कुसहा त्रासदी के 18 साल: कोसी पीड़ित अब भी बेघर, मुआवजा और न्याय से वंचित, सरकारी दावे बेनकाब
आज 18 अगस्त है, आज कुसहा त्रासदी के 18 वर्ष पूरे हो रहे हैं। आज ही के दिन वर्ष 2008 में कोसी नदी का पूर्वी तटबंध ( एफ्लस बांध) नेपाल के कुसहा में टूटने से कोसी क्षेत्र में भीषण त्रासदी आई थी। नेपाल से होकर बहने के बाद पानी भारत की सीमा पार कर गया बिहार में 15 से 20 किमी की चौड़ाई में बहने लगा।
यह पानी बाढ़ से सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों से गुजरते लगभग 150 किमी दूर कुर्सेला में गंगा नदी में जाकर मिला। इसमें नेपाल में करीब 65 हजार और बिहार के सुपौल, अररिया, द्वारा पूर्णिया, मधेपुरा और सहरसा जिलों में करीब 40 लाख लोग प्रभावित हुए।
उस समय नदी का प्रवाह मात्र 1,66,000 क्यूसेक था। बिहार सरकार, विश्व बैंक, जीएफडीआरआर द्वारा कोसी फ्लड नीड्स असेसमेंट रिपोर्ट (2008) के अनुसार, बाढ़ ने नेपाल और भारत के 3,700 वर्ग किमी के क्षेत्र को प्रभावित किया। आधिकारिक रिकॉर्ड ने बड़े पैमाने पर बाढ़ का प्रत्यक्ष पदुष्प्रभाव दिखाया: 493 लोग मारे गए, और 3500 लापता दर्ज किए गए। बिहार में, बाढ़ ने 412 पंचायतों के 993 गांवों को प्रभावित किया और 2,36,632 घरों को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया।
लगभग 4,40,000 लोगों ने 362 राहत शिविरों में शरण ली। बाढ़ ने 1,800 किमी सड़कों और 1,100 पुलों और पुलिया को भी क्षतिग्रस्त कर दिया। बाढ़ ने 38,000 एकड़ धान, 15,500 एकड़ मक्का और 6,950 एकड़ अन्य फसलों को नुकसान पहुंचाया। लगभग 10,000 दुधारू पशु, 3,000 अन्य पशु और 2,500 छोटे पशु मारे गए। वास्तविक नुकसान इन आंकड़ों से कई गुना ज्यादा है।
केंद्र सरकार ने उसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करते हुए एक हजार करोड़ रुपए, तात्कालिक राहत कार्य के लिए दिये। बाद में राज्य सरकार ने विश्व बैंक से कोसी फ्लड रिकवरी प्रोजेक्ट के लिए 220 मिलियन अमेरिकी डॉलर और कोसी बेसिन डवलपमेंट प्रोजेक्ट नाम से 250 मिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज लिया।
कुछ साल पहले बिहार के मुख्यमंत्री ने पहले से बेहतर कोसी बनाने का दावा भी कर दिया।
ये दावे हकीकत से मेल नहीं खाते हैं।
1,80,574 परिवारों को नहीं मिला पुनर्वास का लाभ
राज्य सरकार ने विश्वबैंक के कर्ज से 56,058 लोगों के ओडीआरसी के तहत पैसा देकर घर बनवाने के साथ ही पुनर्वास कार्यों से इतिश्री कर ली और 180574 लोगों के घर बनाने के कार्यों को भुला दिया। राज्य सरकार और विश्वबैंक ने ही कोसी फ्लड रिकवरी प्रोजेक्ट में उल्लेख किया है कि 236632 लोगों के घर टूटे हैं। उसके अलावें सुपौल जिले के नगर पंचायत बीरपुर, मधेपुरा जिले नगर परिषद मधेपुरा और नगर पंचायत मुरलीगंज के आंकड़े समाहित नहीं थे। आंशिक क्षति वाले परिवार अलग थे।
नगर क्षेत्र को पुनर्वास कार्यों से बाहर
सरकार ने पुनर्वास कार्य के लिए नगर क्षेत्र के सभी परिवारों को हटा दिया। अर्थात नगर क्षेत्र में में क्षतिपूर्ति और पुनर्वास कार्य नहीं हुए।
दोषियों पर नहीं हुई कार्रवाई
राज्य सरकार ने इस त्रासदी के कारणों की जांच और भविष्य के लिए सुझाव के लिए कोसी कटान न्यायिक जांच आयोग का गठन किया उसके लिए न्यायमूर्ति राजेश बलिया को अध्यक्ष बनाया। अयोग को छः माह में रिपोर्ट देनी थी पर अयोग ने 5 वर्ष 8 महीने बाद 6 जून 2014 को राज्य सरकार को रिपोर्ट दिया। उस रिपोर्ट के ए टू जेड बिंदुओं पर कार्रवाई के लिए सुझाव दिया था। राज्य सरकार ने उन सुझावों पर 14 जुलाई 2014 को दो जाँच कमिटियां बना दी। 18 वर्ष में आज तक किसी दोषी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
आज भी भटक रहे पीड़ित
