मेट्रो के खंभों में उलझी आदि गंगा की मूल धारा। फोटो: सुचित्रा राय
मेट्रो के खंभों में उलझी आदि गंगा की मूल धारा। फोटो: सुचित्रा राय

आदि गंगा: एक मरती नदी की व्यथा कथा !

भगीरथ की मोक्षदायिनी गंगा की मूल धारा आदि गंगा आज औपनिवेशिक इंजीनियरिंग, बेतरतीव शहरी फैलाव, सांस्कृतिक विस्मृति और मेट्रो के खम्भों के बीच उलझ कर रह गई है
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पिछले जनवरी में कोलकाता प्रवास के दौरान बाँसद्रोणी जाने के क्रम में मेरा सामना एक ऐसी कड़वी हकीकत से हुआ जो आधुनिक भारत के शहरी 'विकास' के पीछे छिपे विनाश की गवाही दे रही थी।  जहाँ एक तरफ अत्याधुनिक मेट्रो ट्रेन कंक्रीट के खंभों पर सरपट दौड़ रही थी, और ठीक उसके नीचे काले, गाढ़े और बदबूदार पानी का एक संकरा प्रवाह था. स्थानीय लोगो से पता चला कि जिसे मैं एक 'गंदा नाला' समझ रहा हूँ, उसका नाम  'आदिगंगा' है, मोक्षदायणी गंगा की प्राचीन (आदि) मुख्य धारा! वही नदी जो हजारो सालो से आस्था का केंद्र रही और जिसके किनारे कभी इस शहर की नींव रखी गयी थी, आज एक बजबजाते नाले में बदल चुकी है, जिसको स्थानीय लोग टॉली नाला कहते हैं। 

हालांकि, नाला शब्द का मूल अर्थ गंदगी से नहीं जुड़ा है। एक प्राकृतिक ढांचा जो बरसात के पानी की निकासी के लिए उपयोग में आता है। लेकिन हमारे विकास के नाम पर की गई लापरवाहियों और जल संसाधनों के दुरुपयोग ने इस शब्द के अर्थ को बदलकर गंदगी और सड़ांध का पर्याय बना दिया है। यहाँ केवल भाषा नहीं बदली, बल्कि नदी-पानी के साथ हमारी अंतर्संबंध भी बदल चुकी है। यह केवल एक नदी के लुप्त होने की ही कहानी नहीं है, बल्कि यह एक इतिहासिक दास्तवेज है  जहाँ प्रकृति के बदलावों और इंसान की ‘शहरी’ और 'इंजीनियरिंग' की भूख ने मिलकर एक जीवित सभ्यता के वाहक को सीवेज लाइन में तब्दील कर दिया। यह कहानी केवल कोलकाता के आदि गंगा की ही नहीं बल्कि दिल्ली के यमुना की, वडोदरा के विश्वामित्री की, चेन्नई के अडियार की, पुणे के मुला-मुठा की, भारत के अधिकांश शहरो की आधार रही उन तमाम नदियों की कहानी है जो अब उन्ही शहरो की बलि चढ़ रही है।  

आदिगंगा का पौराणिक और सांस्कृतिक वैभव

आदि गंगा महज पानी की एक धारा नहीं, बल्कि बंगाल की 'पवित्र भूगोल' का केंद्र रही है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर उतारा, तो कपिल मुनि के आश्रम की ओर बढ़ते हुए गंगा कई धाराओं में बंट गई। आदिगंगा को ही वह 'असली' धारा के रूप में मानी जाती है, जिसने भगीरथ के पूर्वजों की राख को छूकर उन्हें मोक्ष दिया।

यही कारण है कि बंगाल के मध्यकालीन साहित्य, जैसे बिप्रदास पिपलई की 'मनसामंगल', मुकुंदराम चक्रवर्ती की 'चंडीमंगल', कृष्णराम दास की ‘रायमंगल’, अयोध्या राम की ‘सत्यनारायण कथा’, हरिदेब की सीतामंगल आदि रचनाओं में आदि गंगा जो गंगा की मुख्य धारा है, के भूगोल के साथ साथ गौरवशाली धार्मिक और सांस्कृतिक सन्दर्भ मिलता है।

वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु की यात्राओं में भी इसी धारा से गुजरने का वर्णन आता है; आज भी उनकी स्मृति में जिस स्थान को वैष्णवघाटा कहा जाता है, वह आदिगंगा के तट से ही जुड़ा हुआ है।  मृतप्राय हो चुके नदी के किनारे एक शक्तिपीठ के रूप में कालीघाट मंदिर आज भी एक प्रमुख तीर्थ है। श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों का श्राद्ध और दाह संस्कार करते हैं और आस्था की डुबकी लगाते हैं, क्योंकि भले ही गंगा की मुख्य धारा आज हुगली के रूप में बह रही हो, पर लोकमान्यता में आदिगंगा को ही मूल धारा माना जाता है। 

टेकटोनिक शिफ्ट: आदि गंगा के पतन की शुरुआत 

गंगा की मुख्य धारा के मृतप्राय हो जाने के पीछे बेतरतीब शहरीकरण के साथ साथ लगभग पिछले पांच सौ सालो का क्षेत्रीय और व्यापक स्तर के भूगर्भीय बदलाव भी शामिल रहे है। जिसकी कहानी कोलकाता से तीन सौ किलोमीटर उत्तर ‘गिरिया’ से शुरू होती हैं, जहां से 16वीं शताब्दी के उतरार्ध तक गंगा की मुख्य धारा भागीरथी के रूप में दक्षिण में प्रयाण करती थी, और एक छोटी धारा पद्मा के रूप पूरब की ओर (जो अब बांग्लादेश है) बह निकलती थी।

भागीरथी नदी दक्षिण में जलंगी नदी से मिलने के बाद तीन अलग-अलग धाराओं सरस्वती (पश्चिम), हूगली (मध्य), जमुना-बिद्याधरी (पूरब) के रूप में बह निकलती है, जिसे बंगाल की त्रिबेणी कहा जाता है। प्रयागराज के त्रिवेणी के उलट जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है, जिसे 'युक्त वेणी' कहा जाता है, बंगाल के इस त्रिबेणी को 'मुक्त वेणी' कहा जाता है, क्योंकि यहां से तीन धाराएं अलग अलग मुक्त होती हैं।

सोलहवीं शताब्दी के आखिरी में बंगाल बेसिन में एक बड़ा टेक्टोनिक शिफ्ट हुआ, जिसके कारण डेल्टा का पश्चिमी हिस्सा (जहाँ कोलकाता स्थित है) थोड़ा ऊपर उठ गया और पूर्वी हिस्सा (वर्तमान बांग्लादेश) धंस गया। इस 'ईस्टवर्ड शिफ्ट' के कारण गंगा भागीरथी, हुगली-आदिगंगा और अन्य पश्चिमी धाराओं को आंशिक रूप में छोड़कर पूर्व की ओर मुख्य रूप से 'पद्मा' नदी से होकर बहने लगी।

इससे बंगाल का पश्चिमी हिस्सा जो उस समय तक सरस्वती पर स्थित नदी बन्दरगाहो के कारण समुद्री व्यापार का केंद्र था, पानी में बहाव के कमी और नदी में गाद जमा हो जाने के कारण बड़े स्तर पर प्रभावित हुआ।

ऐतिहासिक रूप से, हुगली-आदि गंगा ना हो के सरस्वती नदी ही बंगाल की मुख्य व्यापारिक धमनी थी, जिस पर 'सप्तग्राम' जैसा समृद्ध पत्तन फला-फूला।आदिगंगा, जो कभी लहरें मारती नदी थी, अब केवल मानसून के पानी पर निर्भर रहने वाली एक 'स्पिल चैनल' बनकर रह गई। 

औपनिवेशिक दबाव और 'काटा गंगा'

