जलवायु परिवर्तन से सामाजिक जीवन प्रभावित, लोग कम बाहर निकल रहे, जिससे रिश्ते और समुदाय की एकता धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
जलवायु परिवर्तन से सामाजिक जीवन प्रभावित, लोग कम बाहर निकल रहे, जिससे रिश्ते और समुदाय की एकता धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक

मानसिक स्वास्थ्य का संकट और समाज की चुप्पी

भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वर्ष 2012 से 2030 के बीच 1.03 ट्रिलियन डॉलर का अनुमानित आर्थिक नुकसान होने की आशंका है
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हालिया रिपोर्टों और राष्ट्रीय अध्ययनों से उभरती तस्वीर बताती है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य का संकट केवल चिकित्सा या इलाज की कमी का नहीं है। यह संकट अकेलेपन, सामाजिक दबाव, भेदभाव, असफलता के डर, मदद मांगने में झिझक आदि से भी गहरा जुड़ा है।

अभी हाल ही में दस अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया गया। इस बार विश्व स्वास्थ्य संगठन की थीम रखी गई थी- मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से गुजरे लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों को सुनना तथा उन्हें नीतियों और सेवाओं के निर्माण में सक्रिय भागीदार बनाना। यह विडंबना है कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत अब तक केवल बीमारी, डॉक्टर, दवा और अस्पताल के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।

हाल ही में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामने आए आंकड़े इस बहस को और अधिक गंभीर बनाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल की ओर से किए गए सर्वेक्षण में 2.43 लाख से अधिक विद्यार्थियों के जवाबों का विश्लेषण किया गया। सर्वेक्षण के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार लगभग पंद्रह प्रतिशत विद्यार्थियों ने पिछले छह महीनों में लंबे समय तक तनाव, उदासी या गंभीर चिंता का अनुभव किया, जबकि करीब नौ प्रतिशत विद्यार्थियों ने पिछले एक वर्ष में बहुधा आत्महत्या के विचारों के आने की बात स्वीकार की।

इन आंकड़ों को केवल परीक्षा, नौकरी या प्रतियोगिता के क्षणिक दबाव का परिणाम मान लेना अधूरी समझ होगी। राष्ट्रीय कार्यबल ने देश के तीस उच्च शिक्षण संस्थानों का दौरा कर और पच्चीस दौर की हितधारक चर्चाएं आयोजित कर यह स्पष्ट किया है कि मानसिक तनाव का संबंध शैक्षणिक दबाव के साथ-साथ सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव और संस्थागत कमियों से भी है।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए निमहंस द्वारा किए गए 'राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण' के परिणाम महत्वपूर्ण हैं। इस अध्ययन के अनुसार, देश की वयस्क आबादी का लगभग 10.6 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी मानसिक विकार से ग्रस्त है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में अस्सी से पचासी प्रतिशत का 'ट्रीटमेंट गैप' मौजूद है, यानी जिन्हें चिकित्सकीय मदद की सख्त आवश्यकता है, उनमें से अधिकांश तक सुविधाएं पहुँच ही नहीं पातीं।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा हाल ही में किए गए 'ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज' अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि भारत में प्रति सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी स्तर के अवसाद या चिंता से प्रभावित है। इस अध्ययन के अनुसार, 1990 के बाद से भारत में मानसिक विकारों का कुल बीमारी के बोझ में योगदान लगभग दोगुना हो चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आर्थिक आकलन के अनुसार, भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण वर्ष 2012 से 2030 के बीच 1.03 ट्रिलियन डॉलर का अनुमानित आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।

वैसे देखा जाए तो मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध व्यक्ति की दिनचर्या, परिवार, कार्यस्थल, शिक्षा, व्यक्तिगत संबंधों और सामाजिक वातावरण से होता है। कोई व्यक्ति बाहर से पूर्णतः सामान्य और हंसमुख दिख सकता है, लेकिन भीतर ही भीतर वह गहरे तनाव, अकेलेपन या निराशा से जूझ रहा हो सकता है। यहीं पर हमारी सामाजिक समझ की बुनियादी कमजोरी उजागर होती है। शारीरिक बीमारी होने पर डॉक्टर के पास जाना बहुत सामान्य माना जाता है, लेकिन मानसिक परेशानी की बात आते ही व्यक्ति को कमजोर, असफल या जरूरत से ज्यादा सोचने वाला करार दे दिया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि पीड़ित व्यक्ति सामाजिक कलंक के डर से मदद मांगने से कतराता रहता है।

