

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नया टूलकिट जारी किया, जिसका उद्देश्य त्वचा गोरा करने वाले उत्पादों के उपयोग के पीछे व्यवहारिक कारण समझना है।
पारा युक्त उत्पाद स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं, जिससे दिमागी नुकसान, गर्भस्थ शिशुओं पर असर और पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है।
केवल प्रतिबंध पर्याप्त नहीं, सामाजिक सोच, सुंदरता के मानक और विज्ञापनों के प्रभाव को समझकर ही मांग को कम किया जा सकता है।
यह पहल पारे पर मिनामाटा अभिसमय के तहत वैश्विक प्रयासों को मजबूत करती है और पारा उपयोग खत्म करने पर जोर देती है।
गैबॉन, जमैका और श्रीलंका में पायलट परियोजनाओं से स्थानीय रणनीतियां, डेटा विश्लेषण और व्यवहार आधारित हस्तक्षेप की जरूरत सामने आई है।
दुनिया भर में त्वचा को गोरा करने की प्रवृत्ति एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक नया “व्यवहारिक नजरिया टूलकिट” तैयार किया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि लोग आखिर क्यों ऐसे उत्पादों का उपयोग करते हैं, जिनमें खतरनाक रसायन जैसे पारा (मरकरी) मौजूद होता है।
बढ़ती मांग और इसके कारण
आज के समय में त्वचा-गोरा करने वाले उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि साल 2032 तक यह बाजार 16.4 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। यह दिखाता है कि इन उत्पादों की मांग बहुत अधिक है।
इस मांग के पीछे कई कारण हैं। समाज में गोरी त्वचा को सुंदरता का प्रतीक माना जाता है। विज्ञापन, फिल्मों और सोशल मीडिया भी इस सोच को बढ़ावा देते हैं। कई लोग आत्मविश्वास बढ़ाने या सामाजिक स्वीकार्यता पाने के लिए इन उत्पादों का उपयोग करते हैं।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा
इन उत्पादों में अक्सर पारा जैसे जहरीले तत्व पाए जाते हैं। पारा मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। इसके कारण दिमागी (न्यूरोलॉजिकल) समस्याएं हो सकती हैं। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए यह और भी ज्यादा नुकसानदायक है।
जब ये उत्पाद धोकर हटाए जाते हैं, तो पारा पानी में मिल जाता है। यह मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित करता है और लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है। इससे पर्यावरण और जीव-जंतुओं पर भी बुरा असर पड़ता है।
केवल प्रतिबंध से नहीं होगा समाधान
अब तक कई देशों ने ऐसे उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की है। लेकिन केवल कानून बनाना काफी नहीं है। लोग फिर भी इनका इस्तेमाल करते रहते हैं।
डब्ल्यूएचओ का मानना है कि समस्या की जड़ को समझना जरूरी है। जब तक यह नहीं समझा जाएगा कि लोग इन उत्पादों की ओर क्यों आकर्षित होते हैं, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
व्यवहारिक अध्ययन से मिलेगा समाधान
नया टूलकिट देशों को यह समझने में मदद करता है कि लोगों का व्यवहार कैसे काम करता है। इसमें यह देखा जाता है कि लोग पहली बार इन उत्पादों के बारे में कैसे जानते हैं, क्यों इन्हें अपनाते हैं और फिर लगातार क्यों इस्तेमाल करते रहते हैं।
इस जानकारी के आधार पर सरकारें और संस्थाएं ऐसी नीतियां बना सकती हैं जो सीधे लोगों के व्यवहार को प्रभावित करें। इससे जागरूकता अभियान अधिक प्रभावी बन सकते हैं।
वैश्विक प्रयासों से जुड़ा कदम
यह पहल पारे पर मिनामाटा अभिसमय जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों से भी जुड़ी है। इस समझौते का उद्देश्य पारा के उपयोग को कम करना और उसे पूरी तरह खत्म करना है।
2025 में गैबॉन में “लिब्रेविल प्रतिबद्धता” भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही, जिसमें देशों ने व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
पायलट परियोजनाओं से मिली सीख
2022 से 2026 के बीच गैबॉन, जमैका और श्रीलंका में इस विषय पर पायलट परियोजनाएं चलाई गईं। इनसे कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। जैसे कि हर देश में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनानी जरूरी है। साथ ही, सही डेटा एकत्र करना और उसका विश्लेषण करना भी बहुत अहम है।
इन परियोजनाओं ने यह भी दिखाया कि सीमित संसाधनों का सही उपयोग और लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटकर काम करना अधिक प्रभावी होता है।
आगे की राह
डब्ल्यूएचओ का यह नया टूलकिट एक महत्वपूर्ण कदम है, जो समस्या को जड़ से समझने की कोशिश करता है। अब ध्यान केवल उत्पादों पर रोक लगाने से हटकर लोगों के सोच और व्यवहार को बदलने पर है।
अगर देश इस टूलकिट का सही उपयोग करते हैं, तो न केवल खतरनाक त्वचा-गोरा करने वाले उत्पादों की मांग कम होगी, बल्कि लोगों का स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रहेंगे।