आसमानी सुनामी

जलवायु जनित आपदाओं ने नेपाल को ऐसे जख्म दिए हैं, जिसकी टीस शायद ही कभी खत्म हो
नुवाकोट नेपाल के उन शुरुआती जिलों में से एक था जहां 26 अगस्त को मलबे और बर्फ के कारण अचानक बाढ़ आई। आपदा के तीन दिन बाद यानी 29 अगस्त को भी बाढ़ वाले इलाके में हुआ नुकसान साफ देखा जा सकता था
नुवाकोट नेपाल के उन शुरुआती जिलों में से एक था जहां 26 अगस्त को मलबे और बर्फ के कारण अचानक बाढ़ आई। आपदा के तीन दिन बाद यानी 29 अगस्त को भी बाढ़ वाले इलाके में हुआ नुकसान साफ देखा जा सकता था(सभी फोटो: रॉयटर्स)
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यह नेपाल की सूखी और नीरस सुबह है। बारिश के कोई खास निशान नहीं हैं। 5,500 मीटर तक की खड़ी ऊंचाई वाले हिमनदों और बर्फ से ढके पहाड़ लांगटांग घाटी के ऊपर खड़े हैं। पहाड़ों की अभेद्य सुरक्षा, गहरी खाइयां, तेज ढलान वाली नदियां और दर्रे इस घाटी को सुरक्षित होने का एहसास कराते हैं।

शायद यही वजह है कि यहां के लोग बुरी यादों को ज्यादा समय तक अपने जेहन में नहीं रखते। मसलन, 25 अप्रैल 2015 को आए 7.8 तीव्रता के भूकंप को ही लें, जिसके कारण काठमांडू और तिब्बत के बीच ऐतिहासिक यात्रा मार्ग पर स्थित लांगटांग गांव के ऊपर एक हिमनद ढह गया था। इस आपदा में 400 लोगों की मौत हुई और लगभग सभी घर व बुनियादी ढांचे तबाह हो गए। लेकिन दो साल के भीतर लोगों ने गांव को फिर से बसा लिया। फिर 8 जुलाई, 2025 को तिब्बत में एक सुप्राग्लेशियल झील (हिमनद की सतह पर बनने वाली झील) के फटने से भोटेकोशी नदी की सहायक लेंडे खोला में भीषण बाढ़ आई, जिसने रसुवागढ़ी में पुलों और बुनियादी ढांचे को बहा दिया। 22 दिन बाद भोटेकोशी में आई एक और बाढ़ ने इलाके को और नुकसान पहुंचाया। लेकिन लोगों ने इसके बाद फिर से निर्माण किया। यह उस जुझारूपन का उदाहरण है जो इस क्षेत्र में जीवन की असुरक्षा के अनुरूप है। 26 अगस्त 2026 को इन्हीं पहाड़ों में ऊंचाई पर एक और भूगर्भीय घटना होने वाली थी। सुबह 8 बजकर 45 मिनट पर नेपाल-तिब्बत सीमा पर लेंडे खोला के ठीक ऊपर लांगटांग लिरुंग की उत्तरी ढलान पर स्थित एक अनाम हिमनद का 600 मीटर चौड़ा और उसके आसपास का हिस्सा 5,200 मीटर की ऊंचाई से ढह गया।

भूवैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन के अनुसार, धंसान क्षेत्र 2.26 वर्ग किलोमीटर में फैला था। बर्फ और चट्टान के पिघलने से अतिरिक्त 2.93 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का कटाव हुआ। इस विशाल धंसान में करीब 14.2 करोड़ घन मीटर बर्फ, चट्टान, तलछट और मलबा नीचे की ओर आया होगा। नीचे गिरते इस विशाल मलबे ने समुद्र तल से 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हिमनद के निचले क्षेत्र को भी अपनी चपेट में ले लिया। यह क्षेत्र हिमनद का वह सबसे निचला हिस्सा होता है, जहां हर साल बर्फ नई बर्फ के मुकाबले अधिक पिछलती है। बर्फ और चट्टानों का यह हिमस्खलन 1,100 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार, इससे 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर ऊर्जा उत्पन्न हुई। प्रभावित क्षेत्र से 12 किलोमीटर दूर जिलोंग में लगे एक सीस्मोमीटर ने असामान्य संकेत दर्ज किए। नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के अनुसार, झांगमु स्थित एक दूसरे केंद्र ने भी ऐसे ही संकेत दर्ज किए।

