लखनऊ में कुकरैल नदी से पानी मिलने के बाद गोमती नदी की स्थिति
लखनऊ में कुकरैल नदी से पानी मिलने के बाद गोमती नदी की स्थितिफोटो : वेंकटेश दत्ता

नदी की जमीन पर शहर, फिर बाढ़ पर मातम 

लखनऊ में बाढ़ प्लानिंग की नाकामी है, नदी की नहीं
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लखनऊ में जब भी शहरी बाढ़ आती है, तो वही पुरानी बातें दोहराई जाती हैं: बेतहाशा बारिश, जलवायु परिवर्तन, नालों का ओवरफ्लो होना और गोमती नदी का अतिरिक्त पानी न संभाल पाना। ये बातें मायने तो रखती हैं, लेकिन इनसे पूरे संकट को नहीं समझा जा सकता। ज्यादा परेशान करने वाला सवाल यह है कि हमने नदी, उसके फ्लडप्लेन और शहर के प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम के साथ क्या किया है? नदी और उसका फ्लडप्लेन कोई ऐसी खुली जगह नहीं है जिसे हर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल किया जा सके। यह एक जरुरी हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम है। बाढ़ के पानी को जगह चाहिए होती है, और प्रकृति  यह जगह फ्लडप्लेन, वेटलैंड्स और आपस में जुड़े ड्रेनेज नेटवर्क के ज़रिए देती है। जब इन ज़रूरी जगहों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है या उन्हें टुकड़ों में बांट दिया जाता है, तो बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है और उसके नतीजे ज़्यादा गंभीर होते हैं। हम किसी शहर के प्राकृतिक बाढ़-प्रबंधन सिस्टम को बर्बाद करके बारिश को दोष नहीं दे सकते।

गोमती नदी हज़ारों सालों से बहती आ रही है। इसके किनारे (टेरेस), फ्लडप्लेन, तालाब, वेटलैंड्स और ड्रेनेज नेटवर्क पानी को ले जाने और जमा करने के लिए प्रकृति ने बनाये थे। फिर भी, नई बस्तियों और टाउनशिप डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स ने धीरे-धीरे इन ज़रूरी जगहों पर कब्ज़ा कर लिया और उन्हें टुकड़ों में बांट दिया। गोमती नदी लखनऊ, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर, सीतापुर और हरदोई समेत कई ऊपरी इलाकों के लिए मुख्य ड्रेनेज चैनल का काम करती है। इसमें 185 सहायक नदियां मिलती हैं, जिनमें से 35 बड़ी धाराएं हैं। पहले, लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी (LDA) और सिंचाई विभाग ने नदी के किनारों पर को तटबंध बनाए, जिससे कई प्राकृतिक नाले बंद हो गए। फिर शहर में बंधे के अंदर कंक्रीट के रिवरफ्रंट बनाये गये। नदी को पानी ले जाने और बहाने के लिए जगह चाहिए; यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो इकोसिस्टम सेवाओं के ज़रिए अप्रत्यक्ष रूप से अरबों रुपयों का आर्थिक लाभ देती है। 

बागों के अलावा, लखनऊ को झीलों और तालाबों का शहर भी कहा जा सकता है। रेवेन्यू डिपार्टमेंट और ज़िला प्रशासन के पास सैकड़ों छोटी-बड़ी झीलों का रिकॉर्ड है। इनमें से ज़्यादातर झीलें गोमती और उसकी सहायक नदियों के नेटवर्क से जुड़ी थीं, जो साल भर नदी को पानी देती थीं। चूंकि गोमती बारिश और ज़मीन के नीचे के पानी से भरने वाली नदी है, इसलिए नदी में साल भर पानी का बहाव बनाए रखने में इन जल-स्रोतों की बड़ी भूमिका थी। हालांकि, शहरीकरण की वजह से इन झीलों पर सबसे बड़ा संकट आया है। सुनियोजित विकास भी उन झीलों और तालाबों को खत्म कर रहा है जो गोमती नदी में पानी का बहाव बनाए रखने में मदद करते हैं।

