भारत के दवा उद्योग पर ईरान युद्ध की मार

दवा उद्योग के लिए जरूरी कच्चे माल की कमी हो रही है। उत्पादन की लागत भी बढ़ रही है। इन सबका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा
भारत के दवा उद्योग पर ईरान युद्ध की मार
इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
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1996 की बात है, जब अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने इराक पर भीषण बमबारी की थी। उस दौरान संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत (और बाद में विदेश मंत्री) मैडलिन अलब्राइट से एक टीवी कार्यक्रम में एक सवाल पूछा गया कि क्या इस युद्ध में होने वाला इंसानी जानों का नुकसान, उनकी बर्बादी और इराक पर लगी आर्थिक पाबंदियां जायज हैं? अलब्राइट ने जो चौंकाने वाला जवाब दिया, उससे साफ पता चलता है कि अमेरिका और उसके साथी देश ऐसे युद्धों को किस नजरिए से देखते हैं। उनके लिए यह कोलैटरल डैमेज यानी गेहूं के साथ घुन का पिसना भर है, आम जनता की तबाही उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि हजारों बच्चे भोजन, पानी और इलाज की कमी से मर रहे हैं। आज इस बात को याद रखना बहुत जरूरी है। बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप की सरकारों द्वारा ईरान पर किया जा रहा हमला पूरी दुनिया के लिए मुश्किलें पैदा कर रहा है। भारतीय दवा उद्योग को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। आज यह एक ऐसे संकट से जूझ रहा है, जिसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों की जनता पर भी होगा।

चलिए, 1996 में अलब्राइट के उस शर्मनाक कबूलनामे को याद करते हैं। पत्रकार लेस्ली स्टाल ने उनसे पूछा था, “हमने सुना है कि (इराक में) करीब 5 लाख बच्चों की मौत हुई है। मेरा मतलब है, यह संख्या हिरोशिमा में मारे गए बच्चों से भी ज्यादा है। क्या इसकी इतनी बड़ी कीमत चुकाना जायज है?” उस अमेरिकी अधिकारी ने बिल्कुल साफ शब्दों में जवाब दिया, “मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही मुश्किल फैसला है। लेकिन हमारी नजर में यह कीमत जायज है।”

ऐसी मानसिकता को देखते हुए इस बात की उम्मीद कम ही है कि इन हमलों को अंजाम देने वाले उस अप्रत्यक्ष नुकसान की जरा भी चिंता करेंगे जो वैश्विक दवा उद्योग को झेलना पड़ रहा है। यह एक ऐसी गहरी चोट है जिसका अंजाम करोड़ों लोगों को भुगतना होगा, जिनमें से ज्यादातर बच्चे हैं। खाड़ी में फैलते इस युद्ध से अब ऐसे अशुभ संकेत मिल रहे हैं कि दुनियाभर के मरीजों को दवा पहुंचाने की यह पूरी व्यवस्था इस युद्ध का सबसे बड़ा शिकार बन सकती है। मिसाइल हमलों ने सप्लाई चेन को तहस-नहस कर दिया है। आयात करने वालों को अब माल लाने के लिए लंबे और दूसरे रास्ते अपनाने पड़ रहे हैं। सबसे ज्यादा मुश्किल उन दवाओं के लिए हो रही है जिन्हें खास तापमान में रखना पड़ता है, जैसे कैंसर के इलाज की दवाएं। खबरें आ रही हैं कि खाड़ी के मुख्य हवाई ट्रांजिट हब ठप पड़ गए हैं, जिससे भारतीय दवा उद्योग में घबराहट बढ़ रही है। फिलहाल दवाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन व्यापारिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल और केमिकल्स की किल्लत बढ़ती जा रही है। छोटे और मध्यम स्तर के दवा निर्माताओं के संगठनों का कहना है कि बढ़ती लागत का असर थोक बाजार में दिखने लगा है। आने वाले दिनों में यह पूरे वितरण सिस्टम को प्रभावित करेगा। इस संकट की सबसे पहली मार पैरासिटामोल (बुखार की दवा), डायबिटीज की दवाओं और उन एंटीबायोटिक्स पर पड़ने वाली है जिन्हें हर दिन करोड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं।

भारत में जो कुछ भी होगा, उसका असर दुनिया के बाकी हिस्सों पर भी पड़ेगा। किसी देश पर कम तो किसी पर ज्यादा। भारतीय दवा उद्योग करीब 200 देशों को सस्ती जेनेरिक दवाएं मुहैया कराता है। यह उन लोगों और सरकारों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है, जो महंगी ब्रांडेड दवाओं का भारी खर्च नहीं उठा सकते। लेकिन अब यह सहारा भी खतरे में है। इसी की बदौलत अफ्रीका और अन्य जरूरतमंद इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम चल पाते हैं। इस खतरे की वजह दवा उद्योग की एक बड़ी बुनियादी कमजोरी है कच्चे माल के लिए दूसरे देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना। ईरान युद्ध ने दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादक की इसी कमजोर नस को एक बार फिर उजागर कर दिया है। हाल के सालों में भारत में दवाओं का उत्पादन बढ़ा है। फिर भी दवा बनाने के लिए जरूरी बुनियादी कच्चे माल के लिए हमारा उद्योग खासकर चीन से आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है। अगर हम दवा बनाने की रासायनिक प्रक्रिया को एक पिरामिड की तरह देखें, तो इसके आधार यानी सबसे निचली परतों में की स्टार्टिंग मैटेरियल्स यानी ऐसे केमिकल होते हैं, जिनका इस्तेमाल दवा बनाने के पहले चरण में होता है। जबकि इस पिरामिड के सबसे ऊपरी हिस्से में एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स यानी दवा के सबसे प्रमुख सक्रिय तत्व होते हैं, जो बीमारी ठीक करते हैं। वहीं, इंटरमीडिएट्स ऐसे जरूरी केमिकल होते हैं, जो दवा बनाने की प्रक्रिया के बीच में इस्तेमाल होते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस पूरे ढांचे की उन सबसे निचली दो परतों पर चीन का शिकंजा है, जिनके बिना दवा का तैयार होना मुमकिन नहीं है।