बर्फ, चट्टान और मलबे का यह विशाल प्रवाह लेंडे खोला में जा गिरा। इससे कुछ समय के लिए नदी अवरुद्ध हो गई, उसका मार्ग बदल गया और अंततः अत्यंत शक्तिशाली तरीके से यह अवरोध टूट गया। नेपाल स्थित यूथ एलायंस फॉर एनवायरनमेंट, काठमांडू विश्वविद्यालय के क्लाइमेट एंड डिजास्टर रिसर्च सेंटर के अंतर्गत हिमालयन क्रायोस्फीयर और सोसाइटी फॉर कंजर्वेशन बायोलॉजी के संयुक्त विश्लेषण में कहा गया है, “हमारा अनुमान है कि उस क्षेत्र से करीब 6.7 करोड़ घन मीटर बर्फ लेंडे नदी में मिल गई। हमारा मानना है कि लेंडे नदी और दूसरी नदी के संगम तक नीचे आई सारी बर्फ, हिम और चट्टान कुछ समय के लिए अस्थायी रूप से अवरुद्ध हो गए, जिसके बाद वे तेजी से नीचे की ओर बह निकले।”

तेज रफ्तार बाढ़ का पानी और विनाशकारी मलबा बड़े वेग से खाइयों से होकर आगे बढ़ा और नेपाल के रसुवा जिले तथा तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी की नदी घाटियों को अपनी चपेट में ले लिया। आईसीआईएमओडी के महानिदेशक पेमा ग्याम्त्शो इसे “आसमान से आई सुनामी” बताते हैं, जो लेंडे खोला के रास्ते भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में पहुंची और आबादी वाली घाटियों को बहा ले गई। आईसीआईएमओडी के अनुसार, सुबह 9 बजे तक महज 30 मिनट के भीतर भोटेकोशी बेसिन में पानी का स्तर 9 मीटर से अधिक बढ़ गया था। अत्यधिक ताकतवर मलबायुक्त बाढ़ ने नीचे की ओर 100 किलोमीटर तक अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर दिया।

28 अगस्त 2026 को नुवाकोट जिले के त्रिशूली में एक महिला अपने क्षतिग्रस्त घर से सामान निकाल रही है
28 अगस्त 2026 को नुवाकोट जिले के त्रिशूली में एक महिला अपने क्षतिग्रस्त घर से सामान निकाल रही है

30 मीटर ऊंचा और कंक्रीट से भरा यह पानी बहुत तेजी से तिमुरे, रसुवागढ़ी, स्याब्रुबेसी और निचले इलाकों की अन्य बस्तियों से होकर गुजरा और आगे नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा, चितवन, तनहुन और नवलपरासी जिलों तक पहुंच गया। लेंडे खोला और त्रिशूली नदी की घाटियों से गुजरते हुए यह अपने साथ लगातार अधिक पानी और मलबा लेता गया जिससे इसकी ताकत बढ़ती गई। लांगटांग लिरुंग की भौगोलिक संरचना ने बाढ़ को और विकराल बनाया, क्योंकि यह ऊंचाई पर स्थित है और इसके दोनों ओर खड़ी घाटियां हैं।