लखनऊ के उत्तरी छोर पर महोना समुद्र तल से 415 फीट ऊपर है, जबकि दक्षिण-पूर्वी छोर पर नगराम 372 फीट पर है। दक्षिणी हिस्से में स्थित आलमबाग 394 फीट पर है। उत्तर और दक्षिण के बीच लगभग 43 फीट की ढलान है। इसलिए, पानी को मुख्य ड्रेन तक ले जाने के लिए, दक्षिणी लखनऊ के मोहनलालगंज और सरोजिनीनगर ब्लॉक में प्राकृतिक नालों का एक बड़ा नेटवर्क था। दक्षिण-पूर्वी हिस्सा नीचे होने के कारण जल-जमाव भी होता है। मोहनलालगंज में कई झीलें और तालाब हमेशा पानी से भरे रहते थे। भादो के महीने में यहाँ जल विहार उत्सव मनाया जाता था - तालाबों पर नौका-विहार और संगीत कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे।

सई नदी की दो मुख्य सहायक नदियाँ, बख और नगवां, 1980 के दशक की शुरुआत तक दक्षिणी लखनऊ का पानी बहाकर ले जाती थीं। अब ये नदियाँ मौजूद नहीं हैं – ये कई टुकड़ों में बँट गई हैं, और अब सीवेज ले जाने वाले नालों में बदल गई हैं। मोहनलालगंज में हुलासखेड़ा की करेला झील से दक्षिण-पूर्व की ओर झीलों की एक लंबी श्रृंखला दिखाई देती थी जो नगराम तक फैली हुई थी। इसके बिल्कुल पश्चिमी छोर पर बख नदी बहती थी जो मोहनलालगंज होते हुए नगराम में प्रवेश करती थी। अब इस नदी के बारे में कोई नहीं जानता; इसे 'किला मोहम्मदी नाला' नाम दिया गया है, क्योंकि इसका फीडर स्रोत आशियाना में एक बड़ी झील थी - जो अब मौजूद नहीं है। हज़ारों एकड़ ज़मीन में फैले खेतों की सिंचाई बख नदी से होती थी। जबरौली और सिसैंडी में दो बड़ी झीलें थीं, जिनके किनारों पर धान की खेती होती थी। 

महोना, माल और मलिहाबाद में ढाक के घने जंगल हुआ करते थे। गोमती नदी और उससे जुड़ने वाली तीन नदियाँ - बेहता, झिलिंगी और अकरद्दी - इन्हीं जंगलों से होकर बहती थीं। महोना से घास को नावों पर लादकर गोमती नदी के रास्ते लखनऊ लाया जाता था, जिसका इस्तेमाल चारे के तौर पर होता था। महोना के 80 प्रतिशत खेतों की सिंचाई तालाबों और झीलों से की जाती थी। वहाँ इतना पानी था कि 20वीं सदी की शुरुआत में ज़मीन को 16 से 20 फ़ीट खोदने पर ही ज़मीन के नीचे पानी निकलने लगता था। मलिहाबाद के अटरिया और मांझी गाँव गोमती के खादर (बाढ़ वाले मैदानी इलाके) में बसे थे और अक्सर बाढ़ के समय पानी में डूब जाते थे। मलिहाबाद के बीच में, दो छोटी धाराएँ अकरद्दी- और झिलिंगी (या झिंगी) - गोमती नदी में मिलती हैं।

तटबंधों के बीच कम से कम कितनी दूरी हो, यह तय करते समय नदी के सबसे ज़्यादा बहाव (पीक डिसचार्ज ) और पानी ले जाने की क्षमता को आधार बनाना चाहिए, न कि इस बात को कि रियल एस्टेट और रिहायशी बस्तियों के लिए नदी से कितनी ज़मीन ली जा सकती है। फैज़ुल्लागंज, मांझी और बख्शी-का-तालाब  जैसे ऊपरी इलाकों में बाढ़ का मुख्य कारण बाढ़ के मैदान में होने वाली विकास गतिविधियां हैं, खासकर तटबंध और रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट (जो असल में ज़मीन पर कब्ज़ा या अतिक्रमण हैं)। इन गतिविधियों ने बाढ़ के पानी के बहाव के लिए उपलब्ध जगह को कम कर दिया है; यह कोई प्राकृतिक बाढ़ की घटना नहीं है। फिर भी, अजीब बात है कि इंसानों द्वारा पैदा की गई इस बाढ़ की स्थिति के बावजूद, और तटबंध बनाने की मंज़ूरी दे दी गई है। इसके बाद, इस तरह हासिल की गई ज़मीन का इस्तेमाल रियल एस्टेट, पार्क या कमर्शियल ज़ोन के लिए किया जायेगा।  

