

केंद्र सरकार चार तटीय राज्यों में रेयर अर्थ कॉरिडोर स्थापित कर दुर्लभ खनिजों के खनन, प्रसंस्करण और उद्योग को बढ़ावा देगी।
आईएमडी द्वारा बाढ़ और चक्रवात के लिए सभी जिलों में सात दिन का पूर्वानुमान और दिन में चार बार चेतावनी।
स्वास्थ्य मंत्रालय के आईडीएसपी कार्यक्रम के तहत स्क्रब टाइफस, निपाह, रेबीज सहित कई जूनोटिक रोगों की निगरानी।
राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के तहत ई-वेस्ट और लिथियम बैटरियों से खनिज पुनर्चक्रण बढ़ाने के लिए 1500 करोड़ योजना।
वाहन स्क्रैपिंग नीति, आपदा जोखिम नेटवर्क और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से पर्यावरण संरक्षण तथा मत्स्य अवसंरचना को बढ़ावा।
देश में घरेलू दुर्लभ मटेरियल सप्लाई चेन को मजबूत करना
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण जारी है, इसी बीच सदन में उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में बताया कि भारत में दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मिनरल्स) आधुनिक तकनीक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, बैटरी, पवन ऊर्जा, रक्षा उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहनों में किया जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। सरकार ने खनिज-समृद्ध तटीय राज्यों में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने की योजना बनाई है। इन राज्यों में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं।
कॉरिडोर का उद्देश्य दुर्लभ खनिजों के खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और निर्माण को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से भारत में दुर्लभ खनिजों का पूरा औद्योगिक तंत्र विकसित किया जाएगा। खास तौर पर नियोडिमियम-प्रेजोडिमियम (एनडीपीआर) और सैमरियम ऑक्साइडके उत्पादन को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा। ये खनिज उच्च गुणवत्ता वाले रेयर अर्थ मैग्नेट बनाने में उपयोग होते हैं, जिनकी मांग दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है।
इसके साथ ही सरकार टाइटेनियम और जिरकोनियम से जुड़ी उद्योग श्रृंखला को भी मजबूत करना चाहती है। इससे देश में नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित होंगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इस विषय की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस पहल से भारत में दुर्लभ खनिजों का उत्पादन बढ़ेगा और देश वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।
बाढ़ और चक्रवातों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियां
सदन में पूछे गए एक और प्रश्न का उत्तर देते हुए आज, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में कहा कि भारत में हर साल कई क्षेत्रों में बाढ़ और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। इनसे लोगों की जान-माल को काफी नुकसान होता है। इन आपदाओं से बचाव के लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आईएमडी देश के सभी जिलों के लिए भारी बारिश और चक्रवात से संबंधित चेतावनियां जारी करता है। ये चेतावनियां दिन में चार बार अपडेट की जाती हैं और इनके पूर्वानुमान की अवधि सात दिनों तक होती है। इससे लोगों और प्रशासन को समय रहते तैयारी करने का अवसर मिलता है।
आईएमडी आधुनिक तकनीक का उपयोग करके रियल-टाइम मौसम चेतावनी और ग्राफिकल जानकारी तैयार करता है। यह जानकारी कई माध्यमों से लोगों तक पहुंचाई जाती है। इनमें कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (सीएपी), मोबाइल ऐप, वेबसाइट, व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया शामिल हैं।
हालांकि स्वचालित सायरन और अलर्ट सिस्टम की जिम्मेदारी राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) और राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (एसईओसी) की होती है। इसके अलावा आईएमडी, केंद्रीय जल आयोग को बारिश से संबंधित आंकड़े भी उपलब्ध कराता है, जिससे बाढ़ की भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है।
जूनोटिक रोग
जूनोटिक रोगों को लेकर सदन में उठे एक सवाल के जवाब में आज, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि जूनोटिक रोग वे बीमारियां होती हैं जो जानवरों से इंसानों में फैलती हैं। ये रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। इन रोगों की निगरानी और नियंत्रण के लिए भारत सरकार ने एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) शुरू किया है।
यह कार्यक्रम स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य देश में बीमारियों के प्रकोप का जल्दी पता लगाना और समय पर कार्रवाई करना है। इस कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न राज्यों से रोगों से संबंधित जानकारी एकत्र की जाती है और उनका विश्लेषण किया जाता है।
आईडीएसपी के अंतर्गत कई प्रमुख जूनोटिक रोगों की निगरानी की जाती है। इनमें स्क्रब टाइफस, लेप्टोस्पायरोसिस, ह्यूमन रेबीज, क्यासनूर फॉरेस्ट डिजीज (केएफडी), क्रीमियन कांगो हेमोरेजिक फीवर (सीसी एचएफ), निपाह वायरस डिजीज और वेस्ट नाइल फीवर शामिल हैं।
इन रोगों के बारे में समय पर जानकारी मिलने से स्वास्थ्य विभाग तुरंत कदम उठा सकता है और बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।
देश में वार्षिक ई-कचरा पुनर्चक्रण क्षमता
