तनाव से बदलती हैं दिमाग की खास कोशिकाएं, नई रिसर्च से इलाज की उम्मीद

तनाव से दिमाग की खास कोशिकाओं में बदलाव, छोटी संरचना की नई खोज से चिंता और अवसाद के इलाज की उम्मीद बढ़ी
तनाव के दौरान दिमाग की एस्ट्रोसाइट्स कोशिकाओं में बदलाव देखा गया, जिससे चिंता और अवसाद को समझने में मदद मिल सकती है।
तनाव के दौरान दिमाग की एस्ट्रोसाइट्स कोशिकाओं में बदलाव देखा गया, जिससे चिंता और अवसाद को समझने में मदद मिल सकती है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • तनाव के दौरान दिमाग की एस्ट्रोसाइट्स कोशिकाओं में बदलाव देखा गया, जिससे चिंता और अवसाद को समझने में मदद मिल सकती है।

  • एमिग्डाला की एस्ट्रोसाइट्स पर मौजूद प्राइमरी सिलियम तनाव के कारण छोटे हुए, जिससे कोशिकाओं की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित हुई।

  • वैज्ञानिकों ने सिलियम को बहाल करने पर चूहों में चिंता और सामान्य गतिविधियों में रुचि से जुड़े व्यवहारों में सुधार देखा।

  • एस1पीआर1 रिसेप्टर को निशाना बनाने वाली पोनसिमोड दवा ने तनावग्रस्त चूहों में कुछ सकारात्मक बदलाव दिखाए, जिससे नई उम्मीद जगी।

  • रिसर्च शुरुआती चरण में है और इंसानों में इसकी प्रभावशीलता साबित करने के लिए अभी आगे अध्ययन जरूरी होंगे।

लंबे समय तक रहने वाला तनाव केवल हमारे मूड और व्यवहार को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि दिमाग की कुछ खास कोशिकाओं में भी बदलाव कर सकता है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिलिस (यूसीएलए) हेल्थ के शोधकर्ताओं ने एक नई रिसर्च में दिमाग की ऐसी कोशिकाओं और उनकी एक बेहद छोटी संरचना की पहचान की है, जो तनाव के दौरान बदल जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह खोज भविष्य में चिंता और अवसाद जैसे मानसिक रोगों के इलाज के लिए एक नया रास्ता खोल सकती है।

न्यूरॉन नहीं, इन कोशिकाओं पर ध्यान

अब तक तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी ज्यादातर रिसर्च में दिमाग की न्यूरॉन नाम की कोशिकाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जाता रहा है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एस्ट्रोसाइट्स नाम की कोशिकाओं पर गौर किया। ये दिमाग में मौजूद सहायक कोशिकाएं हैं, जिन्हें ग्लियल सेल भी कहा जाता है।

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एस्ट्रोसाइट्स दिमाग की सामान्य गतिविधियों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन लंबे समय तक तनाव पड़ने पर इन कोशिकाओं में भी बदलाव हो सकता है। शोधकर्ताओं ने खास तौर पर दिमाग के एमिग्डाला हिस्से में मौजूद एस्ट्रोसाइट्स का अध्ययन किया। एमिग्डाला डर, भावनाओं और तनाव से जुड़ी प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कोशिका की छोटी ‘एंटीना’ में बदलाव

रिसर्च में सबसे दिलचस्प बात एस्ट्रोसाइट्स की सतह पर मौजूद एक बेहद छोटी संरचना को लेकर सामने आई। इसे ‘प्राइमरी सिलियम’ कहा जाता है। यह एक तरह की छोटी एंटीना जैसी संरचना होती है, जो कोशिका को अपने आसपास से मिलने वाले संकेतों को समझने और उन पर प्रतिक्रिया करने में मदद करती है।

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चूहों पर किए गए प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने पाया कि लंबे समय तक तनाव में रहने के बाद एमिग्डाला की एस्ट्रोसाइट्स में मौजूद ये सिलियम छोटे हो गए। इसके साथ ही कोशिकाओं में मौजूद कुछ जीन और प्रोटीन के स्तर में भी बदलाव देखा गया।

सिलियम को दोबारा ठीक करने की कोशिश

इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि अगर इन छोटे सिलियम को दोबारा सामान्य किया जाए तो क्या तनाव के प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने दो अलग-अलग तरीके अपनाए।

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इन प्रयोगों से पता चला कि एस्ट्रोसाइट्स में सिलियम को बहाल करने पर तनाव के कारण हुए कई आणविक बदलाव कम हो गए। चूहों के व्यवहार में भी सुधार दिखाई दिया। उनमें चिंता जैसे लक्षण कम हुए और उन गतिविधियों में रुचि वापस आई, जिनमें आमतौर पर उन्हें आनंद मिलता था।

मौजूदा दवा से मिली उम्मीद

इस रिसर्च का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एस1पीआर1 नाम के रिसेप्टर से जुड़ा है। यह रिसेप्टर एस्ट्रोसाइट्स में पाया जाता है और वैज्ञानिकों ने पाया कि इसे प्रभावित करने से सिलियम पर असर पड़ सकता है।

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खास बात यह है कि एस1पीआर1 पहले से ही एक ऐसी दवा का लक्ष्य है, जिसे मल्टीपल स्केलेरोसिस के इलाज के लिए मंजूरी मिल चुकी है। इस दवा का नाम पोनसिमोड है। जब शोधकर्ताओं ने तनावग्रस्त चूहों को पोनसिमोड दिया, तो उनमें भी कुछ ऐसे सुधार देखे गए जो सिलियम को बहाल करने वाले प्रयोगों में दिखाई दिए थे।

इंसानों में भी मिले संकेत

वैज्ञानिकों ने केवल चूहों पर ही प्रयोग नहीं किया। उन्होंने मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों के दिमाग के ऊतकों में जीन की गतिविधि का भी अध्ययन किया। इनमें गंभीर अवसाद, बाइपोलर डिसऑर्डर और कुछ मनोविकारी विकारों से जुड़े मामले शामिल थे।

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इस अध्ययन में एस्ट्रोसाइट्स के सिलियम से जुड़े कुछ जीनों में बदलाव पाए गए। इससे चूहों में मिले निष्कर्षों को और मजबूती मिली। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे हैं कि यही बदलाव इंसानों में चिंता या अवसाद का सीधा कारण है।

इलाज की दिशा में अभी लंबा रास्ता

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह शुरुआती स्तर की खोज है। अभी तक मुख्य प्रयोग चूहों पर किए गए हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि एस्ट्रोसाइट्स के सिलियम को निशाना बनाकर इंसानों में अवसाद या चिंता का इलाज किया जा सकता है।

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फिर भी यह रिसर्च महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे तनाव और मानसिक बीमारियों को समझने का एक नया तरीका सामने आया है। भविष्य में अगर इंसानों पर होने वाले अध्ययनों में भी इसी तरह के नतीजे मिलते हैं, तो दिमाग की इन छोटी संरचनाओं को निशाना बनाकर नई दवाएं या उपचार विकसित किए जा सकते हैं।

इस खोज से एक बात साफ होती है कि तनाव का असर दिमाग पर हमारी सोच से कहीं ज्यादा जटिल है। न्यूरॉन के साथ-साथ दिमाग की सहायक कोशिकाएं और उनकी बेहद छोटी संरचनाएं भी मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

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