शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया कि अनोखा व चरम मौसम केवल रिकॉर्ड ही नहीं तोड़ता, यह समुदायों, बुनियादी ढांचे और जीवन को भी बर्बाद कर देता है।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया कि अनोखा व चरम मौसम केवल रिकॉर्ड ही नहीं तोड़ता, यह समुदायों, बुनियादी ढांचे और जीवन को भी बर्बाद कर देता है। प्रतिरूपात्मक चित्र, फोटो साभार: आईस्टॉक

चरम मौसम के नुकसान व सदमे से बचने के लिए किस तरह हो बेहतर तैयारी, वैज्ञानिकों का सुझाव

अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि जो दिखाई न दे उसका अनुमान लगाने के इन तरीकों से लोग चरम मौसम के लिए बेहतर तरीके से तैयारी कर सकते हैं।
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एक नए अध्ययन में इस बात पर गौर किया गया है कि आधुनिक इतिहास में कभी न दर्ज की गई चरम मौसम की घटनाओं का पूर्वानुमान किस तरह लगाया जा सकता है। इसके लिए, क्लाइमेट अडेप्टेशन सर्विसेज फाउंडेशन, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं ने पारंपरिक मौसम रिकॉर्ड की सीमाओं से आगे देखने के तरीकों को एक साथ जोड़ा है।

शोध से पता चलता है कि कैसे प्रकृति के अपने दस्तावेज - जैसे पेड़ों के छल्ले, भूले हुए ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ मिलकर सदियों की जलवायु के आंकड़ों को सामने लाया जा सकता है, जिसे आज भी आधुनिक उपकरण नहीं खोज पाए हैं।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि हम यह सोचने तक सीमित रहे हैं कि चरम मौसम केवल उतना ही खतरनाक है जितना हमने मौसम स्टेशनों के आविष्कार के बाद से मापा है। लेकिन शोध दिखाता है कि हम मौसम मॉडल का उपयोग करके सैकड़ों या हजारों साल पीछे जाकर यह पता लगा सकते हैं कि हमारी जलवायु प्रणाली में वास्तव में क्या-क्या हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने चार नजरियों की पहचान की जो संभावित चरम मौसम की एक पूरी तस्वीर बनाते हैं:

  • पारंपरिक अभिलेखों का विश्लेषण

  • पेड़ के छल्लों जैसे ऐतिहासिक और प्राकृतिक अभिलेखों का अध्ययन

  • पिछली घटनाओं के आधार पर "क्या होगा" परिदृश्य बनाना

  • भौतिक रूप से संभावित चरम स्थितियों का अनुकरण करने के लिए जलवायु मॉडल का उपयोग करना

पेड़ों के छल्ले विशेष रूप से महत्वपूर्ण साबित हुए, जिनमें से हर एक छल्ले में एक साल के जलवायु इतिहास का विवरण सुरक्षित था।

शोधकर्ताओं ने उत्तर-पश्चिमी चीन में 850 सालों के सूखे के पैटर्न को फिर से बनाने के लिए इन प्राकृतिक दस्तावेजों का उपयोग किया, जिससे चरम घटनाओं का पता चला जो आधुनिक दस्तावेजों से गायब थे।

नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि शोधकर्ताओं ने ऐतिहासिक दस्तावेजों को खंगालकर मौसम की गायब हुई चरम स्थितियों को भी उजागर किया। उन्होंने पाया कि यूके के डरहम में जून 1846 का महीना किसी भी आधुनिक जून के तापमान से काफी ज्यादा गर्म था। इसी तरह ऑक्सफोर्ड में सितंबर 1774 का महीना 250 सालों में दर्ज किसी भी महीने से अधिक बारिश वाला था।

अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि जो दिखाई न दे उसका अनुमान लगाने के इन तरीकों से लोग चरम मौसम के लिए बेहतर तरीके से तैयारी कर सकते हैं। ये तरीके तैयारी की तीन परतों का समर्थन करते हैं:

शोध पत्र में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि सीमित आधुनिक रिकॉर्ड की रुकावटों से मुक्त होकर, अभूतपूर्व मौसम की घटनाओं से सदमे में पड़ना समाप्त किया जा सकता है।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया कि अनोखा व चरम मौसम केवल रिकॉर्ड ही नहीं तोड़ता, यह समुदायों, बुनियादी ढांचे और जीवन को भी बर्बाद कर देता है। जब जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है, तो बिना तैयारी के रहना एक आपदा की तरह है।

लेकिन विज्ञान हमें अकल्पनीय की कल्पना करने, इन खतरों को सामने लाने और तैयार रहने में मदद कर सकता है। हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज कितनी जल्दी और पूरी तरह से इसके अनुकूल हो जाते हैं।

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