सदन में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित जवाब में आज, कोयला और खान मंत्रालय में राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने लोकसभा में कहा कि वर्तमान समय में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग बहुत बढ़ गया है। इससे ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरे) की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है। ई-वेस्ट में कई महत्वपूर्ण और महंगे खनिज होते हैं जिन्हें दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।
दुबे ने कहा कि इसी उद्देश्य से सरकार ने राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (एनसीएमएम) के तहत 1500 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है। यह योजना ई-वेस्ट, इस्तेमाल हो चुकी लिथियम-आयन बैटरियों और अन्य स्क्रैप से महत्वपूर्ण खनिजों को निकालने की क्षमता बढ़ाने के लिए बनाई गई है।
इस योजना की गाइडलाइन जारी कर दी गई है और इसे दो अक्टूबर, 2025 को शुरू किया गया था। इस योजना के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि एक अप्रैल 2026 निर्धारित की गई है।
इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में महत्वपूर्ण खनिजों की रीसाइक्लिंग क्षमता बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना है। इस संबंध में जानकारी में दी।
औपचारिक एंड-ऑफ-लाइफ वाहन (ईएलवी) रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे का विकास
सदन में उठाए गए सवाल के जवाब में आज, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन जयराम गडकरी ने राज्यसभा में बताया कि देश में पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन वाहनों से पर्यावरण को नुकसान होता है और सड़क सुरक्षा भी प्रभावित होती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने वोलंटरी व्हीकल फ्लीट मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (वी-वीएमपी) लागू किया है, जिसे सामान्य रूप से वाहन स्क्रैपिंग नीति कहा जाता है।
इस नीति के तहत पुराने और अनुपयोगी वाहनों को पर्यावरण के अनुकूल तरीके से हटाने और उन्हें स्क्रैप करने की व्यवस्था बनाई गई है। इसके लिए सरकार ने मोटर वाहन (वाहन स्क्रैपिंग सुविधा का पंजीकरण और कार्य) नियम, 2021अधिसूचित किए हैं। इन नियमों में समय-समय पर संशोधन भी किए गए हैं।
10 मार्च 2026 तक देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 134 पंजीकृत वाहन स्क्रैपिंग सुविधाएं (आरवीएसएफ) काम कर रही हैं। ये केंद्र पुराने वाहनों को सुरक्षित तरीके से तोड़ने और उनके पुर्जों को पुनः उपयोग के लिए तैयार करने का काम करते हैं।
इस पहल से वाहन स्क्रैपिंग का औपचारिक तंत्र विकसित हो रहा है और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। इस संबंध में जानकारी में दी।
भारत में आपदा के खतरों को कम करने के लिए नेटवर्क
सदन में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में आज, गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में कहा कि भारत में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए सरकार कई बड़े कदम उठा रही है। इसी दिशा में प्रधानमंत्री के 10-सूत्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एजेंडा के तहत एक अहम पहल की गई है।
सरकार ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए भारत विश्वविद्यालय और संस्थान नेटवर्क (आईयूआईएनडीआरआर) की स्थापना की है। यह नेटवर्क राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) के अंतर्गत काम करता है। इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और संस्थानों को आपदा प्रबंधन से संबंधित शिक्षा और शोध के लिए एक मंच प्रदान करना है।
इस नेटवर्क में देश के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान शामिल हैं। वर्तमान में 352 विश्वविद्यालय और संस्थान इस नेटवर्क के सदस्य हैं। इनमें 50 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 116 राज्य विश्वविद्यालय, 17 आईआईटी, 9 आईआईएम, 11 एनआईटी, 78 डीम्ड विश्वविद्यालय और 71 निजी विश्वविद्यालय शामिल हैं।
यह नेटवर्क आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है। इस संबंध में जानकारी में दी।
नीली क्रांति के लिए धन आवंटन
मत्स्य पालन को लेकर उठाए गए एक सवाल के जवाब में आज, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए कहा कि भारत में मत्स्य पालन क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) चला रही है। यह योजना मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत लागू की जा रही है।
इस योजना के तहत मछुआरों के लिए आधुनिक फिशिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज, मछली संरक्षण और परिवहन सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इससे मछुआरों की आय बढ़ाने और मछली उद्योग को मजबूत करने में मदद मिल रही है।
पिछले पांच वर्षों में इस योजना के तहत 58 फिशिंग हार्बर और फिश लैंडिंग सेंटर परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनकी कुल लागत 3365.64 करोड़ रुपये है। इसके अलावा मछली संरक्षण, कोल्ड चेन और मार्केटिंग सुविधाओं के लिए 2375.25 करोड़ रुपये की परियोजनाएं भी स्वीकृत की गई हैं।
इस योजना के माध्यम से देश में मत्स्य क्षेत्र का आधुनिक विकास हो रहा है और मछुआरों के जीवन स्तर में सुधार आ रहा है। इस संबंध में जानकारी में दी।