काठमांडू स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर स्टडीज के निदेशक बसंत राज अधिकारी कहते हैं, “यह बाढ़ तीन अलग-अलग मायनों यानी आकार, क्षेत्र और तंत्र के लिहाज से बेहद अनूठी और अभूतपूर्व थी।” 1 सितंबर तक इस बाढ़ को अप्रैल 2015 के भूकंप के बाद देश की सबसे घातक प्राकृतिक आपदा माना जाने लगा। नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के अनुसार, 15 सितंबर तक नेपाल-तिब्बत सीमा के दोनों ओर 1,399 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 5,326 लोग अब भी लापता हैं। शुरुआती आर्थिक नुकसान भी बहुत बड़ा है। बुनियादी ढांचे को 1.3 से 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ है, जबकि पुनर्निर्माण की लागत करीब 5 अरब डॉलर आंकी गई है। बाढ़ ने 14 जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया, जिनकी कुल क्षमता करीब 748 मेगावाट है। इसके अलावा 33 सस्पेंशन ब्रिज और 35 मोटरेबल ब्रिज क्षतिग्रस्त (42 किलोमीटर सड़क बह गई) हुए। साथ ही रसुवागढ़ी व्यापार गलियारा भी ध्वस्त हो गया, जिससे चीन के साथ नेपाल के करीब 80 प्रतिशत व्यापार पर असर पड़ा।

अभूतपूर्व हिमस्खलन

इस प्रलयंकारी बाढ़ ने बर्फ और चट्टान के हिमस्खलन यानी आईआरए (आइस-रॉक एवलांच) की ओर ध्यान खींचा है। यह एक ऐसी घटना है, जिसका संबंध गर्म होते हिमालय और भूगर्भीय क्षरण से है। व्यापक रूप से आईआरए को “ऊंचे पर्वतीय वातावरण में खड़ी हिमनद या चट्टानी ढलान से बर्फ या चट्टान के अलग होकर तेजी से नीचे की ओर बढ़ने” के रूप में परिभाषित किया जाता है।

जिनेवा विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंटल साइंसेज के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन के अनुसार, उच्च पर्वतीय एशिया (जिसमें नेपाल और तिब्बत भी शामिल हैं) में ऐतिहासिक रूप से हुई 60 आईआरए घटनाओं में 1,366 लोगों की मौत हुई और पांच लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए। अध्ययन में 2015 की लांगटांग घटना को “सबसे विनाशकारी” बताया गया है। इसके अनुसार, अध्ययन में शामिल 86 प्रतिशत आईआरए घटनाएं समुद्र तल से 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित खड़ी ढलानों पर हुईं, जैसा नेपाल की मौजूदा घटना में भी देखा गया।

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष इन घटनाओं के गंभीर खतरों से जुड़ा है। लगभग आधी आईआरए घटनाओं में एक के बाद एक कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं, जिन्हें कैस्केडिंग प्रक्रियाएं कहा जाता है। ये औसतन अधिक दूरी तक जाती हैं और अकेली घटनाओं की तुलना में मौतों की संख्या दस गुना तक बढ़ा देती हैं।

अध्ययन में कहा गया है, “कैस्केडिंग प्रक्रियाएं छोटे (हिमनद क्षेत्र 3 वर्ग किलोमीटर से कम), अधिक खड़ी ढलान वाले (हिमनद की ढलान 30 डिग्री से अधिक) लटकते हुए हिमनदों में होने की आशंका अधिक होती है। मलबे की मात्रा, पानी की मात्रा और स्थलाकृति कैस्केडिंग प्रक्रियाओं के तीन प्रमुख कारक हैं।” ऐतिहासिक आईआरए घटनाओं के सांख्यिकीय विश्लेषण के आधार पर अध्ययन में यह भी कहा गया है कि जब ऐसी घटना अधिक जल प्रवाह वाली नदी प्रणालियों के पास होती है, तो उसके कैस्केडिंग प्रक्रिया में बदलने की आशंका काफी बढ़ जाती है, जिससे संभावित आपदा और गंभीर हो सकती है।

अधिकारी नेपाल की आईआरए प्रक्रिया को उत्तराखंड के चमोली में हुई हिमनद घटना से लगभग समान मानते हैं। 7 फरवरी, 2021 को चमोली में रोंटी पीक के उत्तरी हिस्से से करीब 2.7 करोड़ घन मीटर चट्टान और बर्फ का एक विशाल हिमस्खलन हुआ था। चट्टान और हिमनद की बर्फ का यह मिश्रण तेज रफ्तार मलबे के प्रवाह में बदल गया और ऋषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों से होकर नीचे आया। इस घटना में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई और दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं तबाह हो गईं।

