बिहार: एक बांध के अवसान की कहानी

चंदन जलाशय में जलस्तर निरंतर कम हो रहा है। इस साल देश के सबसे कम जलस्तर वाला बांध यही है
चंदन नदी के पानी से कई इलाकों के खेतों में सिंचाई होती थी1 फोटो: आदित्य कश्यप
चंदन नदी के पानी से कई इलाकों के खेतों में सिंचाई होती थी1 फोटो: आदित्य कश्यप
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सारांश
  • बिहार के बांका जिले में स्थित चंदन जलाशय बांध, जो कभी कृषि की रीढ़ माना जाता था

  • जलस्तर लगातार गिरने के कारण अब यह बांध संकट में है

  • इसकी जल भंडारण क्षमता में पिछले पांच दशकों में 65.7% की कमी आई है।

  • गाद जमाव और नहरों की खराबी के कारण किसानों को सिंचाई में कठिनाई हो रही है।

  • सरकार की ओर से ड्रेजिंग का प्रस्ताव है, लेकिन मामला न्यायिक प्रक्रिया में है।

बिहार के बांका जिले की कृषि व्यवस्था का आधार माने जाने वाला चंदन जलाशय बांध आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। झारखंड के देवघर की पहाड़ियों से निकलने वाली चंदन नदी पर 1962 में चंदन बांध बनाया गया था, जो बांका जिले की प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं में से एक है।

यह बांध रबी और खरीफ की लगभग 80 हजार हेक्टेयर फसलों की सिंचाई करने की क्षमता रखता है। उस समय इसका उद्देश्य क्षेत्र के किसानों को सिंचाई की स्थायी सुविधा उपलब्ध कराना था। डैम की मूल जल भंडारण क्षमता लगभग 1 लाख 10 हजार घनफीट थी।

चंदन डैम से बौंसी, बांका, बाराहाट, धोरैया और रजौन प्रखंड के अलावा भागलपुर जिले के कुछ क्षेत्रों तथा झारखंड के गोड्डा जिले के कुछ हिस्सों के किसानों के खेतों में पटवन (सिंचाई) होता था। इस कारण इसे बांका जिले की कृषि व्यवस्था की रीढ़ माना जाता रहा है।

लेकिन अब ऐसा नहीं है। बांध की जल भंडारण क्षमता साल दर साल घटती जा रही है। आंकड़ों के अनुसार 1968 में चंदन जलाशय की भंडारण क्षमता लगभग 157.263 लाख घन मीटर थी, जो 2005 में घटकर लगभग 75.47 लाख घन मीटर और वर्ष 2015 में 56.23 लाख घन मीटर तथा 2021 में यह लगभग 54.03 लाख घन मीटर के आसपास रह गई। यानी पिछले पांच दशकों में जलाशय की भंडारण क्षमता में लगभग 65.7 प्रतिशत की कमी आई है।

वर्तमान समय में चंदन डैम की वास्तविक जल भंडारण क्षमता घटकर लगभग 38 हजार 500 घनफीट के आसपास रह गई है, जो इसकी मूल क्षमता का लगभग 40 प्रतिशत ही है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि गाद जमा होने के कारण बरसात के समय जब अधिक पानी आता है तो उसका बड़ा हिस्सा स्पिलवे के माध्यम से बाहर निकल जाता है और जलाशय में अधिक समय तक पानी नहीं रुक पाता।

समस्याएं केवल गाद जमाव तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 1995 में आई भीषण बाढ़ के बाद डैम से जुड़े हाई लेवल कैनाल और कई नहरों के तटबंध टूट गए थे। इसके साथ ही इसके सहायक सुखनियां और डकाय वियर भी क्षतिग्रस्त हो गए थे।

इसके बाद से नहर प्रणाली पूरी तरह सुचारु रूप से काम नहीं कर पाई, जिससे किसानों को डैम का पूरा लाभ नहीं मिल सका। हाल के वर्षों में एक और समस्या सामने आई है। डैम के गेट में खराबी आ जाने के कारण नहरों में पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं छोड़ा जा पा रहा है।