हाल के सालों में, कई छोटी जलधाराओं पर कब्ज़ा किया गया है या उन्हें टुकड़ों में बांट दिया गया है, जिससे कम समय की बारिश में भी बाढ़ आ जाती है। हमारे शोध से पता चला है कि लखनऊ की 70 प्रतिशत से ज़्यादा झीलों और तालाबों पर कब्ज़ा हो चुका है, फिर भी लैंड अथॉरिटी ज़्यादातर महंगे कमर्शियल इलाकों और अपार्टमेंट्स पर ही ध्यान दे रही है। LDA ने कई हाउसिंग कॉलोनियां और बड़े डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की योजना बनाई है, लेकिन शहर भर में सैकड़ों अनधिकृत और बिना योजना वाली बस्तियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। तालाबों और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) पर कब्ज़ा किया गया है, जबकि पानी की प्राकृतिक निकासी के रास्तों को रोक दिया गया है या संकरा कर दिया गया है। यह सिर्फ़ शहरी डिज़ाइन की विफलता नहीं है; यह ज़मीन के इस्तेमाल के नियमों, उनके लागू होने और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।


अक्टूबर 2026 की बाढ़

लखनऊ में अक्टूबर 2026 की बाढ़ कई महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं।  लखनऊ के अधिकांश इलाके सूखे रहे, जबकि नदी के सीमित कॉरिडोर के अंदर पानी जमा हो गया। पानी का बहाव 2008 की बाढ़ की तुलना में काफी कम था, फिर भी इससे 1,00,000 से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए और 40,000 घर आंशिक रूप से जलमग्न हो गए। ऐसे पैटर्न फ्लडप्लेन इंजीनियरिंग, तटबंधों, सड़कों और पानी की निकासी की व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं।  पहले आई बाढ़ की तुलना में, लखनऊ में अक्टूबर 2026 की बाढ़ कई मायनों में अनोखी है। यह बाढ़ लखनऊ में बारिश की वजह से नहीं, बल्कि ऊपरी इलाकों के ज़िलों - पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, शाहजहांपुर और सीतापुर - में बारिश की वजह से आई। सहायक नदियों से आए पानी की वजह से गोमती नदी का जलस्तर धीरे-धीरे  लेकिन लगातार बढ़ता गया। बारिश के लगभग एक हफ़्ते बाद, 2 अक्टूबर से पानी का स्तर बढ़ना शुरू हुआ और इसका असर दिखाई देने लगा। 


7 अक्टूबर 2026 को, हनुमान सेतु पर पानी का बहाव लगभग 25,000 क्यूसेक था और जलस्तर 107.30 मीटर था, जो 108.50 मीटर के चेतावनी स्तर से लगभग एक मीटर नीचे था। हालाँकि, यह पानी फ़ैज़ुल्लागंज, घैला, मामा कॉलोनी, दाऊद नगर, मिल्लत नगर, जेहता, सैथा, हयात नगर, मुन्ना लाल खेड़ा, उमराई खेड़ा और लोहरामऊ जैसी निचले इलाकों की बस्तियों में बाढ़ लाने के लिए काफ़ी था। ये बस्तियाँ गोमती के खादर क्षेत्र में स्थित हैं, जहाँ समय-समय पर आने वाली बाढ़ से ये प्रभावित होती रहती हैं। ज़िला प्रशासन ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में लोगों को लाने-ले जाने और राहत सामग्री पहुँचाने के लिए 52 नावें तैनात कीं। LDA ने एकाना स्टेडियम, फीनिक्स पैलेसियो मॉल और गोमती नगर एक्सटेंशन के सेक्टर 7 के आस-पास पानी निकालने और राहत का काम तेज़ कर दिया, जहाँ तटबंधों से गोमती का पानी घुस गया था। पानी निकालने के लिए 30 से ज़्यादा पंप लगाए गए। लंबे समय तक पानी का जमा रहना कई वजहों का मिला-जुला नतीजा है - जिसमें प्राकृतिक बाढ़ के मैदानों पर कब्ज़ा सबसे बड़ी वजह है। गोमती के सक्रिय बाढ़ के मैदान पर कई प्रोजेक्ट बन गए हैं, जिससे नदी के किनारों तक फैलने की प्राकृतिक क्षमता में रुकावट आती है और चैनल के अंदर पानी का स्तर बढ़ जाता है।


