पैलेट गन‑इलेक्ट्रिक शॉक का इस्तेमाल दिव्यांग अधिकार कानून और संविधान की मूल भावना के खिलाफ: एनपीआरडी

शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन और इलेक्ट्रिक शॉक का इस्तेमाल स्थायी दिव्यांगता, अंधापन और मानसिक आघात बढ़ा रहा है, जिसे एनपीआरडी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन और संविधान की मूल भावना के खिलाफ मान रहा है
फोटो: आईस्टॉक
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पैलेट गन से आंखों में ऐसी चोटें लगती है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता और लोगों की आंखों की रोशनी स्थायी रूप से चली जाती है, वहीं इलेक्ट्रिक शॉक हथियारों के उपयोग से न्यूरोलॉजिकल और दिल से जुड़ी समस्याएं, गंभीर मानसिक आघात, रीढ़ की हड्डी में चोट व अन्य दीर्घकालिक दिव्यांग हो सकती है।

यह बात नेशनल प्लेटफार्म फॉर द राइट्स ऑफ द डिसेबल्ड (एनपीआरडी) के महासचिव मुरलीधरन ने डाउन टू अर्थ से कही।

उनका कहना है कि जिन हथियारों का नतीजा स्थायी दिव्यांगता हो सकता है, उन्हें नागरिकों के विरोध-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

मुरलीधरन कहते हैं कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन और इलेक्ट्रिक शॉक हथियारों के इस्तेमाल कहीं भी नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इन हथियारों से स्थायी दिव्यंगता होने के सौ फीसदी संभावना होती हैं।

मुरलीधर ने कहा कि पैलेट गन से होने वाला हर अंधापन और ऐसी हर स्थायी दिव्यंगता जिसे रोका जा सकता है, केवल एक चोट नहीं है, यह सरकार द्वारा पैदा की गई दिव्यंगता है। जो सरकार दिव्यंगता लोगों के अधिकारों, सम्मान और उन्हें समाज में शामिल करने के प्रति प्रतिबद्ध होने का दावा करती है, वह ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नहीं कर सकती जिनका नतीजा दिव्यंगता पैदा करना हो।

ऐसे काम ‘’दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’’, ‘’दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’’ और भारत के संविधान के तहत जीवन, समानता और सम्मान की गारंटी में शामिल मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ हैं।

वह कहते हैं कि जब सरकार खुद ही दिव्यांगता पैदा करने का कारण बन जाए तो दिव्यांग अधिकार आंदोलन चुप नहीं रह सकता। मुरलीधरन कहते हैं कि जिन लोगों की छर्रे लगने से दृष्टि पूरी तरह से चली जाती है, वो मानसिक सदमे, निराशा और डिप्रेशन में डूब जाते हैं,एक पल में उ उनकी पूरी जिंदगी एक पल में बदल जाती है, जिनकी जिंदगी में एक समय उजाला रहा हो, हमेशा लिए अधेरे में धकेल दिए जाते हैं। 

उनका कहना है कि देश के अधिकांश दिव्यांगता अधिकार संगठनों ने हमेशा पैलेट गन के इस्तेमाल का विरोध किया है, खासकर तब से जब पहली बार जम्मू-कश्मीर में इनका इस्तेमाल किया गया था, जहां सैकड़ों नागरिकों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई थी। ऐसे हथियारों को हटाने के बजाय, जिनसे कभी न ठीक होने वाला नुकसान होता है, देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकों के खिलाफ इनका इस्तेमाल जारी है। इलेक्ट्रिक शॉक हथियारों के इस्तेमाल की खबरों ने हमारी चिंताएं और बढ़ गई हैं।

भारत सरकार ने 26 जुलाई 2016 को एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया था। इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऐसे गैर घातक विकल्पों की पहचान करना था, जिससे लोगों को गंभीर चोट न पहुंचे। समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने यह तय किया कि किसी भी हिंसक स्थिति में सुरक्षा बल सीधे इस हथियार का सहारा नहीं लेंगे, बल्कि पहले अन्य कम नुकसान पहुंचाने वाले साधनों का इस्तेमाल करके भीड़ तो इधर-उधर करने का प्रयास किया जाएगा। 

यही नहीं साल 2017 में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने भी बताया था कि पेलेट गन का इस्तेमाल सुरक्षा बल अपनी मर्जी से किसी भी स्थिति में नहीं कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल से पहले कई तरह के वैधानिक चरणों और सुरक्षा मानकों का पालन करना बेहद अनिवार्य होता है, ताकि जान-माल का नुकसान न हो। ध्यान रहे कि  पैलेट गन का सबसे घातक पहलू इसका अनियंत्रित बिखराव है। 

निशाना साधकर फायर करने के बाद भी इसके छर्रे एक निश्चित दिशा की बजाय चारों ओर फैल जाते हैं. इस कारण न केवल प्रदर्शन में शामिल उग्र लोग बल्कि आसपास से गुजर रहे निर्दोष नागरिक या फिर दूर खड़े लोग भी इसकी चपेट में आ जाते हैं। मूल रूप से इस तरीके के हथियारों का इस्तेमाल जंगल में शिकार के लिए किया जाता था, क्योंकि छर्रों के फैलने से भागते हुए जानवरों पर निशाना लगाना आसान हो जाता था, लेकिन इंसानी भीड़ पर इसका असर जानलेवा साबित होता है। 

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