नुवाकोट जिले के त्रिशूली इलाके में मौजूद आर्मी ट्रेनिंग सेंटर मैथिली बैरक से 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ के तीन दिन बाद एक महिला और बच्चे को बचाया गया
नुवाकोट जिले के त्रिशूली इलाके में मौजूद आर्मी ट्रेनिंग सेंटर मैथिली बैरक से 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ के तीन दिन बाद एक महिला और बच्चे को बचाया गया

हालांकि, अधिकारी कहते हैं कि नेपाल में आई मौजूदा बाढ़ अभूतपूर्व है और यह कहीं अधिक ऊंचाई पर हुई है। वह कहते हैं, “हिमालयी लैंडस्केप में मैंने इससे बड़ी बाढ़ की घटना नहीं देखी है। मैंने ऊर्जा की मात्रा की गणना की है, जो हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम से भी अधिक है।” त्रिभुवन विश्वविद्यालय के केंद्रीय जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर दिबास श्रेष्ठ कहते हैं, “हम हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ यानी जीएलओएफ से अपेक्षाकृत परिचित हैं, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हिमनद के ढहने की आशंका नहीं थी।”

दिबास श्रेष्ठ कहते हैं, “यह स्पष्ट है कि अचानक आई बाढ़ लांगटांग लिरुंग चोटी की उत्तरी ढलान पर हिमनद के एक विशाल लटकते हुए हिस्से के ढहने से शुरू हुई। हालांकि, हम अब भी नहीं जानते कि आखिर हिमनद के ढहने की वजह क्या थी।” वह आगे कहते हैं, “कई संभावित तंत्रों की जांच किए जाने की जरूरत है, जिनमें हिमनद के तल का अभूतपूर्व रूप से गर्म होना, ताजा बर्फ का बड़े पैमाने पर जमाव या सतह पर पिघले पानी अथवा छोटी सुप्राग्लेशियल झीलों का पानी हिमनद के भीतर रिसकर तल तक पहुंचना और वहां पिघलाव व अस्थिरता को बढ़ाना तक शामिल है।”

आईआरए हिमालय में मौजूद “लटकते हुए हिमनदों” (हैंगिंग ग्लेशियर) का भी संकेत है। बढ़ता तापमान और वर्षा के बदलते पैटर्न हिमनदों को अस्थिर बना रहे हैं और अक्सर बर्फ के विशाल टुकड़ों को खड़ी ढलानों पर लटका हुआ छोड़ देते हैं। ये बर्फीले टुकड़े नाजुक होते हैं। जलवायु जनित कोई भी कारक इन्हें नीचे गिराकर आईआरए का कारण बन सकता है।

भारतीय विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भुवनेश्वर और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट के एक अध्ययन में कहा गया है, “तेजी से बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण हिमालयी हिमनदों में अस्थिरता बढ़ती जा रही है। इस अस्थिरता ने खड़ी ढलानों पर लटकते हिमनदों के निर्माण को बढ़ावा दिया है, जिनसे बर्फ के बड़े हिस्से टूटने और निचले इलाकों पर गंभीर प्रभाव पड़ने का बड़ा खतरा है।”

सभी ग्राफिक्स: तरुण सहगल / सीएसई

बदलती जलवायु एक वजह

काठमांडू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ साइंस के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख रिजान भक्त कहते हैं कि हालांकि निश्चित अनुभवजन्य प्रमाण के लिए इंतजार करने की जरूरत है, लेकिन नेपाल में हुई घटना संभवतः जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों का परिणाम है। वह कहते हैं, “हालांकि नेपाल में मॉनसून का मौसम है, लेकिन इस क्षेत्र में ज्यादा बारिश नहीं हुई। इसके बावजूद पहाड़ों में तापमान बहुत अधिक था।” वह कहते हैं, “उच्च तापमान के कारण बर्फ पिघलती है। जब बड़ी मात्रा में बर्फ पिघलकर नीचे आती है तो वह केवल बर्फ नहीं लाती, बल्कि चट्टानें भी साथ लाती है जो अवरोध पैदा कर सकती हैं और पानी को रोक सकती हैं। जाहिर तौर पर इससे एक विशाल झील बन गई जो आखिरकार फट गई और बड़ी मात्रा में पानी अत्यधिक गति से नीचे की ओर बह निकला।”