पहले, हम पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट डालते हैं; फिर हम इसके नतीजों को पंपिंग से दूर करने में बहुत सारा पैसा खर्च करते हैं। कई पंपिंग स्टेशनों के अलावा, एलडीए ने आईआईएम रोड और किसान पथ के बीच तटबंध वाली नदी के किनारे 12 और पंपिंग स्टेशन बनाने का प्रस्ताव दिया है। अंडरपास और निचले इलाकों में पंपिंग स्टेशन ज़रूरी हो सकते हैं, लेकिन शहर को बारिश का पानी निकालने के लिए बिजली या डीजल की ज़्यादा खपत करने वाले पंपों पर क्यों निर्भर रहना पड़ रहा है, जबकि यह पानी कभी प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों से बहता था? जल निकासी के रास्तों पर बनी सड़कें, बांध और तटबंध हाइड्रोलिक रुकावटें पैदा करते हैं। भारी बारिश के दौरान, इन बांधों के पीछे पानी जमा हो जाता है, ग्रेविटी से पानी का निकलना मुश्किल हो जाता है और पंपिंग ज़रूरी हो जाती है। पंपिंग स्टेशन पानी निकाल सकता है और जल-जमाव को कम कर सकता है। तटबंध पानी रोक सकता है। लेकिन इनमें से कोई भी नदी, वेटलैंड या बाढ़ के मैदान की जगह नहीं ले सकता। हर प्रस्तावित स्टेशन का मूल्यांकन उन सड़कों, तटबंधों और विकास कार्यों के हाइड्रोलिक प्रभावों के साथ किया जाना चाहिए जिनकी वजह से पंपिंग ज़रूरी हो जाती है।

लखनऊ में आई ऐतिहासिक बाढ़

आइए, लखनऊ में पहले आई ऐतिहासिक बाढ़ के बारे में जानते हैं। शहर ने 1854, 1870, 1871 और 1891 में बड़ी बाढ़ देखी। 1871 में बारिश के दौरान, लखनऊ रेलवे ब्रिज के पास नदी 180 मीटर चौड़ी और 12.5 मीटर गहरी थी। पानी 5.8 किमी/घंटा की रफ़्तार से बह रहा था और इसका बहाव 34369 क्यूबिक फ़ीट प्रति सेकंड (क्यूसेक) था। फिर 1894 में रिकॉर्ड तोड़ बाढ़ आई, जब 13 सितंबर को लखनऊ में गोमती नदी का जलस्तर सामान्य अधिकतम बाढ़ स्तर (108.81 मीटर) से 2.13 मीटर ऊपर चला गया। अधिकतम बहाव 234000 क्यूसेक था, जो 7 अक्टूबर 2026 को दर्ज किए गए बहाव से लगभग दस गुना ज़्यादा था। नदी के किनारे की सड़कें पूरी तरह डूब गई थीं और पानी का स्तर छतर  मंज़िल के बॉलरूम फ्लोर से एक फ़ीट ऊपर था। 1894 के बाद इतनी बड़ी बाढ़ कभी नहीं आई। 1894 की बाढ़ लखनऊ और नदी के ऊपरी इलाकों में 5, 6 और 7 सितंबर को लगातार हुई बारिश का नतीजा थी।

1923 में, लखनऊ में एक और रिकॉर्ड तोड़ बाढ़ आई, जिससे कई निचले इलाकों की बस्तियाँ डूब गईं। गोमती नदी अपने किनारों से बाहर बहने लगी, जिससे पुराने शहर, सिविल लाइन्स और छावनी के कई हिस्से डूब गए। अधिकतम बहाव लगभग 75000 क्यूसेक था।

1960 की बाढ़ लखनऊ के इतिहास की सबसे भयानक बाढ़ों में से एक है। यह भी नदी के ऊपरी इलाकों में बहुत ज़्यादा बारिश के कारण आई थी। नदी में कई सहायक नदियों, जैसे सरायन, कठिना, कुकरैल और सई नदी से भी अतिरिक्त पानी आया था। अधिकतम बहाव 125000 क्यूसेक दर्ज किया गया था, जिससे शहर का लगभग आधा हिस्सा कई फ़ीट पानी में डूब गया था। लोग घरों की पहली मंज़िल तक ही सीमित हो गए थे और बचाव व आने-जाने के लिए नावों का इस्तेमाल किया गया। सेना की टुकड़ियों ने बाढ़ प्रभावित इलाकों में नावों से गश्त की और खाना व राहत का सामान बांटा।

