

एनएफएचएस-6 के ताजा आंकड़े मध्यप्रदेश में विकास और पोषण के बीच गहरी खाई उजागर करते हैं।
पांच साल से कम उम्र के हर तीन में एक बच्चा ठिगना और लगभग 40 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है, जहां कुपोषण और वेस्टिंग के संकेतक ऊंचे बने हुए हैं।
मध्यप्रदेश में पोषण संकट केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि गुणवत्ता और विविधता की कमी से भी जुड़ा है।
छह से 23 माह के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम आहार मिल रहा है, स्तनपान दर घटी है और गर्भवती महिलाओं में आयरन-फोलिक एसिड सेवन कम है।
इससे कुपोषित मां-बच्चे का चक्र, डबल बर्डन और मधुमेह जैसे गैर-संचारी रोगों का खतरा बढ़ रहा है।
मध्यप्रदेश में संस्थागत प्रसव बढ़े हैं, महिलाओं की इंटरनेट तक पहुंच दोगुनी से अधिक हुई है और टीकाकरण के आंकड़े भी पहले से बेहतर हुए हैं। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 6 ( 2023-24) के ताजा आंकड़े एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई हैं जो विकास की इस कहानी को अधूरा बना देती है। राज्य में पांच साल से कम उम्र के लगभग हर तीन में से एक बच्चा अब भी ठिगना है, हर दस में से चार बच्चे कम वजन के हैं और बच्चों में तीव्र कुपोषण पहले की तुलना में बढ़ गया है।
सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेश में 31.4 प्रतिशत बच्चे ठिगनेपन (स्टंटिंग) के शिकार हैं। हालांकि यह आंकड़ा एनएफएचएस-5 के 35.7 प्रतिशत से कम है, इसलिए इसे सुधार के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा कहीं अधिक चिंताजनक है। राज्य में कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 33 से बढ़कर 39.7 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह दुबलापन या वेस्टिंग 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 23.8 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे यह सवाल उठता है कि कभी कुपोषण के मामलों में देश में नंबर 1 रहे राज्य ने रिवर्स गियर लगा दिया है। ये दोनों संकेतक बताते हैं कि बच्चों में तीव्र पोषण संकट अभी भी गहरा है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा खराब है, जहां 42 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और लगभग एक-चौथाई बच्चे वास्टिंग से प्रभावित हैं।
पोषण का संकट, भोजन की गुणवत्ता का संकट
एनएफएचएस -6 के आंकड़े बताते हैं कि समस्या सिर्फ भोजन की उपलब्धता की नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता और विविधता की भी है। छह से 23 माह आयु वर्ग के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को न्यूनतम आहार मिल रहा है। इसका अर्थ है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चों को उम्र के अनुरूप पर्याप्त और संतुलित भोजन नहीं मिल पा रहा जिसका असर बच्चों के कुपोषण पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। यही नहीं, छह महीने तक केवल स्तनपान कराने की दर भी गिरकर 56.4 प्रतिशत रह गई है, जबकि पिछले सर्वेक्षण में यह 74 प्रतिशत थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जीवन के पहले 1,000 दिन बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में स्तनपान और पूरक आहार में यह कमी भविष्य में कुपोषण और सीखने की क्षमता पर असर डाल सकती है।
मातृ स्वास्थ्य में सुधार, लेकिन पोषण अब भी कमजोर कड़ी
राज्य में 96.2 प्रतिशत महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान कम से कम एक प्रसवपूर्व जांच (ANC) मिली और 89.8 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हुए। पहली नजर में यह उपलब्धि दिखाई देती है। लेकिन दूसरी ओर केवल 39.6 प्रतिशत महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान 180 दिनों या उससे अधिक समय तक आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां लीं। यह संकेत देता है कि मातृ पोषण अब भी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ी बना हुआ है।
स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि कुपोषित मां और कम वजन वाले बच्चे का चक्र एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। इसलिए यदि महिलाओं का पोषण नहीं सुधरता तो बच्चों के पोषण संकेतकों में भी अपेक्षित सुधार मुश्किल होगा।
मध्यप्रदेश में उभर रहा है "डबल बर्डन"
एनएफएचएस-6 का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि मध्यप्रदेश अब केवल कुपोषण की समस्या से नहीं जूझ रहा। राज्य में एक साथ अल्पपोषण और मोटापे की समस्या मौजूद है। 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 26.5 प्रतिशत महिलाएं और 28.3 प्रतिशत पुरुष सामान्य से कम बीएमआई वाले हैं। दूसरी ओर 22.2 प्रतिशत महिलाएं और 17.6 प्रतिशत पुरुष अधिक वजन या मोटापे की श्रेणी में पहुंच चुके हैं।
यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य की भाषा में "डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन" कहलाती है, जहां एक ही समाज में कुछ लोग पर्याप्त भोजन और पोषण से वंचित हैं, जबकि दूसरी तरफ बड़ी संख्या में लोग अस्वास्थ्यकर भोजन और जीवनशैली के कारण मोटापे और उससे जुड़ी बीमारियों का सामना कर रहे हैं।
बढ़ रहा मधुमेह का खतरा
सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में मधुमेह का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है। 15 वर्ष से अधिक आयु की 14.5 प्रतिशत महिलाओं और 18.3 प्रतिशत पुरुषों का रक्त शर्करा स्तर 140 से अधिक है या वे मधुमेह की दवा ले रहे हैं। पिछले सर्वेक्षण की तुलना में यह उल्लेखनीय वृद्धि है। यह संकेत देता है कि मध्यप्रदेश अब संक्रमण और कुपोषण जैसी पारंपरिक स्वास्थ्य चुनौतियों के साथ-साथ गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते बोझ का भी सामना कर रहा है।
महिलाओं की स्थिति में सुधार, लेकिन असमानता बरकरार
महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़े संकेतकों में सकारात्मक बदलाव दर्ज हुए हैं। 90.4 प्रतिशत विवाहित महिलाएं घरेलू निर्णयों में भागीदारी कर रही हैं। 92.1 प्रतिशत महिलाओं के पास बैंक खाता है और इंटरनेट उपयोग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 26.9 से बढ़कर 62 प्रतिशत हो गया है। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद केवल 17.3 प्रतिशत महिलाओं के पास घर या जमीन का स्वामित्व है। यह दिखाता है कि आर्थिक संसाधनों पर महिलाओं की वास्तविक हिस्सेदारी अभी भी सीमित है।
ग्रामीण-शहरी विभाजन अब भी गहरा
लगभग हर प्रमुख संकेतक में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। बाल विवाह, कुपोषण, कम वजन, मातृ स्वास्थ्य और डिजिटल पहुंच—सभी में ग्रामीण क्षेत्र पीछे हैं। मिसाल के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 33.2 प्रतिशत बच्चे ठिगने हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 24.5 प्रतिशत है। ग्रामीण महिलाओं में बाल विवाह का प्रतिशत शहरी महिलाओं की तुलना में लगभग ढाई गुना अधिक है। इंटरनेट उपयोग और शिक्षा के मामले में भी यही अंतर दिखाई देता है।