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरमेंट एंड ह्यूमन सिक्योरिटी (यूएनयूईएचएस) के ग्लोबल माउंटेन सेफगार्ड रिसर्च (जीएलओएमओएस) कार्यक्रम के वरिष्ठ वैज्ञानिक दीपेश चापागाईं कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन, खासकर बढ़ता तापमान लंबे समय से जीएलओएफ में योगदान दे रहा है।” वह कहते हैं, “हमारे एक अध्ययन में हिंदू कुश हिमालय में हुई करीब 500 जीएलओएफ घटनाओं का विश्लेषण किया गया है। यह बताता है कि 1950 के बाद से ऐसी घटनाओं की दर पांच गुना बढ़ गई है।”

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार में फैले 42 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला है। डाउन टू अर्थ के पास उपलब्ध इस शोध में कहा गया है, “1950 के बाद जीएलओएफ की आवृत्ति में उल्लेखनीय तेजी देखी गई। 1950 के बाद औसत तेजी से बढ़कर लगभग 34 घटनाएं प्रति दशक हो गया, जो 1950 से पहले की अवधि की तुलना में पांच गुना वृद्धि है।” आंकड़े बताते हैं कि हाल के दशकों में प्रति दशक जीएलओएफ की घटनाओं की संख्या 40 से अधिक हो गई है। आईसीआईएमओडी के वरिष्ठ क्रायोस्फीयर विशेषज्ञ मोहम्मद फारुक आजम कहते हैं, “क्रायोस्फीयर से जुड़े खतरों की बढ़ती आवृत्ति पहले से कहीं अधिक दिखाई देने लगी है। बदलाव की गति इतनी तेज है कि मौजूदा प्रयास सफल साबित नहीं हो पा रहे हैं।”

यूएनयूईएचएस के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम द्वारा किया जा रहा यह अध्ययन जलवायु संबंधी कारकों को प्रमुख ट्रिगर के रूप में रेखांकित करता है, हालांकि गैर-जलवायु कारक भी इसमें भूमिका निभाते हैं। शोध में कहा गया है, “प्राथमिक ट्रिगर के रूप में बर्फीले हिमस्खलन (50 प्रतिशत) और तीव्र वर्षा (25 प्रतिशत) की प्रमुखता इस जलवायु-प्रेरित प्रक्रिया के अनुरूप है। ग्राष्मकालीन मॉनसून महीनों के दौरान 70 प्रतिशत घटनाओं का होना जलवायु कारकों और जीएलओएफ की घटनाओं के बीच संबंध की और पुष्टि करता है। इन महीनों में तापमान और वर्षा दोनों अपने चरम पर होते हैं।” शोध में आगे कहा गया है, “हिंदू कुश हिमालय में जीएलओएफ घटनाओं में मोरेन और बर्फ से अवरुद्ध झीलों की प्रमुखता गर्म होती परिस्थितियों में इन प्राकृतिक बांधों की अंतर्निहित अस्थिरता को दर्शाती है। मोरेन और बर्फ से अवरुद्ध झीलें पर्वतीय घाटियों में पानी के ऐसे जलाशय होते हैं, जिन्हें चट्टानी मलबे या ठोस हिमनदीय बर्फ के प्राकृतिक अवरोध रोककर रखते हैं।

