

क्या सचमुच हम पहले की तरह प्रेम करना भूल रहे हैं? या फिर प्रेम आज भी मौजूद है, बस उसका स्वरूप बदल गया है? कभी प्रेम का अर्थ था जीवनभर साथ निभाना। हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, लैला-मजनूं और रोमियो-जूलियट जैसी प्रेम कथाएं त्याग, समर्पण और अटूट प्रतिबद्धता के प्रतीक मानी जाती थीं। प्रेम केवल आकर्षण ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए हर कठिनाई सहने का साहस भी था। किन्तु आज मोबाइल की एक घंटी पर रिश्ते बनते हैं और कई बार एक संदेश के बाद रिश्ते टूट भी जाते हैं। ऐसे समय में जिग्मन बाउमन की “लिक्विड लव” पुस्तक हमारे दौर के प्रेम (मॉडर्न लव) और मानवीय संबंधों को समझने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
पुस्तक उन लोगों की कहानी कहती है जो अकेले तो नहीं रहना चाहते, लेकिन किसी के साथ पूरी तरह जुड़ने से भी डरते हैं, जो प्रेम की तलाश में हैं पर प्रतिबद्धता से घबराते हैं। लेखक हमें आधुनिक जीवन के उसी विरोधाभास से रूबरू कराते हैं, जहां संबंध पहले से अधिक आसानी से बनते हैं, लेकिन पहले से कहीं अधिक जल्दी टूट भी जाते हैं। यही प्रश्न, यही बेचैनी और यही मानवीय संघर्ष इस कृति में वर्णित हैं।
पुस्तक के पहले अध्याय में लेखक कहते हैं, आज के समय में लोगों के लिए रिश्ते बनाना आसान तो हुआ है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक निभाना कठिन होता जा रहा है। लोग प्रेम, अपनापन और साथ तो चाहते हैं पर साथ ही वे अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी नहीं खोना चाहते हैं। यही कारण है कि कई रिश्ते जल्दी बनते हैं और जल्दी टूट भी जाते हैं। लेखक “सेमी-डिटैच्ड कपल्स” का उदाहरण देते हैं, जहां दो लोग प्रेम संबंध में होते हैं, लेकिन अलग-अलग घरों में रहते हैं, अपने फैसले खुद लेते हैं, अपने पैसे और मित्र अलग रखते हैं और केवल अपनी सुविधा के अनुसार साथ समय बिताते हैं। अर्थात् जिसमें लोग संबंध तो चाहते हैं, लेकिन उससे जुड़ी जिम्मेदारियों से बचना भी चाहते हैं।
दूसरा अध्याय में लेखक कहते हैं, आधुनिक समाज में प्रेम, यौन संबंध और परिवार का अर्थ/स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले यौन संबंधों को प्रेम, जिम्मेदारी, परिवार और सामाजिक बंधनों से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन आज वे अधिक व्यक्तिगत पसंद और तात्कालिक संतुष्टि का विषय बनते जा रहे हैं। आधुनिक व्यक्ति संबंध तो चाहता है, लेकिन स्थायी प्रतिबद्धता से बचना भी चाह रहा है। यही कारण है कि रिश्ते मोबाइल फोन के संपर्कों की तरह हो गए हैं, जब जरूरत हो तो जुड़ जाओ और जब मन न हो तो अलग हो जाओ।
यदि कोई संबंध काम न करे, तो दूसरा विकल्प हमेशा मौजूद है। इस सोच ने रिश्तों को पहले की तुलना में अधिक अस्थायी और कमजोर बना दिया है। आज बच्चे/युवा भी कई बार प्रेम और परिवार की स्वाभाविक प्रक्रिया के बजाय व्यक्तिगत इच्छाओं और भावनात्मक संतुष्टि के संदर्भ में देखे जाने लगे हैं। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने मानवीय संबंधों को भी वस्तुओं की तरह प्रभावित किया है, जहां लोग यह सोचने लगे हैं कि किसी रिश्ते से उन्हें कितना लाभ, सुख या संतोष मिल रहा है। अर्थात् लोग जुड़ना तो चाहते हैं, पर बंधना नहीं चाहते। यही आधुनिक प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना है।
तीसरे अध्याय लेखक प्रश्न उठाते हैं कि क्या आज के समय में दूसरों से निःस्वार्थ प्रेम करना संभव है? वे बताते हैं कि सभ्यता/समाज/संस्कृति हमें सिखाती है कि अपने पड़ोसी या दूसरे व्यक्ति से प्रेम करो, लेकिन आधुनिक जीवन हमें अपने हित, लाभ और व्यक्तिगत सुख को प्राथमिकता देना भी सिखाता है। इसी कारण दूसरों से बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करना कठिन होता जा रहा है। सच्चा प्रेम केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होना चाहिए जो हमारे जैसे हैं या जो हमें लाभ पहुंचाते हैं। किसी अनजान व्यक्ति के प्रति भी सम्मान, सहानुभूति और मानवता का भाव रखना ही प्रेम का वास्तविक अर्थ है। लेखक कहते हैं, आज कई संबंध “शुद्ध संबंध” बन गए हैं, जो तब तक चलते हैं जब तक दोनों व्यक्तियों को उनसे संतुष्टि मिलती रहती है। जैसे ही संतुष्टि कम होती है, संबंध टूटने लगते हैं। इसलिए आधुनिक प्रेम पहले की तुलना में अधिक शर्तों और अपेक्षाओं पर आधारित हो गया है।
चौथे अध्याय में लेखक समकालीन समाज में बढ़ती हुई घृणा, डर और अजनबियों के प्रति अविश्वास की चर्चा करते हैं। वे कहते हैं कि वैश्वीकरण और सामाजिक परिवर्तनों के कारण लोगों के जीवन में असुरक्षा और अनिश्चितता बढ़ गई है। जब लोग अपनी समस्याओं और परेशानियों का कारण नहीं समझ पाते, तो वे अक्सर उसका दोष बाहरी लोगों, प्रवासियों या कमजोर समूहों पर डाल देते हैं। आधुनिक समाज ऐसे लोगों को बना रहा है, जिन्हें व्यवस्था के लिए “अनावश्यक” या “बेकार” समझ लिया जाता है। शरणार्थी, विस्थापित लोग और प्रवासी इसी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाते हैं। वे अपने घर और पहचान दोनों खो देते हैं और समाज के किनारे पर धकेल दिए जाते हैं।
इस पुस्तक को पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक ने समकालीन जीवन की एक ऐसी सच्चाई को सामने रख रखा है, जिससे लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है या प्रभावित है। बदलते समय, बढ़ती दूरियों और जीवन की व्यस्तताओं के बीच रिश्तों को बनाए रखना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। प्रेम केवल किसी के करीब आने का नाम नहीं है, बल्कि विश्वास, समझ और साथ बने रहने का भी नाम है। यही बात इस पुस्तक को आज के समय में और अधिक प्रासंगिक और विचारोत्तेजक बनाती है।
सन्दर्भ: जिग्मुंट बाउमन, “लिक्विड लव: ऑन द फ्रेल्टी ऑफ ह्यूमन बॉन्ड्स” पॉलिटी प्रेस, 2003, 162 पृष्ठ