन, समाधान की रूपरेखा में ही परिपक्वता की कमी रही है। मसलन, नदी की संकल्पना और सिद्धान्त आम से लेकर ख़ास तक के लिए स्पष्ट नहीं हैं।

आमतौर पर माना जाता है कि नदी का काम पानी ले जाना है, जो आगे जाकर समुद्र में मिल जाती है। लेकिन, क्या हमने कभी यह सुना है कि नदी का काम ‘गाद’ ले जाना भी है? ख़ासकर गंगा जैसी नदियों के सन्दर्भ में यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह बुनियादी सोच ही शायद योजनाओं और परियोजनाओं में जगह नहीं बना पाई, और इसका नतीज़ा फरक्का बैराज जैसी परियोजनाएँ हैं। जिसने न केवल लाखों लोगों को बेघर कर दिया, बल्कि हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन भी गंगा में विसर्जित हो गई।

गंगा हमारी सभ्यता, हमारे पाप-पुण्य सबको सँभालती रही लेकिन ऐसा लगता है कि आबादी और उम्मीदों के बोझ ने उसे थका दिया है। अक्सर आप सबने गंगा की सफ़ाई से जुड़ी परियोजनाओं और अभियानों में भ्रष्टाचार से जुड़ी कहानियां सुनी होंगी। देश के किसी भी हिस्से में नदियों और नदी घाटियों को लेकर सरकारी सोच में एक निरन्तरता मिलती है।

यानी, बड़ी परियोजनाएँ बनाना और लागू करना। असल में, बड़ी परियोजनाओं का फ़ायदा सबको मिलता है, सिर्फ़ नदी और उनके बेटों को छोड़कर। यानी बड़ी परियोजनाएँ, बड़ी राशि, बड़ा कट, बड़ी सामान्य-सी बात है। लेकिन परियोजनाएँ वैसी ही बनी और बनाई गईं और अभी भी बनाई जा रही हैं, जिनको पश्चिमी देशों ने नकार दिया है। फरक्का बैराज इसका प्रमुख उदाहरण है।

आज कोई कवि सम्भावनाओं के छीजने के सन्दर्भ में ही इसका प्रयोग कर सकता है। मसलन, अंग क्षेत्र (बिहार के भागलपुर के आसपास) में एक फाग की पंक्ति है, ‘उत्तर दिशा में गंग की धारा’, दुर्भाग्य से गंगा की यह उपधारा वहाँ अब सदानीरा नहीं रही। जिस पीढ़ी ने इस इलाक़े के भूगोल को जिया होगा, वह अपनी स्मृतियों के सहारे तो कल्पना में उत्तर दिशा में ‘गंग की धार’ को महसूस कर पाएगी, लेकिन आनेवाली पीढ़ी के लिए यह अर्थहीन हो जाएगी।

असल में, यह सिर्फ़ गंगा की अंग क्षेत्र की उपधारा के लिए ही नहीं बल्कि गंगा की मूल धारा के लिए भी उतना ही सही है। कई वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च से साबित कर दिया है कि गंगा के प्रवाह में कमी आती जा रही है। और अगर कमी की बात कही जा रही है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि गर्मी के मौसम में सूखती धारा का सन्दर्भ दिया जा रहा है। गंगा जल के आयतन में (Volume) में कमी साफ़ दिखने लगी है और यह सिर्फ़ गंगा तक सीमित नहीं है।

हाल के वर्षों में मानसून-पूर्व यानी मूलतः गर्मियों में गंगा नदी का जल स्तर निचले स्तर पर रहने लगा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 1999 की गर्मियों से लेकर 2013 के अध्ययन के वर्ष तक यह कमी 0.5 सेमी से 38.1 सेमी प्रति वर्ष तक रही है।2

वैज्ञानिकों का अन्देशा है कि गंगा के जल स्तर में आई यह स्थायी कमी भूमिजल की आधारधारा (Baseflow) में आई कमी की वजह से है। इसकी वजह गांगेय जलभृतों के भंडार में आई कमी है। गंगा बेसिन में यह कमी –0.30+ 0.07 सेमी./वर्ष या –2.39+ 0.56 घन किमी./वर्ष है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2016 में आधारधारा की मात्रा सत्तर के दशक की शुरुआत में आई पम्पिंग सेट क्रान्ति से पहले के दौर के मुक़ाबले क़रीबन 59 प्रतिशत कम हो गई है। 2016 में यह मात्रा (~1.0 × 106 मी.3/रोज़ाना थी जबकि 1970 के शुरुआती वर्षों में 2.4 × 106 मी.3/रोज़ाना थी।

गंगा नदी के पानी की कमी की वास्तविक मात्रा पर ग़ौर किया जाए तो इससे घनी आबादी वाले उत्तर भारतीय मैदानों की घरेलू जलापूर्ति, सिंचाई जल आवश्यकताएँ, नदी परिवहन, पारिस्थितिकी वग़ैरह ख़तरे में पड़ सकते हैं। गंगा के जल स्तर और प्रवाह में आई इस कमी को थोड़ी-सी कमी मानकर नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि ऐसा करना तो कुछ ऐसा होगा कि 2023 में एक बार दिल्ली-एनसीआर में वर्षा के सीजन में आए लम्बे मानसून ब्रेक (यानी शुष्क अवधि) पर चर्चा के दौरान एक संजीदा पत्रकार तक ने यह कहा था कि ‘दिल्ली में वर्षा नहीं हुई तो कौन सा अनर्थ हो गया। यहाँ कौन-सी धनरोपनी होनी है? यहाँ तो जलजमाव और ट्रैफिक जाम ही लगना है।’

यही वह मायोपिक सोच है जिसकी वजह से भारत ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पर्यावरणीय सोच और चिन्ताएँ हमारे विमर्श से बाहर हो चुकी हैं। देश का प्रबुद्ध तबक़ा भी पर्यावरणीय समस्याओं पर चिन्तित नहीं है और यह भविष्य के लिहाज से काफ़ी चिन्ताजनक बात है। नदियां तो हमारी चिन्ताओं की लिस्ट में सबसे नीचे हैं। इस किताब का मक़सद है गंगा के छीजते जल-वैभव के कारणों और उसके दुष्परिणामों की तरफ़ ध्यान खींचना, ताकि आने वाली पीढ़ी जलविहीन गंगा घाटी में न जिए।

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