

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर बच्चों और किशोरों की मानसिक परेशानियों को समझने और समय पर मदद देने पर जोर दिया गया।
शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में बच्चों की मानसिक सेहत सुधारने के लिए स्कूल मानसिक स्वास्थ्य नीति के मसौदे की समीक्षा की।
प्रस्तावित नीति के तहत स्कूलों में तनाव, चिंता और पढ़ाई के दबाव के शुरुआती संकेतों की पहचान करने पर जोर दिया गया।
शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानने का प्रशिक्षण देने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की मदद लेने की योजना है।
स्कूलों में ध्यान, भावनात्मक सहयोग और आपसी विश्वास बढ़ाकर बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।
हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और मानसिक परेशानियों को समझने के लिए प्रेरित करना है। आज के समय में बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत पर ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है। पढ़ाई का दबाव, परीक्षा का डर, परिवार की उम्मीदें और समाज में स्वीकार किए जाने की चिंता कई बार बच्चों को मानसिक तनाव में डाल देती हैं। लेकिन अक्सर उनकी परेशानियों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।
बच्चों को अक्सर अपनी बात खुलकर कहने के लिए कहा जाता है, लेकिन कई बार उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे क्या महसूस कर रहे हैं। कुछ बच्चे डरते हैं कि उनकी बात का मजाक उड़ाया जाएगा या उन्हें गलत समझा जाएगा। इसी कारण वे अपनी परेशानियां दूसरों से साझा नहीं कर पाते।
स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान
बच्चों की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने स्कूल मानसिक स्वास्थ्य नीति के मसौदे की समीक्षा की है। इस पहल का उद्देश्य स्कूलों में ऐसा माहौल बनाना है, जहां बच्चों की मानसिक परेशानियों को समय रहते पहचाना जा सके और उन्हें जरूरी मदद मिल सके।
प्रस्तावित नीति के तहत स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य को पढ़ाई का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए मानसिक स्वास्थ्य की नियमित जांच, तनाव के शुरुआती संकेतों की पहचान और बच्चों को भावनात्मक सहयोग देने जैसे कदम उठाने की बात कही गई है।
नीति का उद्देश्य केवल समस्या बढ़ने के बाद मदद देना नहीं है, बल्कि शुरुआत से ही बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना है। इससे बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने, मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में सहायता मिल सकती है।
शिक्षकों और अभिभावकों की होगी अहम भूमिका
स्कूल मानसिक स्वास्थ्य नीति में शिक्षकों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना गया है। शिक्षक बच्चों के साथ रोजाना समय बिताते हैं। इसलिए वे उनके व्यवहार में होने वाले बदलावों को आसानी से पहचान सकते हैं।
नीति के तहत शिक्षकों को तनाव, चिंता, उदासी और पढ़ाई से होने वाली थकान जैसे शुरुआती संकेतों को समझने के लिए प्रशिक्षित करने पर जोर दिया गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि शिक्षक पेशेवर काउंसलर की जगह लेंगे। उनकी भूमिका बच्चों की परेशानी पहचानने और जरूरत पड़ने पर उन्हें विशेषज्ञों तक पहुंचाने की होगी।
इसके साथ ही अभिभावकों को भी बच्चों के व्यवहार और घरेलू माहौल पर ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों की बात धैर्य से सुनना, उनकी तुलना दूसरों से न करना और उनकी परेशानियों को छोटा न समझना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए मददगार हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर चुप्पी तोड़ने की दिशा में काम हुआ है, लेकिन बच्चों की आत्महत्या की घटनाएं बताती हैं कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उनके अनुसार, बच्चों को मदद देने के लिए संकट का इंतजार नहीं करना चाहिए। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं नियमित रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।
पढ़ाई के साथ भावनात्मक विकास भी जरूरी
प्रस्तावित नीति में स्कूलों के भीतर सहानुभूति, आपसी विश्वास और सहयोग का माहौल बनाने पर भी जोर दिया गया है। इसके अलावा, भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी ध्यान और सजगता जैसी गतिविधियों को भी स्कूलों में शामिल करने की बात कही गई है। इनसे बच्चों को तनाव कम करने और परीक्षा के दबाव से निपटने में मदद मिल सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य को केवल आपात स्थिति में ध्यान देने वाली समस्या नहीं समझना चाहिए। जैसे शारीरिक स्वास्थ्य के लिए रोज अच्छी आदतें जरूरी हैं, वैसे ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बचपन से भावनात्मक मजबूती और मुश्किलों से निपटने के कौशल विकसित करना जरूरी है।
बच्चों की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने के लिए सरकार, स्कूलों और परिवारों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को ऐसा माहौल मिलना चाहिए, जहां वे बिना डर अपनी बात कह सकें और जरूरत पड़ने पर मदद मांग सकें। आखिरकार, शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक दिलाना नहीं, बल्कि बच्चों को स्वस्थ, आत्मविश्वासी और खुशहाल इंसान बनाना भी है।