लखनऊ में 1971 की बाढ़ रिकॉर्ड में तीसरी सबसे बड़ी बाढ़ थी, जिसमें पानी का बहाव 1,07,000 क्यूसेक था। 8 सितंबर 1971 को निचले इलाकों की बस्तियां पानी में डूबी हुई थीं। नदी का जलस्तर खतरे के निशान से लगभग 1.8 मीटर ऊपर चला गया था। बाढ़ का पानी शहर के कई हिस्सों में तीन से चार फीट तक भर गया, जिससे हज़रतगंज, नरही, डालीगंज और आस-पास के रिहायशी इलाके प्रभावित हुए। सरकार ने तटबंध में हुई टूट-फूट को ठीक करने और फंसे हुए लोगों को बचाने के लिए सेना को तैनात किया। 24 घंटे के भीतर 25,000 से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया और 18 राहत शिविरों में रखा गया। लोगों को निकालने, आने-जाने और राहत कार्यों में मदद के लिए हाथियों, नावों और हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल किया गया। बाढ़ से लखनऊ चिड़ियाघर के जानवरों पर भी खतरा मंडरा रहा था; कुछ जानवरों को ऊंचे चबूतरों पर पहुंचाया गया और रेत की बोरियों व बड़े पत्थरों से उनकी सुरक्षा की गई।

1985 की बाढ़ भी ऐतिहासिक थी, जब नदी का जलस्तर 109.50 मीटर तक पहुंच गया था और पानी का अधिकतम बहाव 74,000 क्यूसेक था।

2008 की बाढ़ अगस्त के आखिरी हफ्ते में आई थी। लखनऊ और नदी के ऊपरी इलाकों में भारी बारिश के कारण गोमती नदी का जलस्तर 8.5 मीटर के खतरे के निशान से ऊपर चला गया था। गौ घाट पर जलस्तर 109.97 मीटर दर्ज किया गया और पानी का अधिकतम बहाव 42,019 क्यूसेक था। 28 अगस्त को हनुमान सेतु पर जलस्तर 108.99 मीटर था, जिससे 1,00,000 से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए और कम से कम 15 लोगों की जान चली गई। लखनऊ की बिगड़ी जल निकासी व्यवस्था (ड्रेनेज सिस्टम) के कारण बाढ़ की स्थिति और खराब हो गई; यह व्यवस्था बारिश के पानी के बहाव को संभाल नहीं पाई, खासकर उन जगहों पर जहां प्राकृतिक जल निकासी के रास्तें बाद कर दिए गए थे और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) पर अतिक्रमण किया गया था।


बाढ़ के मैदान (फ्लडप्लेन) से जुड़ी नीति में विरोधाभास

यह समस्या सिर्फ़ लखनऊ तक ही सीमित नहीं है। 7 अगस्त 2026 को जल शक्ति मंत्रालय ने 'गंगा नदी (कायाकल्प, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण (दूसरा संशोधन) आदेश, 2026' जारी किया, जिसे 10 अगस्त को राजपत्र (गज़ट) में प्रकाशित किया गया। इस संशोधन में 'सक्रिय बाढ़ के मैदान' (एक्टिव फ्लडप्लेन) की श्रेणी जोड़ी गई, जिसे हर पाँच साल में आने वाली बाढ़ के आधार पर परिभाषित किया गया। साथ ही, बड़े बाढ़ के मैदान को सक्रिय, नियामक और चेतावनी वाले ज़ोन में बाँटा गया, जो 100 साल में आने वाली बाढ़ के दायरे तक फैले हुए हैं। इसमें संबंधित प्रावधानों से 'निर्माण-मुक्त क्षेत्र' ( कंस्ट्रक्शन फ्री जोन) का पहले वाला सन्दर्भ हटा दिया गया। ये बदलाव नदी के इलाके के भविष्य के संरक्षण और बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में विकास को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा करते हैं। निर्माण-मुक्त सुरक्षा के स्पष्ट नियम को हटाकर ज़ोन-आधारित नियमों पर निर्भर रहने से यह जायज़ सवाल उठता है कि नदी के संवेदनशील इलाकों को कितनी प्रभावी ढंग से बचाया जा सकेगा। ऐसे समय में जब शहरों में  वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) को रेस्टोर करने, जल निकासी प्रणालियों को सुरक्षित रखने और नदियों को पर्याप्त जगह देने की ज़रूरत है, निर्माण के ख़िलाफ़ स्पष्ट सुरक्षा उपायों को कमज़ोर करने से नीति उल्टी दिशा में जा सकती है।


