फरीदाबाद की बड़कल झील में भरे एसटीपी के ट्रीटेड पानी के संपर्क में आने से करीब 1,000 पेड़ सूखे

आरोप है कि बड़कल गांव का भूजल भी खराब कर रहा है झील में भरा एसटीपी का दूषित पानी
परसोन मंदिर परिसर में लगे सैकड़ों फलदार और औधषीय पेड़ बड़कल झील के पानी के संपर्क में आने से मर गए हैं। सभी फोटो: भागीरथ
परसोन मंदिर परिसर में लगे सैकड़ों फलदार और औधषीय पेड़ बड़कल झील के पानी के संपर्क में आने से मर गए हैं। सभी फोटो: भागीरथ
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स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत फरीदाबाद की बड़कल झील में भरा गया सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का ट्रीटेड पानी सैकड़ों पेड़ों के सूखने की वजह बन रहा है। झील के नजदीक अनखीर गांव के परसोन मंदिर परिसर के सैकड़ों औषधीय और फलदार पेड़ झील के काले और बदबूदार पानी के संपर्क में आने से सूख गए हैं।

पर्यावरणविद इसके लिए एसीटीपी से झील में भरे गए दूषित पानी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। सेव अरावली संस्था के ट्रस्टी और पेशे से अधिवक्ता कैलाश बिधूड़ी ने डाउन टू अर्थ को बताया कि वह कई बार इस दूषित पानी की शिकायत कर चुके हैं लेकिन अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं करते।

उनका कहना है कि एसटीपी का पानी जिस जगह से छोड़ा जा रहा है, वहां से झील तक जिस रास्ते से यह पानी गया है, वह क्षेत्र जल सा गया है। ऐसा तब होता है जब पानी में एसिड की मात्रा अधिक हो।

सेक्टर 21 में लगे एसटीपी से पहुंचाया जा रहा है झील में पानी
सेक्टर 21 में लगे एसटीपी से पहुंचाया जा रहा है झील में पानी

फलदार और औधषीय प्रजाति के पेड़ थे

बिधूड़ी कहते हैं कि परसोन मंदिर और उसके पास एक अन्य भारामल मंदिर परिसर में कम से कम 1,000 पेड़ों को केमिकल युक्त जहरीले पानी ने मार दिया है। इन पेड़ों में इमली, गूलर, खिरनी, बांस, पिलखन जैसी प्रजातियां मुख्य रूप से शामिल थीं। आम, जामुन और अमरूद के पेड़ यहां बड़ी संख्या में थे। वह बताते हैं कि फरीदाबाद में अरावली के इसी हिस्से में विभिन्न प्रकार के फलों के पेड़ हैं। यहां लीची, चंदन और सेब के पेड़ तक थे। चंदन का एक पेड़ बंगलुरू और एक पेड़ दुबई से यहां लाया गया था। एक भक्तजन ने दुबई से खजूर का पेड़ लाकर यहां लगाया था।   

भूजल भी दूषित

बिधूड़ी ने कहा कि झील में भरा दूषित पानी भूजल में रिसकर उसे भी खराब कर सकता है। बड़कल गांव में रहने वाले एक युवक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर डाउन टू अर्थ को बताया कि बड़कल गांव का भूजल पिछले कुछ वर्षों से इतना खराब हो गया है कि लोगों ने उसे पीना बंद कर दिया है। वह इसके लिए सीधे तौर पर बड़कल झील में भरे दूषित पानी को जिम्मेदार ठहराते हैं। वह कहते हैं जब से झील में पानी भरा है, उसके बाद से ही उनके गांव का भूजल खराब हुआ है।

फरीदाबाद में पर्यावरण के मुद्दों पर लगातार उठाने वाले वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत यादव के अनुसार, इस समस्या को उठाए जाने के बाद अब यह मामला सीधे हरियाणा के वन एवं पर्यावरण मंत्री राव नरबीर सिंह के पास पहुंच गया है। उन्होंने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए उच्च अधिकारियों से इसकी गहन जांच करवाने का भरोसा दिया है। चंद्रकांत के अनुसार, मंत्री ने कहा है कि अगर एसटीपी के पानी में कोई खामी पाई गई, तो सख्त एक्शन लिया जाएगा।

फरीदाबाद स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा सेक्टर-21 में 10 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की क्षमता का एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाया गया है। इस प्लांट से पानी को ट्रीट करने के बाद बड़खल झील में रीचार्जिंग के लिए डाला जाता है। वर्तमान में इस पानी से बड़कल झील पूरी तरह भर चुकी है और यही पानी पास ही स्थित परसोन मंदिर के फॉरेस्ट एरिया तक पहुंच गया है।

स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत हुआ है बड़कल झील का विकास और पुनर्जीवन
स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत हुआ है बड़कल झील का विकास और पुनर्जीवन

कराएंगे जांच: इंजीनियर

कैलाश बिधूड़ी के अनुसार, हम शुरू से शिकायत कर रहे हैं कि यह पानी साफ नहीं है लेकिन अधिकारियों ने हमारी बात नहीं सुनी। फरीदाबाद स्मार्ट सिटी लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (ईएक्सईएन) संजीव ने डाउन टू अर्थ को इस संबंध में बताया कि एसीटीपी का पानी नॉर्म्स के हिसाब से आता है। जैसा ट्रीटेड वाटर होता है, वैसा ही पानी आ रहा है। एसपीटी पर लगे डिवाइस 24 घंटे में रीडिंग देते रहते हैं। वह कहते हैं झील का पानी जलकुंभी की भी वजह से काला है। उनका यह भी कहना है कि लोग झील के पानी में कपड़े धोते हैं, नहाते हैं और गंदगी गिराते हैं जिससे पानी खराब होता है। संजीव के अनुसार, एसटीपी के पानी की समय-समय पर जांच होती है। अगर लोगों की शिकायत है तो फिर जांच कराएंगे।  

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट में वाटर प्रोग्राम की सीनियर प्रोग्राम मैनेजर सुष्मिता सेनगुप्ता ने बताया कि एसपीटी से झील में छोड़े जा रहे पानी के रंग और झाग को देखकर लगता है कि इसे ठीक से ट्रीट नहीं किया गया है। अगर इसमें टीडीएस का स्तर अधिक हुआ तो पेड़ों को यह सुखा सकता है। साथ ही उद्योगों से निकलने वाला रसायन भी अगर ठीक से ट्रीट न हुआ हो तो पेड़ों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।   

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