धीरे धीरे घट रहे पानी का प्रभाव भागीरथी और सरस्वती नदी से होके आदि गंगा पर पड़ने वाला था, जिसमें केवल प्रकृति ही नहीं,नहीं, इंसानी हस्तक्षेप का भी बड़ा हाथ रहा। टेक्टोनिक शिफ्ट के पहले तक सरस्वती नदी का जलमार्ग गहरा होने के कारण ताम्रलिप्ति के जगह सप्तग्राम बहुत व्यस्त और समृद्ध पोर्ट के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था जिसे पुर्तगालीयो ने 'पोर्तो पेकेनो' (छोटा बंदरगाह) का नाम दिया था।

लेकिन टेक्टोनिक शिफ्ट के बाद पानी के बहाव में कमी के कारण सरस्वती नदी धीरे-धीरे गाद से भरने लगी. बड़े जहाज अब सप्तग्राम तक नहीं जा पा रहे थे, इसलिए पुर्तगाली व्यापारियों ने सरस्वती नदी में ही काफी नीचे 'बेतड़' पत्तन का उपयोग शुरू किया, जहाँ से माल छोटी नावों के जरिए सप्तग्राम भेजा जाता था। 

सरस्वती नदी के व्यापारिक मार्ग को गाद से बचा कर सुचारू रखने के लिए अठारहवीं शताब्दी के मध्य  (1739 और 1756 के बीच कभी) नवाब अलीवर्दी खान के शासनकाल में डच इंजीनियरों की सहायता से हावड़ा के संकरैल के पास हुगली जो उस समय आदि गंगा के रास्ते बहती थी, को सरस्वती के निचले और गहरे हिस्से से जोड़ने के लिए इस धारा को काटा गया। इस मानव-निर्मित नहर  को 'काटा गंगा' कहा गया। 

इस हस्तक्षेप के कारण धीरे धीरे सरस्वती नदी से होते हुए यही धारा हुगली की मुख्य धारा बन गई और पहले से ही पानी की कमी झेल रही गंगा की मुख्य धारा आदिगंगा को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया। इस प्रकार औपनिवेशिक ताकतों के प्रभाव में और समुद्री व्यापर को सुनिश्चित करने के दबाब में आदि गंगा सूखती और सिकुड़ती चली गयी।   

औपनिवेशिक इंजीनियरिंग: टॉली नाला

'काटा गंगा' प्रकरण के कुछ सालो बाद ही बाद हुगली का सारा पानी अब सीधे सरस्वती की निचली धारा के रास्ते समुद्र में मिलने लगी और आदि गंगा पानी कमी के कारण तेजी से सिकुड़ने लगती है जिसका जिक्र भारत के पहले सर्वेयर जनरल जेम्स रेंनेल अपने सर्वे में इसे बस एक फेंटलाइन के रूप में दर्शाते है।

1775-1777 के बीच, ईस्ट इंडिया कंपनी के मेजर विलियम टॉली ने व्यापारिक लाभ के लिए आदिगंगा की पुरानी धारा के कुछ भाग (हेस्टिंग्स से गरिया तक) और वहा से सामुकपोता तक नहर खुदवाई ताकि इसका उपयोग सुंदरबन तक के लिए एक व्यापारिक मार्ग के रूप में हो सके, जिसे 'टॉली नाला' का नाम दिया गया।

इस प्रकार 15 किलोमीटर लम्बी नहर के सहारे आदि गंगा जो गरिया से दक्षिण की तरफ मुड के बरुइपुर, सुर्यापुर, मागरा से होकर पानी के विस्तृत विन्यास के हिस्सेके रूप में सागर द्वीप के पास समुद्र में मिल जाती थी, अब उसके एक हिस्से का प्रवाह सुन्दरवन की ओर प्रवाहित होने वाली विद्याधरी नदी तक हो गया।