गोमती नदी के मामले में यह चिंता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। नदी के इलाके में पहले ही शहरीकरण के कारण काफ़ी बदलाव हो चुके हैं, जिसमें रिवरफ्रंट डेवलपमेंट के ज़रिए इसके बाढ़ के मैदान के कुछ हिस्सों को सीमित करना भी शामिल है। प्राथमिकता बची हुई बाढ़ के मैदान को बचाने और जल-प्रवाह के प्राकृतिक जुड़ाव (हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टिविटी) को बहाल करने की होनी चाहिए, न कि निर्माण और दबाव बनाने की।


किसका विकास और किसकी कीमत पर?

लखनऊ विकास प्राधिकरण हाई-एंड अपार्टमेंट, कमर्शियल इलाके, सड़कें और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की योजना बनाने में सक्षम दिखता है। फिर भी, लखनऊ में बिना योजना के बस्तियाँ फैलती जा रही हैं, और अक्सर ऐसी जगहों पर जो संवेदनशील हैं। इसके नतीजे सबसे ज़्यादा निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को भुगतने पड़ते हैं, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके पास बाढ़ से उबरने के लिए सबसे कम संसाधन होते हैं। यह तर्क सिर्फ़ संवेदनशील समुदायों को दोष देने के लिए नहीं है। अधिकारियों को यह पता लगाना चाहिए कि ज़मीन पर किसका नियंत्रण है, कौन अवैध निर्माण को मंज़ूरी देता है या उसे होने देता है, कौन ज़मीन के इस्तेमाल का तरीका बदलता है, और कौन प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को खत्म होने देता है। अवैध कब्ज़े की समस्या का निष्पक्ष या प्रभावी ढंग से समाधान तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि इसे रोकने के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं की जाँच न की जाए।

सिर्फ़ ड्रेनेज सिस्टम ही  नहीं, बल्कि नदी को भी अपनी जमीन देना होगा 

लखनऊ को अपने बचे हुए तालाबों, वेटलैंड्स और प्राकृतिक ड्रेनेज चैनलों की पूरी लिस्ट और कानूनी सुरक्षा की ज़रूरत है। बाढ़ वाले इलाकों (फ्लडप्लेन) की पहचान विकास की सुविधा के बजाय हाइड्रोलॉजी, जियोमॉर्फोलॉजी, इकोलॉजी और पूर्व में आये बाढ़ के आधार पर होनी चाहिए। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी मिलने से पहले यह दिखाना होगा कि उनका बाढ़ के पानी के बहाव, ग्राउंडवाटर रिचार्ज और पानी जमा करने की क्षमता पर क्या असर पड़ेगा। शहर को गोमती रिवरफ्रंट, ग्रीन कॉरिडोर, तटबंधों, सड़कों और आसपास के शहरी विस्तार के मिले-जुले असर का भी आकलन करना चाहिए। किसी भी प्रोजेक्ट की जांच उस नदी सिस्टम से अलग हटकर नहीं की जानी चाहिए जिसे वह बदल रहा है। वेटलैंड्स और तालाबों पर कब्ज़ा, प्राकृतिक नालों का अतिक्रमण और फ्लडप्लेन ज़ोनिंग को नज़रअंदाज़ करना - ऐसे जोखिम पैदा कर रहा है जिनसे जान माल का नुकसान तो हो ही रहा है, इनसे निपटने में अब जनता का पैसा खर्च हो रहा है। 

हमारे सामने विकल्प साफ है: या तो पर्यावरण के लिहाज़ से गलत विकास के नतीजों से निपटने में पैसा खर्च करते रहें, या फिर उन प्राकृतिक सिस्टम को बहाल करें जिन्होंने सदियों से पानी के बहाव को नियंत्रित किया है। गोमती नदी लखनऊ में बाढ़ नहीं ला रही है। लैंड अथॉरिटी को यह मानना होगा कि उसके अपने विकास संबंधी फैसलों ने बाढ़ का खतरा बढ़ाया है। अगली बाढ़ को अचानक आई प्राकृतिक आपदा नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इसके असली कारण हमारी शहरी प्लानिंग और बाढ़ वाले इलाकों में कब्ज़े के रूप में साफ दिख रहे हैं।


(लेखक बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के पर्यावरण विज्ञान विभाग में प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)

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