प्रीतम मुखिया सुपौल जिले के निर्मली प्रखंड के दिघिया गांव के रहने वाले हैं। बड़ी तमन्ना से सड़क के पास का खेत बेचकर सखुआ लकड़ी की बड़ी नाव बनवाए थे जिसकी लंबाई 38 फीट और चौड़ाई 8.5 फीट थी। कुसहा त्रासदी के समय अंचल पदाधिकारी निर्मली ने उनसे आग्रह किया कि आप कोसी त्रासदी के पीड़ितों के बचाने के लिए नाव लेकर चलें।
वे उनकी बात मानकर मानव सेवा के लिए सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज अंचल चले गए। जान जोखिम में डालकर, भूखे प्यासे रहकर 58 दिन नाव चलाकर लगभग दस हजार से अधिक लोगों की जान बचाने में मदद किए। उनको पुरस्कार के बजाय आज तक नाव का किराया सरकार और प्रशासन ने नहीं दिया है जबकि जाते समय उनकी नाव का परवाना और लॉग बुक मिला था और कार्य पूरा होने पर नाव विमुक्ति प्रमाण पत्र अंचल पदाधिकारी त्रिवेणीगंज ने दिया था।
उस नाव को वापसी के समय छोटी गाड़ी पर लादने के कारण रस्ते में टूट कर बिखर गई। उन्हें आज तक नाव चलाने का किराया नहीं मिला। न ही टूटी नाव की क्षतिपूर्ति ही मिली। उनके साथ उस क्षेत्र के दर्जनों नाविकों के साथ ऐसा हुआ कुछ लोग तो मर गए पर प्रीतम मुखिया 18 वर्ष से अंचल से लेकर जिला तक चक्कर लगा रहे हैं लाखों रुपए तो हकीमों के यहां आने जाने में खर्च हो गए थक हारकर वे सुपौल न्यायालय में स्थित स्थाई लोक अदालत में 5 अगस्त 2026 को वाद दायर किए हैं।
मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड के पंचायत गंगापुर वार्ड नंबर 8 के मनोज यादव के पुत्र सुनील यादव की मौत कोसी की उस भीषण बाढ़ में डूब कर हो गईं। बड़ी मुश्किल के बाद कई दिन ढूंढने पर उसका शव मिला। थाने में केस दर्ज हुआ। आज तक उनको मृतक अनुग्रह अनुदान की राशि नहीं मिलीं है। घर का पैसा खर्च करके दफ्तरों के चक्कर लगा रहे है ये एक प्रीतम मुखिया या मनोज यादव की कहानी नहीं है हजारों पीड़ितों की यह दशा है। कुसहा त्रासदी में राहत, क्षतिपूर्ति पुनर्वास हर जगह पीड़ितों को इंसाफ नहीं मिला।
सरकार ने जरूर उस त्रासदी के नाम पर विश्वबैंक के कर्ज से सुपौल जिले के बीरपुर में आलीशान विभागीय भवन बनाकर पहले से बेहतर कोसी बनाने का दावा कर दिया परंतु कोसी त्रासदी के पीड़ित आज भी ठगे महसूस करते हैं।
डॉ चन्द्र कांत पाटिल के बलिदान को सरकार ने भुला दिया
इस त्रासदी में देश और दुनिया से मदद करने लोग आए थे उसी में महाराष्ट्र के धुलिया के रहने वाले डॉ. चन्द्र कांत पाटिल भी थे जो कोसी पीड़ितों का इलाज एक स्वयं सेवक डॉक्टर के रूप में सुपौल जिले में प्रभावित क्षेत्र में कर रहे थे।
21 सितंबर को उस पन्नी के शिविर पर आकाशीय बिजली ( ठनका) गिरने से उनकी मौत हो गई। एक साधारण परिवार के 25 वर्षीय इकलौते बेटे के बलिदान ने पूरे परिवार और समाज को हिला कर रख दिया था। उनके बलिदान पर कोलकता में डाक्टरों ने वर्षों तक याद करते हुए मेमोरियल लेक्चर और पुरस्कार देनें का कार्यक्रम रखा। पर बिहार सरकार और प्रशासन ने उन्हें भूला दिया। उनके बलिदान दिवस पर सामाजिक संगठन इस साल कार्यक्रम रखते हुए उनकी प्रतिमा बनाने की मांग कर रहे हैं।
जन संगठनों ने लगातार जारी रखा जन दबाव
जन संगठन कोसी नव निर्माण मंच ने त्रासदी के समय से लेकर आज तक पीड़ितों को हक दिलाने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष किया। अनेक दफ्तरों में आवेदन देने, धरना प्रदर्शन करने, के बाद मुख्यमंत्री का घेराव, विधान सभा का घेराव भी किया। इतने जन दबावों के बाद पीड़ितों का यह हकीकत है।
कुसहा त्रासदी ने साबित कर दिया कि तटबंध सुरक्षा की झूठी भावना प्रदान करते हैं और कोसी परियोजना की प्रशासनिक व्यवस्था इस मानव निर्मित त्रासदी का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी।
आज भी कोसी नदी का तल लगातार ऊंचा हो रहा है। आज पीड़ितों के दुःखों को याद करने के साथ ही कोसी समस्या के समाधान की बात उठानी जरूरी है।