अगले कुछ दशकों के लिए आदि गंगा के दिन बहुरते है और यह जल परिवहन खास कर छोटे नाव के माध्यम से स्थानीय व्यापर का केंद्र बन जाती है। इस प्रकार जल परिवहन को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए आदिगंगा के रख रखाव पर सरकारी कृपा बनी रही।

यह अंग्रेजी हुकूमत के शुरुवाती दौर की बात थी जब कोलकाता और आसपास के व्यापक रूप से फैले क्रीक, नदी नालों को जल परिवहन के लिए विकसित किया गया, पर कुछ दशकों में ही अंग्रेजों ने जलमार्गों के बजाय पहले सड़क और उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में रेलवे को प्राथमिकता देनी शुरू की।

नतीजतन आदिगंगा के रास्ते व्यापार कम हुआ और अंततः नदी के रखरखाव में निवेश पूरी तरह बंद हो गया. धीरे-धीरे, ज्वार के साथ आने वाली गाद ने इसे और भी उथला बना दिया। इस प्रकार आदिगंगा एक बार फिर नेपथ्य में चली गयी।

आदि गंगा की सांस्कृतिक स्मृति

उन्नीसवी शताब्दी के उतरार्ध में मृतप्राय आदि गंगा को स्थिति को ब्रिटिश अधिकारी विलियम विलसन हंटर 'ए स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ बंगाल' (1875) में दर्ज करते है।  तब तक प्रवाह विहीन नदी सूख कर केवल छोटे पोखरों या 'डोबा' की एक श्रृंखला भर रह गई थी।

हालांकि नदी में कोई बहाव नहीं थी फिर भी स्थानीय लोगो के बीच गंगा की मुख्य धारा के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आई थी और अपने मृतकों को नदी की सूखी पेटी में ही अंतिम संस्कार की परम्परा बनी रही, क्योंकि उनकी मान्यता में यही 'मूल' गंगा थी, जिसके किनारे जलाए जाने से मोक्ष मिलता है।

हंटर से लगभग सौ साल पहले भी एक स्थानीय पुजारी के हवाले सूख रही आदि गंगा को ही गंगा की मुख्य धारा मानने की मान्यता का जिक्र तब के अंग्रेजी सरकार के नुमाइंदे जॉन जे होलवेल भी करते है।  

बाद में नदी की पेटी में स्थानीय जमींदार परिवार धार्मिक आस्था के अनुरूप अपने अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए डोबा आरक्षित करने लगे, जिसमे कुछ् का अस्तित्व नदी के बरुइपुर, सुर्यापुर वाले रास्ते में डोबा की एक विस्तृत श्रृंखला के रूप में आज भी बचा हुआ है, जैसे करेर गंगा, धोषेर गंगा, मित्रो गंगा, यहाँ  तक इन तालाबो के नाम के साथ गंगा नाम आज भी चलन में है, जो गंगा की मुख्य धारा के साथ सांस्कृतिक स्मृति का भान कराती है।   

आधुनिक भारत: कंक्रीट के खंभों उलझी नदी

आजादी के बाद मुख्यतः अनियोजित शहरीकरण, प्रशासनिक उदासीनता और सामाजिक-पर्यावरणीय असंतुलन के कारण आदिगंगा की स्थिति बिगडती चली गई।  कोलकाता शहर के फैलाव और नदी तटों पर अवैध कब्जे, झुग्गी-बस्तियों का विस्तार ने गंगा की इस पवित्र धारा को 'वेस्ट डंपिंग ग्राउंड' में बदल दिया। 

तकनीकी व्यवस्थाओं की कमी, जैसे उचित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का अभाव और पुरानी जल-निकासी प्रणाली का रखरखाव न होना और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों ने स्थिति को और गंभीर बनाता गया।

टॉलीगंज से गरिया के बीच मेट्रो रेलवे के विस्तार की योजना बनी, तो पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बावजूद, नदी के सीने पर मेट्रो के 300 कंक्रीट के खंभे गाड़ दिए गए। 

