सेहत पर भारी पड़ रहे चीनी युक्त मीठे पेय पदार्थ, डब्ल्यूएचओ ने टैक्स बढ़ाने पर दिया जोर

रिपोर्ट में सामने आया है कि 116 देश मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन यह टैक्स अक्सर सिर्फ सोडा तक सीमित है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मीठे पेय पदार्थों और शराब पर टैक्स बढ़ाने की सिफारिश की है।

  • रिपोर्ट के अनुसार, इन उत्पादों की सस्ती कीमतें मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग जैसी बीमारियों के बढ़ते खतरे का कारण बन रही हैं।

  • रिपोर्ट में सामने आया है कि 116 देश मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन यह टैक्स अक्सर सिर्फ सोडा तक सीमित है।

  • 100 फीसदी फलों के रस, दूध से बने मीठे पेय और रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी-चाय जैसे हाई-शुगर उत्पाद अब भी टैक्स के दायरे से बाहर हैं। वहीं, 97 फीसदी देश एनर्जी ड्रिंक्स पर टैक्स तो लगाते हैं, लेकिन 2023 के बाद से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।

  • ऐसे में टैक्स बढ़ाकर सरकारें न केवल इनका सेवन कम कर सकती हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन भी जुटा सकती हैं।

दुनिया भर में मीठे पेय पदार्थ और शराब लगातार सस्ते होते जा रहे हैं। वजह है, अधिकांश देशों में इन पर बहुत कम टैक्स। नतीजा यह कि मोटापा, डायबिटीज, हृदय सम्बन्धी रोग, कैंसर और दुर्घटनाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका सबसे ज्यादा असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई वैश्विक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि कमजोर कर नीतियों के चलते स्वास्थ्य के लिए हानिकारक यह उत्पाद सस्ते बने हुए हैं, जबकि इनकी वजह से ऐसी बीमारियों का बोझ स्वास्थ्य प्रणालियों पर लगातार बढ़ रहा है, जिन्हें रोका जा सकता है।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “स्वास्थ्य कर बीमारियों से बचाव और बेहतर सेहत के लिए हमारे सबसे असरदार औजारों में से एक हैं।

तंबाकू, मीठे पेय और शराब पर टैक्स बढ़ाकर सरकारें न सिर्फ इनके सेवन को कम कर सकती हैं, बल्कि जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संसाधन भी जुटा सकती हैं।“

मुनाफा कंपनियों को, कीमत चुका रहा समाज

डब्ल्यूएचओ के अनुसार मीठे पेय और शराब का वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का है। इससे जुड़ी कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन सरकारों को इनसे मिलने वाला स्वास्थ्य कर बहुत सीमित है। इसका खामियाजा समाज को लंबे समय तक बीमारियों और आर्थिक नुकसान के रूप में भुगतना पड़ता है।

रिपोर्ट में सामने आया है कि 116 देश मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन यह टैक्स अक्सर सिर्फ सोडा तक सीमित है। 100 फीसदी फलों के रस, दूध से बने मीठे पेय और रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी-चाय जैसे हाई-शुगर उत्पाद अब भी टैक्स के दायरे से बाहर हैं। वहीं, 97 फीसदी देश एनर्जी ड्रिंक्स पर टैक्स तो लगाते हैं, लेकिन 2023 के बाद से इसमें कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है।

185 देशों में इसकी खपत को लेकर किए एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि 1990 के बाद से वयस्कों में इसकी खपत 16 फीसदी बढ़ी है, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक है।

सस्ती शराब, खतरा बड़ा

डब्ल्यूएचओ की एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया है कि 167 देश शराब पर टैक्स लगाते हैं, जबकि 12 देशों में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके बावजूद 2022 के बाद से अधिकतर देशों में शराब या तो और सस्ती हुई है या उसके दाम जस के तस हैं। इसकी वजह है टैक्स का महंगाई और आय में बढ़ोतरी के साथ तालमेल न बैठा पाना।

चौंकाने वाली बात यह है कि यूरोप के कई देशों समेत कम से कम 25 देशों में वाइन पर कोई टैक्स नहीं लगता। डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञ डॉक्टर एटिएन क्रुग कहते हैं, “सस्ती शराब हिंसा, चोटों और बीमारियों को बढ़ावा देती है। मुनाफा उद्योग कमाता है, लेकिन स्वास्थ्य का नुकसान आम लोग उठाते हैं और आर्थिक बोझ पूरे समाज पर पड़ता है।“

टैक्स बेहद कम, असर भी कमजोर

डब्ल्यूएचओ विश्लेषण में सामने आया है कि बीयर पर औसतन महज 14 फीसदी और स्पिरिट्स पर 22.5 फीसदी ही एक्साइज टैक्स है। मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स इतना कमजोर है कि एक आम सोडा की कीमत का महज करीब दो फीसदी ही टैक्स होता है।

इतना ही नहीं बहुत कम देश ही टैक्स को महंगाई के हिसाब से बढ़ाते हैं, जिससे ये हानिकारक उत्पाद समय के साथ और सस्ते हो जाते हैं।

हालांकि 2022 के गैलप सर्वे में अधिकांश लोगों ने शराब और मीठे पेय पदार्थों पर ज्यादा टैक्स का समर्थन किया था। इसी को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने अपनी नई ‘3 बाय 35’ पहल के तहत देशों से अपील की है कि वे 2035 तक तंबाकू, शराब और मीठे पेय पदार्थों की वास्तविक कीमतें बढ़ाएं, ताकि इनके बढ़ते उपयोग को सीमित करने के साथ-साथ लोगों की सेहत को बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सके।

बता दें कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) भी लम्बे समय से लोगों की सॉफ्ट ड्रिंक्स, एनर्जी ड्रिंक्स और अन्य मीठे पेय पदार्थों के चलते बढ़ते खतरों को लेकर सजग करता रहा है।

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in