आज देश में, विशेषकर युवाओं के सामने सफलता की बेहद कठिन परिभाषा गढ़ी जा रही है। सर्वोच्‍च अंक, प्रतिष्ठित संस्थान, ऊंची आय वाली नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच असफलता या विश्राम के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है। सोशल मीडिया ने इस मानसिक दबाव को और अधिक जटिल बना दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दूसरों की उपलब्धियां और चमचमाती जीवनशैली तो लगातार दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे का संघर्ष और अकेलापन छिपा रहता है। युवा जब अपनी वास्तविक जिंदगी की तुलना दूसरों की आभासी उपलब्धियों से करने लगते हैं, तो प्रतियोगिता केवल परीक्षा या करियर तक सीमित न रहकर जीवन के हर पहलू में प्रवेश कर जाती है।

देश ने हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने और ढांचागत विस्तार के लिए कई जरूरी कदम उठाए हैं। देश के 767 जिलों में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को स्वीकृति दी जा चुकी है और इसे आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर से जोड़ा जा रहा है। डिजिटल परामर्श के क्षेत्र में टेली-मानस एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ है। देश के छत्तीस राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तिरपन टेली-मानस सेल कार्यरत हैं, जो बीस से अधिक भाषाओं में चौबीसों घंटे सेवाएं दे रहे हैं और अब तक चौंतीस लाख से अधिक कॉल संभाल चुके हैं।

लेकिन केवल नेटवर्क या नंबर बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या ये सेवाएं अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक बिना किसी हिचकिचाहट के पहुंच पा रही हैं? क्या ग्रामीण और छोटे शहरों में विशेषज्ञों की उपलब्धता है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या समाज में ऐसा माहौल बन पाया है जहाँ व्यक्ति बिना किसी डर या शर्म के मदद मांग सके?

मानसिक स्वास्थ्य का संकट केवल स्वास्थ्य मंत्रालय या अस्पतालों का दायित्व नहीं हो सकता। शिक्षा, रोजगार, पारिवारिक ढांचा, शहरी नियोजन और डिजिटल वातावरण ये सभी इससे प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस बात पर जोर दे रहा है कि मानसिक देखभाल को बड़े संस्थानों से निकालकर समुदाय, परिवार और अधिकार-आधारित सेवाओं की ओर ले जाया जाए। मानसिक परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति को अलग-थलग करने के बजाय परिवार के भीतर ही सम्मानजनक और संवेदनशील सहयोग मिलना चाहिए।

इसी तरह, स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को केवल साल में कुछेक जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। केवल काउंसलर नियुक्त कर देना काफी नहीं है, बल्कि ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ छात्रों को यह भरोसा हो कि उनकी बात बिना किसी निर्णय के सुनी जाएगी। आत्महत्या के मामलों के पीछे भी केवल चिकित्सीय विकार ही नहीं, बल्कि आर्थिक संकट, भेदभाव, हिंसा, अचानक आया आघात और गहरा अकेलापन जैसे सामाजिक कारण होते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पारिवारिक समस्याएं और बीमारी के अलावा सामाजिक व आर्थिक तनाव आत्महत्या के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसलिए इसकी रोकथाम के प्रयास अस्पतालों से पहले समाज में होने चाहिए।

मानसिक रूप से स्वस्थ समाज का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी को दुख, तनाव या असफलता का सामना न करना पड़े। इसका वास्तविक अर्थ यह है कि जब भी कोई व्यक्ति जीवन के कठिन दौर से गुजर रहा हो, तो वह खुद को अकेला न पाए। भारत के सामने चुनौती विशाल है, लेकिन इसका समाधान केवल अस्पतालों और मनोचिकित्सकों की संख्या बढ़ाने से नहीं निकलेगा। हमें परिवारों को अधिक संवेदनशील बनाना होगा, शैक्षणिक संस्थानों और कार्यस्थलों को सहयोगपूर्ण बनाना होगा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को तोड़ना होगा।

मानसिक स्वास्थ्य केवल मस्तिष्क की कोई व्यक्तिगत समस्या नहीं है, यह इस बात का दर्पण है कि हमारा समाज और हमारी संस्थाएं मनुष्य के साथ कैसा व्यवहार करती हैं। इस विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम मानसिक तनाव से जूझ रहे व्यक्ति को केवल मरीज मानेंगे, या एक ऐसा इंसान जिसे सुने जाने, समझे जाने और गरिमा के साथ जीने का पूरा अधिकार है?

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