फोटो: सुचित्रा राय
टॉलीगंज से गरिया के बीच मेट्रो रेलवे के विस्तार की योजना बनी, तो पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बावजूद, नदी के सीने पर मेट्रो के 300 कंक्रीट के खंभे गाड़ दिए गए। फोटो: सुचित्रा राय

हालाकि बीच-बीच में नदी के बचाव के लिए भी प्रयास होते रहे, पर विभिन्न सरकारी योजनाएँ, सीवेज ट्रीटमेंट परियोजनाएं और सफाई अभियान अक्सर तकनीकी समाधान तक सीमित रहे, जिनमें नदी को एक जीवंत सामाजिक-पर्यावरणीय तंत्र के रूप में समझने के बजाय मात्र एक “ड्रेनेज चैनल” मान लिया गया।

कई बार पुनरुद्धार के नाम पर बुनियादी ढाँचा निर्माण, अतिक्रमण हटाने या “सौंदर्यीकरण” पर जोर दिया गया, जो वास्तव में नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित करने के बजाय शहरी विकास के हितों को साधने का माध्यम बन गया। नदी के साथ की स्थानीय समझ और सांस्कृतिक संबंधों की उपेक्षा ने आदि गंगा के पुनर्जीवन के प्रयासों को कमजोर किया।

नब्बे के दशक में बड़े स्तर पर नदी से गाद हटाने के बाद नदी में थोड़ा बहुत बहाव वापस आया पर नयी सदी के शुरुवात तक नदी मेट्रो के कुचक्र में फंस गयी। साल 2001 में, जब टॉलीगंज से गरिया के बीच मेट्रो रेलवे के विस्तार की योजना बनी, तो पर्यावरणविदों के भारी विरोध के बावजूद, नदी के सीने पर मेट्रो के 300 कंक्रीट के खंभे गाड़ दिए गए।

इन खंभों ने कभी 75 किलोमीटर लंबी रही नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया और आदि गंगा कोलकाता में अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव से दूर, एक अवरुद्ध और प्रदूषित प्रवाह के रूप में सीमित रह गई है।

क्या आदि गंगा की मुक्ति संभव है?

आज आदिगंगा सूख रही, इसमें से जीवन के निशान धीरे धीरे खत्म हो रहे है, इसके पुनर्जीवन के नाम पर हजारों करोड़ खर्च कर हम तथाकथित आधुनिक शहर के लिए जरुरी हित साध रहे है। एक बार फिर नेशनल क्लीन गंगा मिशन नदी को पुनर्जीवन के 650 करोड़ की राशि के प्लान के साथ हाज़िर है।

एक बार फिर बंगाल के चुनाव में सभी पार्टियों के आदि गंगा के कायाकल्प के वादे गूंज रहे है। पर हम नदी को एक जीवित पारिस्थितिक तंत्र मान कर और उसके ऐतिहासिक-सांस्कृतिक और जलसमाज वाले पहलू को देखे बिना बस  शहरी अपशिष्ट वहन करने वाली धारा के सौदर्यीकरण से आगे अब भी सोच नहीं पा रहे है। 

आदिगंगा की यह व्यथा केवल एक भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभूतपूर्ण क्षरण है।  जिन नदी ने सदियों तक हमें व्यापारिक संपन्नता और आध्यात्मिक शांति दी, उसे हमने अपने 'विकास' की वेदी पर चढ़ा दिया।  रेंनेल और हंटर के नक्शों में और मनसामंगल, चंडीमंगल और श्चैतन्य महाप्रभु की यात्रा वाली नदी कभी 'पवित्र धारा' थी, आज वह हमारे शहरी लालच के स्मारक के रूप बच गयी है। हम देख ही नहीं पा रहे है कि कैसे फैलते शहर अपनी ही नदियों को निगल रही हैं!  क्या हम अपनी अगली पीढ़ियों को यह बताने की हिम्मत जुटा पाएंगे कि जिसे वे 'नाला' कह रहे हैं, वह कभी 'आदिगंगा' थी?

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