तुर्कमेनिस्तान बना दुनिया का सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जक  

विडंबना यह है कि तुर्कमेनिस्तान ने कॉप 28 में ग्लोबल मीथेन प्लेज जॉइन किया, लेकिन रिसाव अभी भी जारी है
वायुमंडलीय मीथेन 2019 से 2023 तक रिकॉर्ड 1921 पीपीबी तक बढ़ी, मुख्यतः प्राकृतिक और कृषि स्रोतों के कारण।
वायुमंडलीय मीथेन 2019 से 2023 तक रिकॉर्ड 1921 पीपीबी तक बढ़ी, मुख्यतः प्राकृतिक और कृषि स्रोतों के कारण।फोटो साभार: आईस्टॉक
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मीथेन उत्सर्जन पर पाबंदी लगाने की प्रतिबद्धताओं के बावजूद तुर्कमेनिस्तान अब दुनिया का सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जक देश बन गया है। वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यह छोटा मध्य एशियाई देश औद्योगिक गतिविधियों और तेल‑गैस उत्पादन की वजह से वैश्विक जलवायु संकट में बड़ा योगदान दे रहा है।

कार्बन मैपर और स्टॉप मीथेन प्रोजेक्ट के विश्लेषण में सामने आया कि दुनिया के 25 सबसे बड़े तेल और गैस मीथेन रिसाव स्थलों में 15 तुर्कमेनिस्तान में हैं। इसका अर्थ है कि हर घंटे लगभग 10.5 टन मीथेन सीधे वायुमंडल में जा रहा है।

मीथेन, जिसे अक्सर ग्रीनहाउस गैसों का “स्प्रिंटर” कहा जाता है, कम समय में वातावरण को कार्बन डाइऑक्साइड से कई गुना तेजी से गर्म करता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि 20 साल के समय में मीथेन का ग्लोबल वार्मिंग प्रभाव कार्बन डाई ऑक्साइड के मुकाबले 86 गुना अधिक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, औद्योगिक क्रांति के बाद से बढ़े वैश्विक तापमान में लगभग 30% योगदान मीथेन का ही है।

तुर्कमेनिस्तान तेल और गैस उत्पादन में एक बड़ा खिलाड़ी है और दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार में से एक का घर है। आईईए के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, यह देश हर साल 27 लाख टेराजूल से अधिक प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता है और इसे दुनिया का आठवां सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस निर्यातक बनाता है।

नए सेटेलाइट अवलोकनों से पता चला है कि तुर्कमेनिस्तान के 15 सुपर-उत्सर्जक स्थलों से इतनी मात्रा में मीथेन रिसाव हो रहा है कि यह सीधे वैश्विक तापमान वृद्धि में गंभीर योगदान डालता है।

विडंबना यह है कि तुर्कमेनिस्तान ने कॉप 28 में ग्लोबल मीथेन प्लेज जॉइन किया, लेकिन रिसाव अभी भी जारी है।

ग्लोबल मीथेन प्लेज एक अंतरराष्ट्रीय पहल है, जिसे कॉप 26 में लॉन्च किया गया था और इसका उद्देश्य 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को 2020 के स्तर की तुलना में 30 फीसदी  तक कम करना है। इस पहल में 100 से अधिक देश शामिल हैं और इसका फोकस मुख्य रूप से तेल‑गैस उद्योग, कृषि और लैंडफिल से निकलने वाले मीथेन को नियंत्रित करना है। विशेषज्ञों के अनुसार मीथेन वायुमंडल में तेजी से गर्मी बढ़ाता है और इसके उत्सर्जन में कटौती करने से जलवायु तापमान वृद्धि को 0.2–0.3 डिग्री सेल्सियस तक सीमित किया जा सकता है। हालांकि, तुर्कमेनिस्तान जैसे बड़े उत्सर्जक देशों में रिसाव अभी भी जारी हैं, जो दिखाता है कि ग्लोबल मीथेन प्लेज के लक्ष्य तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण है।

भारत में भी स्थिति गंभीर

वहीं, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मीथेन उत्सर्जक देश है। तेल और गैस उद्योग के रिसाव के अलावा, कचरा ढेरों से भी मीथेन का उत्सर्जन होता है। दिल्ली का गाजीपुर लैंडफिल एक वैश्विक सुपर-एमिटर है। यहां का रिसाव 68 लाख कारों जितना प्रदूषण पैदा करता है। इसका मुख्य कारण ऑक्सीजन-रहित वातावरण में सड़ता ऑर्गेनिक और पेपर कचरा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में ऑर्गेनिक कचरे के प्रबंधन में सुधार करने की तत्काल आवश्यकता है।

चूंकि मीथेन उत्पादन का बड़ा हिस्सा तेल और गैस उद्योग से आता है, इसलिए देशों की ऊर्जा नीति इसका सीधा असर डालती है। ऊंचे वैश्विक ऊर्जा मूल्यों और आर्थिक अस्थिरता के कारण मीथेन उत्सर्जन को रोकने में राजनीतिक निर्णय महत्वपूर्ण हैं। ऊर्जा कंपनियों और निवेशकों की नीति भी उत्सर्जन नियंत्रण में निर्णायक भूमिका निभाती है।

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