बताया जाता है कि अगस्त महीने में गेट से जुड़ी लोहे की मोटी रस्सी टूट गई थी, जिसके कारण गेट पूरी तरह से नहीं खुल पा रहा। दरअसल, चंदन डैम के जीर्णोद्धार की मांग पिछले दो दशकों से लगातार उठती रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं चंदन जलाशय का निरीक्षण कर चुके हैं। 

 पानी की कमी ने बदली खेती, घटा उत्पादन

भागा पंचायत के 68 वर्षीय किसान योगेंद्र प्रसाद के लिए चंदन डैम केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि उनकी खेती की आधारशिला रहा है। करीब 10 बीघे जमीन पर खेती करने वाले योगेंद्र बताते हैं कि पहले इस डैम के पानी से उनकी पूरी सिंचाई आसानी से हो जाती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हालात तेजी से बदले हैं। अब तो रबी में पानी मिलता ही नहीं।

खरीफ में किसी तरह सिंचाई हो जाती है, लेकिन रबी के समय डैम खाली रहता है। जो थोड़ा बहुत पानी आता भी है, वह पर्याप्त नहीं होता। वे बताते हैं कि इलाके में कई किसानों ने अब बोरिंग (ट्यूबवेल) करवा लिया है, ताकि किसी तरह सिंचाई की व्यवस्था की जा सके। लेकिन यह हर किसान के लिए संभव नहीं है।

योगेंद्र कहते हैं, "हम लोग ऐसी फसलें करने लगे हैं, जिसमें पानी कम लगे जैसे गेहूं और चना। लेकिन इससे उत्पादन बहुत कम हो गया है। पिछले छह वर्षों में स्थिति लगातार बिगड़ी है। वे इसकी वजह गाद और बारिश का बदलता पैटर्न है। अब बारिश भी पहले जैसी नहीं होती। पानी आता है, लेकिन टिकता नहीं। डैम में जमा ही नहीं हो पाता।"

चंदन डैम से करीब 50,000 किसानों को सिंचाई का लाभ मिलता रहा है। लेकिन अब जब डैम में पानी ही नहीं बचता, तो इसका असर पूरे इलाके की खेती पर साफ दिखाई देता है। 

झारखंड से आता पानी और भारी गाद

चंदन नदी का उद्गम झारखंड के देवघर जिले की पहाड़ियों और घने वनों में है। यहीं से शुरू होता है इसका कैचमेंट एरिया। मानसून आते ही इन पहाड़ी ढलानों पर तेज बारिश होती है। पानी की धार इतनी तेज और अचानक बढ़ जाती है कि पहाड़ों की मिट्टी, रेत और जैविक पदार्थों का पूरा बहाव नदी के साथ बहकर चंदन जलाशय में आ जाता है।

यह भारी सिल्ट (गाद) जलाशय के तल में धीरे-धीरे जमा होती जाती है। वर्षों से नियमित सफाई न होने के कारण अब जलाशय का पूरा तल गाद से भर चुका है। गहराई कम हो गई है, पानी टिकता नहीं है।

क्यों बिगड़ रही है चंदन जलाशय की स्थिति

भागलपुर विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर राजनीति विज्ञान विभाग की प्रोफेसर रुचि श्री कहती हैं कि भागलपुर और बांका के इलाके में कतरनी चावल की पैदावार के लिए चंदन डैम का पानी ही इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन आज डैम में पानी ही नहीं है, इसलिए खेती पर इसका गहरा असर पड़ा है।

स्थानीय किसानों से बातचीत के आधार पर वे एक और चिंताजनक बदलाव की ओर इशारा करती हैं कि कतरनी धान, जो अपनी खास खुशबू के लिए जाना जाता है, उसकी पैदावार ही नहीं, बल्कि उसकी खुशबू भी अब पहले जैसी नहीं रही है। अपने अनुभव साझा करते हुए वे बताती हैं कि स्थिति लंबे समय से बिगड़ रही है।

उन्होंने अगस्त 2023 में लखीमपुर (लक्ष्मीपुर) डैम का दौरा किया था। उस समय भी चंदन में बहुत कम पानी देखा। कैचमेंट एरिया पर बात करते हुए वह पर्यावरणीय कारणों को जिम्मेदार ठहराती हैं।