अध्ययन में बताया गया है, “बढ़ते तापमान के कारण पिघले पानी और तलछट का लगातार बढ़ता प्रवाह जल स्तर को बढ़ाता है, जिससे प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ जाता है। इससे ये बांध टूटने के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और बर्फ या हिम के हिमस्खलन, भूस्खलन अथवा भूकंपीय गतिविधियों जैसी अतिरिक्त प्रक्रियाएं इनके टूटने का कारण बन सकती हैं।” विशेषज्ञों को संदेह है कि नेपाल में ठीक यही हुआ है।

वर्ष 2020 तक हिंदू कुश हिमालय में 12 प्रमुख नदी बेसिनों में 64,000 से अधिक हिमनद थे। इसके अलावा यहां 23,344 से अधिक हिमनद झीलें हैं, जिनमें से करीब 407 को संभावित रूप से खतरनाक माना गया है। रिपोर्ट के अनुसार, “जीएलओएफ का सबसे अधिक खतरा पूर्वी हिमालय में है, खासकर चीन-नेपाल सीमा के आसपास।”

खतरनाक बारिश

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के लिए यह अत्यधिक आपदाओं वाला मौसम रहा है। 7 जुलाई को आईसीआईएमओडी ने चेतावनी दी थी कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान अत्यधिक बारिश और बादल फटने की घटनाओं के कारण हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसके साथ ही उच्च तापमान हिमनदों और बर्फ के तेजी से पिघलने का कारण बन सकता है। आईसीआईएमओडी के “एचकेएच मॉनसून आउटलुक 2026” में विशेषज्ञों ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान में बादल फटने से आई अचानक बाढ़ और अरुणाचल प्रदेश में हुई तीव्र बारिश व बाढ़ को ऐसी चरम मौसमी घटनाओं के उदाहरण के रूप में रखा जो इस तथ्य के बावजूद हो रही हैं कि मौजूदा मॉनसून में हिंदू कुश हिमालय के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है।

हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी अत्यधिक बारिश से अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर का किश्तवाड़ जिला भी शामिल है, जहां अचानक आई बाढ़ ने 540 मेगावाट की क्वार जलविद्युत परियोजना को प्रभावित किया और किश्तवाड़ को डोडा से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 244 को तबाह कर दिया।

आईसीआईएमओडी के डिजास्टर रिस्क रिडक्शन विशेषज्ञ सास्वत सान्याल कहते हैं, “सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि मौसमी बारिश कम होने का मतलब बाढ़ का खतरा कम होना है। कम बारिश वाला मॉनसून भी खतरनाक हो सकता है। मौसमी वर्षा का औसत उन बादल फटने की घटनाओं को नहीं पकड़ सकता, जो पर्वतीय घाटियों में विनाशकारी बाढ़ लाती हैं।” इस मौसम के दौरान अधिक तापमान खतरों को और बढ़ा सकता है। आईसीआईएमओडी के जल विज्ञानी मनीष श्रेष्ठ ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा, “अधिक तापमान हिमनदों और बर्फ के पिघलने को बढ़ाता है, जिसका मतलब है कि भारी बारिश की थोड़ी अवधि भी हिमनदों से पोषित नदी बेसिनों में कहीं बड़ी बाढ़ पैदा कर सकती है।”

हिमनदों और बर्फ के तेजी से पिघलने से उन नदियों में और अधिक पानी पहुंच सकता है, जो पहले से ही तीव्र बारिश के कारण उफान पर हैं। इसके साथ ही पर्वतीय ढलानों और मोरेन से अवरुद्ध हिमनद झीलों की अस्थिरता भी बढ़ सकती है। श्रेष्ठ कहते हैं, “पूर्व चेतावनी प्रणालियों को बारिश, हिमनद पिघलाव, नदी प्रवाह और ढलान की स्थिरता को एक साथ ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि ये खतरे तेजी से एक के बाद एक जुड़ी घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं।”

सान्याल कहते हैं, “इस साल दोहरी तैयारी की जरूरत है। समुदायों को लंबे सूखे दौर के लिए तैयार रहना चाहिए और साथ ही अचानक बाढ़, भूस्खलन और मलबा प्रवाह के लिए भी तैयार रहना चाहिए।”

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