भारत में गंभीर समस्या बन चुका है मनोभ्रंश, एक करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग बन चुके हैं शिकार

देश में 60 वर्ष से आयु के करीब 8.44 फीसदी बुजुर्ग मनोभ्रंश से पीड़ित हो सकते हैं। दूसरी तरफ यदि अमेरिका की बात करें तो वहां करीब 8.8 फीसदी बुजुर्ग इस विकार से पीड़ित हैं
फोटो: पिक्साबे
फोटो: पिक्साबे

भारत में मनोभ्रंश यानी डिमेंशिया की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। आलम यह है कि देश में एक करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग इसका शिकार बन चुके हैं। यह जानकारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एक नए अध्ययन में सामने आई है।

देखा जाए तो देश में डिमेंशिया का प्रसार अमेरिका और यूके जैसे विकसित देशों बराबर है। रिसर्च के मुताबिक देश में 60 वर्ष से आयु के करीब 8.44 फीसदी बुजुर्ग मनोभ्रंश से पीड़ित हो सकते हैं। वहीं यदि अमेरिका की बात करें तो वहां करीब 8.8 फीसदी बुजुर्ग इस विकार से पीड़ित हैं। इसी तरह ब्रिटेन में 9 फीसदी, जर्मनी में 8.5 फीसदी और फ्रांस में नौ फीसदी बुजुर्ग मनोभ्रंश से ग्रस्त हैं।

यह अध्ययन जर्नल न्यूरोएपिडेमियोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 31,477 बुजुर्गों के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करने के लिए एआई आधारित मशीन लर्निंग तकनीक का अध्ययन किया है।

क्या होता है मनोभ्रंश

गौरतलब है कि डिमेंशिया एक ऐसा विकार है, जिसमें मरीज मानसिक रूप से इतना कमजोर हो जाता है कि उसे अपने रोजमर्रा के कामों को पूरा करने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है।

एक्सपर्ट्स की मानें तो मनोभ्रंश एक ऐसा रोग है, जिसमें दिमाग के अंदर विभिन्न प्रकार के प्रोटीन का निर्माण होने लगता है, जो दिमाग के उत्तकों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। इसके कारण इंसान की याददाश्त, सोचने-समझने, देखने और बोलने की क्षमता में धीरे-धीरे गिरावट आने लगती है। देखा जाए तो डिमेंशिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं है, बल्कि यह कई बीमारियों या यूं कहें कि कई लक्षणों के एक समूह का नाम है।

अल्जाइमर इस तरह की एक सबसे प्रमुख बीमारी है, जो बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करती है। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो डिमेंशिया के 60 से 70 फीसदी मामलों के लिए अल्जाइमर ही वजह होता है।

भले ही भारत में इस पर ज्यादा गौर नहीं किया जाता लेकिन यह विकार कितनी घातक है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार सभी बीमारियों से होने वाली मौतों के मामले में मनोभ्रंश सातवां प्रमुख कारण है। इतना ही नहीं यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो यह वृद्ध लोगों में विकलांगता और दूसरों पर बढ़ती निर्भरता के प्रमुख कारणों में से एक है।

दिल्ली में सबसे ज्यादा 154 फीसदी बढ़ सकता है मनोभ्रंश पीड़ितों का आंकड़ा

वहीं अल्जाइमर एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित जर्नल अल्जाइमर्स एंड डिमेंशिया में छपे एक नए अध्ययन से पता चला है कि देश में मनोभ्रंश के शिकार लोगों का आंकड़ा 2036 तक 92.4 फीसदी बढ़ जाएगा। अनुमान है कि अगले 13 वर्षों में डिमेंशिया से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़कर 1.7 करोड़ पर पहुंच जाएगी।

रिसर्च की माने तो देश में मनोभ्रंश के मरीजों में सबसे ज्यादा वृद्धि दिल्ली में होगी। आंकड़ों के मुताबिक जहां 2016 में दिल्ली के 67,000 बुजुर्ग इस विकार से पीड़ित थे। वहीं 2036 में यह आंकड़ा 154 फीसदी की वृद्धि के साथ बढ़कर 170,000 पर पहुंच जाएगा।

इसके बाद उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे ज्यादा वृद्धि हों की आशंका है। पता चला है कि जहां उत्तर पूर्व के अन्य राज्यों में 139.7 फीसदी की वृद्धि हो जाएगी। वहीं असम में मनोभ्रंश से पीड़ित लोगों का आंकड़ा अगले 13 वर्षों में 127 फीसदी की वृद्धि के साथ बढ़कर 456,000 पर पहुंच जाएगा।

अनुमान है कि वैश्विक स्तर 2019 से 2050 के बीच डिमेंशिया के मरीजों की संख्या तीन गुणा बढ़ जाएगी। गौरतलब है कि 2019 में वैश्विक स्तर पर डिमेंशिया के 5.7 करोड़ मामले सामने आए थे। अनुमान है कि यह आंकड़ा 2050 तक 166 फीसदी की वृद्धि के साथ बढ़कर 15.3 करोड़ पर पहुंच जाएगा।

गौरतलब है कि दुनिया भर में हर साल इस बीमारी के एक करोड़ से ज्यादा नए मामले सामने आते हैं। वहीं डब्लूएचओ का अनुमान है कि वर्तमान में डिमेंशिया के 60 फीसदी से ज्यादा मरीज निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हैं। वहीं इसकी आर्थिक लागत को देखें तो 2019 में मनोभ्रंश की कुल अनुमानित सामाजिक लागत करीब 96 लाख करोड़ रुपए आंकी गई थी। अनुमान है कि यह आंकड़ा 2030 तक बढ़कर 206.9 लाख करोड़ पर पहुंच जाएगा।

देखा जाए तो यह एक ऐसी बीमारी है जिसके इलाज के लिए बहुत कम दवाएं उपलब्ध हैं। वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में तो इस बात पता भी नहीं लगता की कब लोग इस बीमारी का शिकार बन जाते हैं। ऐसे में शुरुआत में ही इस रोग की पहचान और इलाज की बहुत फायदेमंद हो सकती है।

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