खाड़ी में फैलते इस युद्ध से अब ऐसे अशुभ संकेत मिल रहे हैं कि दवाओं तक लोगों की पहुंच इस युद्ध की सबसे बड़ी शिकार बन सकती है

युद्ध जैसे-जैसे लंबा खिंच रहा है, हालात और बिगड़ने के आसार हैं। हालांकि, सरकारी बयानों में अक्सर उन खतरों को छिपा लिया जाता है जिनका सामना देश कर रहा है। फिर चाहे वह ग्लोबल सप्लाई चेन में आ रहीं बाधाएं हों या फिर बढ़ती कीमतें। मार्च की शुरुआत में केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने राज्यसभा में दावा किया कि घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने वाली पीएलआई योजना की वजह से भारत अब आयात के मुकाबले ज्यादा मुख्य सक्रिय तत्वों (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स) का निर्यात कर रहा है। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि भारत काफी सुरक्षित स्थिति में है। आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025 में निर्यात 41,500 करोड़ रुपए रहा, जबकि आयात 39,215 करोड़ रुपए था। लेकिन ये आंकड़े भारत की बढ़ती कमजोरियों की असलियत पर पर्दा डाल देते हैं। बाहर से आने वाले एपीआई केमिकल्स की कीमतें बढ़ रही हैं, जिनका कुछ हिस्सा यूरोप से आता है। साथ ही चीन पर हमारी निर्भरता भी और बढ़ी है। दो साल पहले चीन से होने वाला आयात 70 फीसदी था, जो अब बढ़कर 74 फीसदी हो गया है। कुल मिलाकर हमने अपने आयात बिल का 29,064 करोड़ रुपए चीन को चुकाया है।

आयात पर यह निर्भरता कई अन्य जोखिम भी साथ लाती है। भारतीय कंपनियों को अब माल ढुलाई के लिए अधिक खर्च करना होगा और उन्हें विदेशी मुद्रा की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव की मार भी झेलनी पड़ेगी। दुनिया भारत को जिस सम्मान और भरोसे की नजर से देखती है, उसकी एक बड़ी वजह बच्चों के टीके हैं। भारत यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई अन्य देशों को लगने वाले डीपीटी (डिप्टीरिया, काली खांसी और टिटनेस), बीसीजी और खसरे के टीकों की भारी मात्रा में सप्लाई करता है। लेकिन यहां भी ईरान युद्ध के कारण काम रुकने का खतरा पैदा हो सकता है। इसकी वजह यह है कि भारत के वैक्सीन बनाने वाले कच्चे माल का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा दूसरे देशों से मंगाया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से अमेरिका और चीन शामिल हैं। केंद्र सरकार को इस समस्या का समाधान जल्द से जल्द करने की जरूरत है।

यह याद रखना जरूरी है कि पश्चिमी देशों के हमले और कड़े प्रतिबंधों ने इराक के बच्चों का क्या हाल किया था। यूनिसेफ के एक सर्वे में 5 लाख बच्चों की मौत का जो आंकड़ा दिया गया था और जिसे अक्सर दोहराया जाता है, उस पर काफी विवाद खड़ा किया गया। कई मुख्यधारा के अमेरिकी मीडिया संस्थानों और मेडिकल पत्रिकाओं ने इन आंकड़ों को गलत साबित करने की पूरी कोशिश की। लेकिन भले ही इन आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया हो (वह भी संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी द्वारा), फिर भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस कड़वी सच्चाई से इनकार नहीं कर सकता कि स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सेवाओं को तबाह करने के नतीजे मासूम बच्चों के लिए कितने विनाशकारी होते हैं।

इराक पर आक्रमण के बाद से हमलावर ताकतों, खासकर इजरायल की युद्ध-रणनीति में जो बदलाव आया है, उसे देखते हुए कोलैटरल डैमेज की परिभाषा को पूरी तरह बदलना जरूरी हो गया है।

दशकों से इस शब्द का इस्तेमाल एक सभ्य आवरण के तौर पर किया जाता रहा है, ताकि मासूमों की मौतों को अनजाने में हुई क्षति बताकर उन पर पर्दा डाला जा सके। लेकिन अब आम नागरिकों की जान लेना और बुनियादी सेवाओं को तबाह करना कोई अनचाहा नतीजा नहीं, बल्कि हमले का असली मकसद बन चुका है। जैसा कि युद्ध के पहले ही दिन अमेरिकी हमले में दक्षिण ईरान के मिनाब में 167 स्कूली बच्चों की हत्या से साफ जाहिर होता है। युद्ध के इस दौर में दवाओं और टीकों की सप्लाई को सुचारू रखने के लिए भारतीय दवा उद्योग को पहले से कहीं बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। यह संकट इस बात की भी याद दिलाता है कि अगर भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहना है, तो उसे रिसर्च और नवाचार पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा।

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