हाल के वर्षों में बड़ी तादात में जंगलाें में पेड़ों को काटा गया है। इस कारण बारिश के पानी के साथ मिट्टी बहकर नदियों में आती है और गाद लगातार बढ़ती जाता है। इसके अलावा रेत खनन भी तेजी से बढ़ी है, जिससे नदियों की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है।

रुचि श्री कहती हैं, इस क्षेत्र की नदियां अभी भू-आकृतिक रूप से युवा अवस्था में हैं, इसलिए उनका स्वभाव अस्थिर रहता है। इन नदियों का स्वरूप लगातार बदलता रहता है, ऐसे में अगर मानवीय हस्तक्षेप बढ़े, तो समस्या और गंभीर हो जाती है।

"हम नदियों को अब राज्य की संपत्ति के रूप में देखने लगे हैं, जबकि पहले ये समाज की साझा विरासत हुआ करती थीं। इसी सोच के बदलाव ने भी जल संसाधनों के संरक्षण को कमजोर किया है" रुचि श्री, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, भागलपुर विश्वविद्यालय

इस इलाके में सबमर्सिबल पंपों का अत्यधिक उपयोग इस बात का संकेत है कि सतही जल स्रोत अब भरोसेमंद नहीं रह गए हैं।

देश की सबसे खराब श्रेणी में चंदन डैम

केंद्रीय जल आयोग के 19 मार्च 2026 के साप्ताहिक बुलेटिन के मुताबिक चंदन डैम की स्थिति देश के 166 प्रमुख जलाशयों में सबसे खराब श्रेणी में है। इसकी लाइव क्षमता 0.136 अरब घन मीटर है, लेकिन वर्तमान लाइव स्टोरेज महज 0.001 अरब घन मीटर रह गया है यानी लाइव क्षमता का मात्र 0.76 प्रतिशत।

सामान्य स्टोरेज (पिछले 10 वर्षों का औसत) का यह 2.44 प्रतिशत है। पिछले सप्ताह की तुलना में स्थिति और बिगड़ गई है। यह डैम उन 6 जलाशयों में शामिल है जिनकी स्टोरेज सामान्य का 50 प्रतिशत या उससे भी कम है।

बिहार जल संसाधन विभाग के 25 मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार चंदन जलाशय की कुल क्षमता 1,10,000 एकड़-फीट है, लेकिन वर्तमान में सिर्फ 269 एकड़-फीट पानी बचा है यानी 0.24 प्रतिशत। जल स्तर 440 फीट पर है जबकि पूर्ण स्तर 500 फीट है। पिछले साल इसी दिन डैम पूरी तरह सूखा था। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि रबी की सिंचाई के लिए पानी नाममात्र भी नहीं बचा है।

सरकार का बयान

सरकार की ओर से 27 फरवरी 2025 को NIT No. 03/2024-25 जारी किया गया था। इसमें 10 वर्षों तक चंदन जलाशय की ड्रेजिंग का काम स्व-वित्तपोषित आधार पर निजी ठेकेदार को सौंपा जाना था। अनुमानित राजस्व 75.36 करोड़ रुपए था। ठेकेदार को 216 हेक्टेयर डूब क्षेत्र में 4 मीटर गहराई तक गाद निकालने की अनुमति था। निकाली गई गाद से बालू अलग करके उसका वाणिज्यिक उपयोग करने और रॉयल्टी चुकाने का प्रावधान था।

बांका के जिलाधिकारी नवीन शुक्ला ने डाउन टू अर्थ से बात करते हुए बताया कि चंदन जलाशय के ड्रेजिंग कार्य को लेकर फिलहाल मामला न्यायिक प्रक्रिया में है। इस विषय पर मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में लंबित है। जब तक वहां से निर्णय नहीं आ जाता, तब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकती।

याचिका में कहा गया है कि कि सरकार ने रेत खनन के लिए टेंडर तो निकाल दिया लेकिन इस साइट को रेत खनन के साइट के रूप में चिन्हित ही नहीं किया है।

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