

साल 2016 से 2025 के बीच दुनिया में हर साल औसतन करीब 10 करोड़ लोग आपदाओं से प्रभावित हुए।
साल 2015 में 55 देशों में बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियां थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर 128 हो गई है।
प्रति एक लाख आबादी पर आपदाओं से होने वाली औसत मौतों में 65 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों और पारिस्थितिकी तंत्र की हानि सहित, दुनिया में आपदाओं की सालाना लागत 2.3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है।
भारत की करीब 59 प्रतिशत भूमि भूकंप के खतरे वाले क्षेत्रों में आती है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़-प्रवण है।
हर इंसान का सपना होता है कि उसका घर सुरक्षित हो। दिनभर की थकान के बाद जब वह घर लौटे, तो उसे सुकून मिले। लेकिन सोचिए, अगर वही घर बाढ़ के पानी में डूब जाए, भूकंप के झटकों से हिलने लगे या भीषण गर्मी में तपने लगे, तो इंसान कहां जाए? घर को सुरक्षा का सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है, लेकिन प्राकृतिक आपदाएं कई बार इसी ठिकाने को खतरे में डाल देती हैं। इसलिए जरूरी है कि हम आपदा आने के बाद जागने के बजाय पहले से तैयारी करें।
हर साल 13 अक्टूबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को आपदाओं के खतरों के प्रति जागरूक करना और उनसे होने वाले नुकसान को कम करना है। इस साल की थीम ‘लचीलापन घर से शुरू होता है।’ यानी सुरक्षित घर, जागरूक परिवार और तैयार समुदाय ही आपदा के सामने मजबूत ढाल बन सकते हैं।
भारत के सामने खतरे अनेक
भारत प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील देश है। देश की करीब 59 प्रतिशत भूमि भूकंप के खतरे वाले इलाकों में आती है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्र बाढ़ की आशंका से प्रभावित है। लंबी समुद्री तटरेखा के कारण कई इलाके चक्रवात और सुनामी के खतरे का सामना करते हैं। इसके अलावा सूखा, भूस्खलन, बादल फटना और हिमनद झीलों के फटने जैसी घटनाएं भी बड़ी चुनौती हैं।
हर साल बाढ़ और मूसलाधार बारिश हजारों परिवारों की जिंदगी प्रभावित करती हैं। घर टूटते हैं, खेत डूबते हैं, सड़कें बह जाती हैं और लोगों की सालों की मेहनत कुछ घंटों में मिट्टी में मिल जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हर बार नुकसान होने के बाद राहत पहुंचाना ही पर्याप्त है? क्या हम पहले से ऐसी तैयारी नहीं कर सकते, जिससे जान-माल का नुकसान कम हो?
ओडिशा ने दिखाई तैयारी की ताकत
साल 1999 में आए भीषण चक्रवात ने ओडिशा में करीब 10 हजार लोगों की जान ले ली थी। इस त्रासदी से राज्य ने सबक सीखा। साल 2019 में चक्रवात फानी के दौरान लाखों लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। मौसम की पूर्व चेतावनी, प्रशासन की तैयारी और स्थानीय लोगों के सहयोग ने कई जिंदगियां बचाने में मदद की।
यह अनुभव बताता है कि सही समय पर मिली जानकारी और समय रहते उठाए गए कदम किसी बड़े हादसे का असर कम कर सकते हैं। भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत आपदा प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था भी बनाई गई। फिर भी चुनौती यह है कि हमारी तैयारी केवल आपदा के समय सक्रिय होने तक सीमित न रहे। राहत सामग्री और मुआवजे के साथ-साथ बचाव, सुरक्षित निर्माण और जोखिम कम करने पर भी पर्याप्त खर्च होना चाहिए।
विकास की दौड़ में प्रकृति को न भूलें
हिमालयी क्षेत्रों में सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं और पर्यटन से जुड़े निर्माण तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन यदि इन कामों में पहाड़ों की सहनशीलता और पर्यावरण का ध्यान नहीं रखा गया, तो विकास ही विनाश का कारण बन सकता है। जोशीमठ में मकानों में दरारें और वायनाड में हुए भूस्खलन हमें सावधान करते हैं।
विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो लोगों की जान को खतरे में डाल दे। निर्माण से पहले वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन और स्थानीय परिस्थितियों की समझ जरूरी है। प्रकृति की अनदेखी करके बनाई गई इमारतें और सड़कें भविष्य में भारी कीमत वसूल सकती हैं।
मजबूत मोहल्ले, सुरक्षित गांव
आपदा से लड़ाई केवल सरकार के भरोसे नहीं जीती जा सकती। गांवों की पंचायतों, नगर निकायों और जिला प्रशासन को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। स्कूलों, अस्पतालों और आवासीय इलाकों में नियमित अभ्यास होने चाहिए। लोगों को यह पता होना चाहिए कि भूकंप आने पर क्या करें, बाढ़ के दौरान कहां जाएं और चक्रवात की चेतावनी मिलने पर कैसे सुरक्षित रहें।
गरीब परिवारों के लिए मजबूत घर बनाना और आपदा बीमा की सुविधा बढ़ाना भी जरूरी है। आपदा का सबसे भारी बोझ अक्सर उन्हीं लोगों पर पड़ता है, जिनके पास दोबारा शुरुआत करने के लिए सबसे कम साधन होते हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े?
वर्ष 2016 से 2025 के बीच हर साल औसतन करीब 10 करोड़ लोग आपदाओं से प्रभावित हुए। यह आंकड़ा बताता है कि प्राकृतिक आपदाएं आज भी करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका के लिए गंभीर चुनौती हैं।
आज की तैयारी, कल की सुरक्षा
दुनिया भर में आपदाओं से होने वाला कुल नुकसान, अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों और पारिस्थितिकी तंत्र को हुए नुकसान सहित, सालाना 2.3 लाख करोड़ डॉलर से अधिक आंका गया है। वहीं, वर्ष 2015 में जहां केवल 55 देशों में कई तरह की आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियां होने की सूचना थी, वहीं अब ऐसे देशों की संख्या बढ़कर 128 हो गई है। यह प्रगति उम्मीद जगाती है, लेकिन मंजिल अभी दूर है।
इसके साथ ही, प्रति एक लाख आबादी पर आपदाओं से होने वाली औसत मौतों में 65 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह प्रगति दिखाती है कि समय पर चेतावनी, बेहतर तैयारी और मजबूत आपदा प्रबंधन से लोगों की जान बचाई जा सकती है।
हमें याद रखना होगा कि आपदा को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन उससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सुरक्षित घर, मजबूत बुनियादी ढांचा, समय पर चेतावनी और जागरूक नागरिक इस दिशा में सबसे बड़े हथियार हैं। आखिरकार, आपदा के बाद मदद पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि आपदा आने पर किसी को अपना घर, परिवार और जीवन न खोना पड़े।